हर साल रावण का पुतला जलाते हैं, लेकिन क्या कभी उन बुराइयों को जलाने की कोशिश की, जो हमारे समाज की आत्मा को खोखला कर रही हैं?
लेख | दशहरा विशेष
दशहरा आते ही देशभर में रावण के पुतले जलाए जाते हैं। आतिशबाजी होती है, मेले लगते हैं और बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है। हम भगवान श्रीराम के आदर्शों को याद करते हैं और रावण के अंत को अधर्म पर धर्म की विजय के रूप में मनाते हैं। लेकिन हर साल एक सवाल हमारे सामने खड़ा होता है—अगर रावण का अंत हजारों साल पहले हो चुका है, तो फिर समाज में बुराई का साम्राज्य आज भी क्यों बढ़ रहा है?
शायद इसलिए कि हमने रावण को केवल एक पुतले में सीमित कर दिया है। हमने उसके दस सिर तो जला दिए, लेकिन उन दस सिरों का प्रतीक बनने वाली बुराइयों को अपने जीवन, समाज और व्यवस्था से निकालने का प्रयास नहीं किया।
आज समाज में रावण के अनेक रूप मौजूद हैं। कहीं वह भ्रष्टाचार बनकर गरीब का हक छीनता है, कहीं सत्ता के अहंकार में जनता की आवाज दबाता है, कहीं धन और ताकत के बल पर न्याय को प्रभावित करने की कोशिश करता है, तो कहीं महिलाओं की गरिमा और बच्चों के भविष्य को कुचलता है।
इन रावणों का चेहरा अलग-अलग हो सकता है, लेकिन इनकी प्रवृत्ति एक ही है—अपने स्वार्थ के लिए दूसरों के अधिकारों का हनन करना।
भ्रष्टाचार का रावण और व्यवस्था का अहंकार
जब किसी गरीब को अपने अधिकार के लिए सरकारी कार्यालयों के चक्कर काटने पड़ते हैं, लेकिन प्रभावशाली व्यक्ति का काम बिना किसी बाधा के हो जाता है, तब हमें व्यवस्था के भीतर मौजूद रावण दिखाई देता है।
जब किसी जरूरतमंद की पेंशन महीनों तक अटकी रहती है, किसी दिव्यांग व्यक्ति को सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ता है और किसी बुजुर्ग को अपने ही अधिकार के लिए बार-बार अपनी पात्रता साबित करनी पड़ती है, तब सवाल केवल प्रशासनिक लापरवाही का नहीं रह जाता। सवाल उस संवेदनहीनता का भी है, जो इंसान को इंसान की पीड़ा से दूर कर देती है।
भ्रष्टाचार केवल रिश्वत लेने या देने का नाम नहीं है। अपने पद का दुरुपयोग करना, जानबूझकर काम लटकाना, नियमों का इस्तेमाल कमजोर को परेशान करने के लिए करना और जवाबदेही से बचना भी उसी मानसिकता के अलग-अलग रूप हैं।
जिस व्यवस्था में ईमानदार व्यक्ति को संघर्ष और बेईमान को सुविधा मिले, वहां रावण का पुतला जलाने से पहले व्यवस्था के भीतर झांकना जरूरी है।
महिलाओं के सम्मान का शत्रु आज भी जीवित है
हम देवी की पूजा करते हैं, नारी शक्ति के सम्मान की बातें करते हैं और मंचों से महिला सशक्तीकरण के नारे लगाते हैं। लेकिन महिलाओं के प्रति हिंसा, उत्पीड़न, भेदभाव और असमानता की घटनाएं हमें आत्ममंथन के लिए मजबूर करती हैं।
महिला का सम्मान केवल भाषणों, कानूनों और उत्सवों तक सीमित नहीं रह सकता। उसकी सुरक्षा, स्वतंत्रता, शिक्षा, रोजगार और निर्णय लेने के अधिकार को स्वीकार करना होगा।
जब किसी महिला की आवाज को उसके परिवार, समाज या कार्यस्थल पर दबाया जाता है, जब पीड़िता से ही सवाल पूछे जाते हैं और जब प्रभावशाली व्यक्ति के सामने न्याय की प्रक्रिया कमजोर पड़ती दिखाई देती है, तब हमें अपने सामाजिक चरित्र पर सवाल उठाना चाहिए।
रावण का अंत केवल प्रतीकात्मक नहीं होना चाहिए। उस सोच का अंत भी जरूरी है, जो महिलाओं को बराबरी का इंसान मानने से इनकार करती है।
शिक्षा और बच्चों के भविष्य से खिलवाड़
किसी भी समाज का भविष्य उसके बच्चों में बसता है। लेकिन जब शिक्षा अवसर के बजाय आर्थिक हैसियत पर निर्भर होने लगे, जब सरकारी विद्यालय बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करें और जब गरीब परिवारों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पाने के लिए अतिरिक्त बाधाओं का सामना करना पड़े, तब विकास के दावों की समीक्षा जरूरी हो जाती है।
बच्चों के साथ होने वाला हर अन्याय केवल एक परिवार की समस्या नहीं है। वह आने वाली पीढ़ी के अवसरों को प्रभावित करता है।
इसी तरह दिव्यांग बच्चों और विशेष शैक्षिक आवश्यकताओं वाले विद्यार्थियों को शिक्षा, संसाधन और सम्मान से वंचित रखना भी सामाजिक जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने जैसा है।
बच्चों का भविष्य छीनने वाली हर सोच उस रावण का हिस्सा है, जो समाज की आने वाली पीढ़ियों को कमजोर बनाती है।
सच की आवाज दबाने वाला रावण
लोकतंत्र केवल चुनाव कराने से मजबूत नहीं होता। उसे मजबूत बनाते हैं सवाल पूछने वाले नागरिक, निष्पक्ष पत्रकारिता, स्वतंत्र संस्थाएं और जवाबदेह शासन।
जब किसी व्यवस्था से सवाल पूछने वाले व्यक्ति को शत्रु समझा जाने लगे, जब भ्रष्टाचार उजागर करने वालों को हतोत्साहित किया जाए और जब असहमति को सुनने के बजाय दबाने की कोशिश हो, तब लोकतांत्रिक मूल्यों पर संकट पैदा होता है।
पत्रकारिता का दायित्व केवल उपलब्धियों का गुणगान करना नहीं, बल्कि उन सवालों को भी सामने लाना है, जिनका उत्तर जनता जानना चाहती है।
हालांकि, सवाल पूछने के साथ तथ्यों की जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी है। किसी पर आरोप लगाना और आरोप को प्रमाणित तथ्य की तरह प्रस्तुत करना अलग-अलग बातें हैं।
सच को सामने लाना लोकतंत्र की ताकत है और सच बोलने की जिम्मेदारी निभाना पत्रकारिता का धर्म।
पहाड़ों की प्रकृति को लूटने वाला रावण
उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य में रावण का एक और रूप दिखाई देता है—प्रकृति के प्रति संवेदनहीनता।
हम पहाड़ों को देवभूमि कहते हैं, नदियों को मां मानते हैं और जंगलों को जीवन का आधार बताते हैं। लेकिन जब अनियोजित निर्माण, वनों का नुकसान, नदियों में प्रदूषण और पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी विकास की कीमत बन जाए, तब हमें अपनी प्राथमिकताओं पर विचार करना चाहिए।
पहाड़ों का विकास जरूरी है। सड़कें, रोजगार, पर्यटन, उद्योग और बेहतर सुविधाएं भी जरूरी हैं। लेकिन विकास ऐसा होना चाहिए, जो स्थानीय लोगों की आजीविका मजबूत करे, प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करे और आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों को सुरक्षित रखे।
यदि पर्यटन से कमाई तो बढ़े, लेकिन स्थानीय लोगों को रोजगार न मिले; यदि परियोजनाएं बनें, लेकिन पर्यावरण और विस्थापित परिवारों की चिंताओं की अनदेखी हो, तो विकास के मॉडल पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
प्रकृति का विनाश केवल पर्यावरण की समस्या नहीं है। यह स्थानीय अर्थव्यवस्था, संस्कृति और भविष्य की सुरक्षा से भी जुड़ा प्रश्न है।
सबसे बड़ा रावण हमारे भीतर भी है
दूसरों की बुराइयां पहचानना आसान है, लेकिन अपने भीतर झांकना कठिन।
हम भ्रष्टाचार का विरोध करते हैं, लेकिन अवसर मिलने पर नियम तोड़ने में संकोच नहीं करते। हम समाज में बढ़ती असंवेदनशीलता की शिकायत करते हैं, लेकिन किसी जरूरतमंद की मदद करने से बचते हैं। हम अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की अपेक्षा दूसरों से करते हैं, लेकिन स्वयं जोखिम उठाने से पीछे हट जाते हैं।
यहीं दशहरे का वास्तविक अर्थ छिपा है।
रावण के दस सिर को अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, अन्याय और दूसरी मानवीय कमजोरियों के प्रतीक के रूप में भी देखा जा सकता है। इन प्रतीकों का महत्व तभी है, जब वे हमें अपने व्यवहार में बदलाव लाने के लिए प्रेरित करें।
हमें यह भी याद रखना चाहिए कि किसी व्यक्ति को शत्रु मानकर उसका विनाश चाहना और उसकी गलत प्रवृत्ति, अन्याय या अपराध का विरोध करना दो अलग बातें हैं। समाज को व्यक्तियों के प्रति अंधी नफरत नहीं, बल्कि गलत कार्यों के प्रति स्पष्ट असहमति और कानून के अनुसार जवाबदेही की जरूरत है।
किसी भ्रष्ट आचरण का अंत निष्पक्ष जांच और कानूनी कार्रवाई से होना चाहिए। किसी सामाजिक बुराई का अंत जागरूकता, शिक्षा और सामूहिक प्रयास से होना चाहिए। और अपने भीतर की बुराइयों का अंत आत्मानुशासन तथा नैतिक साहस से होना चाहिए।
यही वह रास्ता है, जो उत्सव को सामाजिक परिवर्तन से जोड़ सकता है।
अब पुतलों के साथ बुराइयों का भी अंत हो
दशहरे पर रावण के पुतले जलाना हमारी सांस्कृतिक परंपरा है। इसे मनाया जाना चाहिए। लेकिन इसके साथ समाज को कुछ संकल्प भी लेने चाहिए।
हम रिश्वत न देंगे, न लेंगे। महिलाओं और बच्चों के सम्मान की रक्षा करेंगे। दिव्यांगजनों, बुजुर्गों और जरूरतमंदों के अधिकारों के प्रति संवेदनशील रहेंगे। पर्यावरण की रक्षा करेंगे। अन्याय के सामने चुप रहने के बजाय तथ्यों और कानून के आधार पर आवाज उठाएंगे। सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग करेंगे।
सरकारों से भी अपेक्षा है कि वे योजनाओं की घोषणाओं से आगे बढ़कर उनके वास्तविक लाभ को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाएं। प्रशासन जनता के प्रति जवाबदेह बने, संस्थाएं निष्पक्षता से काम करें और कानून का पालन सभी के लिए समान रूप से हो।
क्योंकि समाज में बदलाव केवल सरकार या किसी एक संस्था की जिम्मेदारी नहीं है। यह नागरिकों, परिवारों, शिक्षण संस्थानों, मीडिया और सामाजिक संगठनों की साझा जिम्मेदारी है।
निष्कर्ष: इस बार रावण की सोच का दहन करें
हर साल रावण का पुतला जलता है और अगले दिन उसकी राख भी मिट जाती है। लेकिन भ्रष्टाचार, अहंकार, शोषण, भेदभाव और संवेदनहीनता फिर हमारे सामने खड़ी दिखाई देती हैं।
इसलिए इस दशहरे पर सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि रावण कितने फीट ऊंचा था या उसके पुतले पर कितना पैसा खर्च हुआ। सवाल यह होना चाहिए कि हमने अपने समाज को बेहतर बनाने के लिए क्या किया?
क्या किसी गरीब को न्याय मिला? क्या किसी महिला को सम्मान और सुरक्षा मिली? क्या किसी बच्चे को बेहतर शिक्षा का अवसर मिला? क्या किसी दिव्यांग व्यक्ति को उसका अधिकार मिला? क्या किसी गांव में रोजगार के नए अवसर पैदा हुए? क्या प्रकृति को बचाने के लिए कोई ठोस कदम उठाया गया?
यदि इन सवालों के जवाब सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ते हैं, तभी दशहरे का संदेश हमारे जीवन में सार्थक होगा।
समाज में कई रावण हैं, जिनका अंत जरूरी है। लेकिन यह अंत किसी व्यक्ति की हत्या से नहीं, बल्कि उसके भीतर की बुराई, अन्यायपूर्ण व्यवस्था, शोषणकारी सोच और भ्रष्ट आचरण को समाप्त करने से होगा।
आइए, इस दशहरे पर केवल पुतला न जलाएं। अपने भीतर के अहंकार को जलाएं, समाज में व्याप्त अन्याय का विरोध करें और एक ऐसे भारत के निर्माण में योगदान दें, जहां ताकतवर के लिए अलग और कमजोर के लिए अलग कानून न हो, जहां सच बोलना अपराध न बने और जहां इंसान की पहचान उसकी जाति, धर्म, आर्थिक स्थिति या शारीरिक क्षमता से नहीं, बल्कि उसकी गरिमा और मानवीय मूल्यों से हो।
क्योंकि असली विजयदशमी उस दिन होगी, जब रावण का पुतला जलने के साथ-साथ समाज में अन्याय की ताकत कमजोर होगी, इंसानियत मजबूत होगी और सत्य को केवल पूजा नहीं, बल्कि जीवन में अपनाया जाएगा।
— संपादकीय विचार
