उत्तराखंड में बेटियों की पढ़ाई पर सवाल: बजट बढ़ा, लेकिन जवाबदेही कितनी?
शिक्षा किसी सरकार की कृपा नहीं, बल्कि अधिकार है। यह अधिकार तभी सार्थक है, जब प्रत्येक बच्ची बिना आर्थिक, सामाजिक और भौगोलिक बाधाओं के अपनी पढ़ाई पूरी कर सके। संयुक्त राष्ट्र महिला (UN Women) का संदेश स्पष्ट है—शिक्षा से वंचित करना लड़कियों और युवतियों को हिंसा, गरीबी तथा शोषण के प्रति अधिक संवेदनशील बना सकता है।

उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में यह सवाल और गंभीर हो जाता है। यहां विद्यालयों की दूरी, शिक्षकों की उपलब्धता, आर्थिक कठिनाइयां और सुरक्षित आवागमन की चुनौतियां छात्राओं की शिक्षा को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में सवाल केवल शिक्षा के महत्व का नहीं, बल्कि सरकार की जवाबदेही का है।
आंकड़े क्या कहते हैं?
शिक्षा मंत्रालय की ओर से 27 जुलाई 2026 को लोकसभा में प्रस्तुत जानकारी के अनुसार, उत्तराखंड में छात्राओं की विद्यालय छोड़ने की दर में अलग-अलग शैक्षिक स्तरों पर उल्लेखनीय अंतर दिखाई देता है।
UDISE+ के आंकड़ों के अनुसार छात्राओं की विद्यालय छोड़ने की दर:
| शिक्षा का स्तर | 2023-24 | 2024-25 | 2025-26 |
|---|---|---|---|
| प्राथमिक (कक्षा 1–5) | 0% | 0.5% | 1.8% |
| उच्च प्राथमिक (कक्षा 6–8) | 1.9% | 0.8% | 2.8% |
| माध्यमिक (कक्षा 9–10) | 5.3% | 3.0% | 4.8% |
स्रोत: शिक्षा मंत्रालय के लोकसभा प्रश्न संख्या 1230 के उत्तर में प्रस्तुत UDISE+ आंकड़े।
इन आंकड़ों में सबसे अधिक चिंता माध्यमिक स्तर की है, जहां 2025-26 में छात्राओं की विद्यालय छोड़ने की दर 4.8 प्रतिशत दर्ज की गई। प्राथमिक स्तर पर भी यह दर 2023-24 के शून्य प्रतिशत से बढ़कर 2025-26 में 1.8 प्रतिशत हो गई।
यह वृद्धि अपने आप में यह साबित नहीं करती कि किसी एक सरकारी योजना की विफलता हुई है, लेकिन यह जरूर बताती है कि छात्राओं की शिक्षा की निरंतरता पर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है।
सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि पढ़ाई छोड़ने के पीछे आर्थिक कठिनाइयां, विद्यालयों की दूरी, पारिवारिक जिम्मेदारियां, सुरक्षा संबंधी चिंताएं या अन्य कौन-से कारण प्रमुख हैं।
2,959 एकल शिक्षक विद्यालय: गुणवत्ता पर सवाल
UDISE+ 2024-25 के अनुसार, उत्तराखंड में कुल 22,452 विद्यालय, 24,26,815 विद्यार्थी और 1,34,263 शिक्षक दर्ज किए गए। राज्य में 2,959 विद्यालय ऐसे थे जहां केवल एक शिक्षक दर्ज था। इन विद्यालयों में 38,608 विद्यार्थी नामांकित थे।
यह आंकड़ा अपने आप में सभी विद्यालयों में शिक्षकों की कमी साबित नहीं करता। फिर भी इतने विद्यालयों में एक ही शिक्षक की उपलब्धता यह सवाल उठाती है कि वहां पढ़ाई, अलग-अलग कक्षाओं के संचालन और विद्यार्थियों को व्यक्तिगत शैक्षिक सहायता देने की व्यवस्था कैसी है।
पर्वतीय क्षेत्रों में जहां एक विद्यालय कई गांवों के बच्चों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, वहां शिक्षकों की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना और भी आवश्यक है।
शिक्षा विभाग को जिलेवार जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए कि इन विद्यालयों में कितने पद स्वीकृत हैं, कितने रिक्त हैं और शिक्षकों की व्यवस्था सुधारने के लिए क्या समयबद्ध कदम उठाए गए हैं।
छात्राओं के लिए शौचालय: निर्माण नहीं, उपयोग की गारंटी चाहिए
लोकसभा में 27 जुलाई 2026 को प्रस्तुत शिक्षा मंत्रालय की जानकारी के अनुसार, UDISE+ 2025-26 में उत्तराखंड के 92 प्रतिशत सरकारी विद्यालयों में छात्राओं के लिए अलग क्रियाशील शौचालय दर्ज किए गए।
इसका अर्थ है कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार आठ प्रतिशत सरकारी विद्यालय इस सुविधा की श्रेणी में शामिल नहीं थे।
यहां एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है: शेष विद्यालयों में छात्राओं के लिए यह सुविधा उपलब्ध कराने की समयसीमा क्या है?
इसके साथ ही, केवल शौचालय का दर्ज होना पर्याप्त नहीं है। पानी, साफ-सफाई, निजता और मासिक धर्म संबंधी आवश्यक सुविधाएं भी सुनिश्चित होनी चाहिए।
शिक्षा विभाग को विद्यालयवार स्थिति का सत्यापन कराना चाहिए और सुविधा उपलब्ध न होने या उसके उपयोग योग्य न रहने पर सुधार की समयसीमा तय करनी चाहिए।
₹13,201 करोड़ का शिक्षा बजट: परिणामों का हिसाब भी हो
उत्तराखंड के 2026-27 के बजट में शिक्षा, खेल, कला एवं संस्कृति के लिए कुल ₹13,201 करोड़ का प्रावधान दर्ज है। इसमें सरकारी प्राथमिक विद्यालयों के लिए ₹3,780 करोड़ और सरकारी माध्यमिक विद्यालयों के लिए ₹4,285 करोड़ आवंटित किए गए हैं।
यह आवंटन शिक्षा क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन बजट की वास्तविक उपयोगिता का आकलन केवल राशि देखकर नहीं किया जा सकता।
यह जानना भी जरूरी है कि कितनी राशि वास्तव में खर्च हुई, कितने रिक्त पद भरे गए, कितने विद्यालयों में बुनियादी सुविधाएं सुधरीं और कितनी छात्राएं माध्यमिक शिक्षा पूरी कर सकीं।
सरकार को बजट आवंटन और वास्तविक व्यय के साथ-साथ शिक्षा के परिणामों की जानकारी भी सार्वजनिक करनी चाहिए। बजट की घोषणा और जमीन पर उसके प्रभाव के बीच का अंतर ही सार्वजनिक जवाबदेही का वास्तविक आधार है।
अब सरकार, शिक्षा विभाग और जिलाधिकारियों से सीधे सवाल
उत्तराखंड सरकार को निम्नलिखित सवालों के जवाब देने चाहिए:
- वर्ष 2025-26 में छात्राओं की विद्यालय छोड़ने की दर बढ़ने के पीछे प्रमुख कारण क्या रहे?
- 2,959 एकल शिक्षक विद्यालयों की स्थिति सुधारने के लिए क्या योजना बनाई गई है?
- छात्राओं के लिए अलग क्रियाशील शौचालयों से वंचित विद्यालयों में सुविधा कब तक उपलब्ध कराई जाएगी?
- पर्वतीय क्षेत्रों में विद्यालयों तक सुरक्षित पहुंच और माध्यमिक शिक्षा की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
- शिक्षा बजट के वास्तविक व्यय और उससे प्राप्त परिणामों की सार्वजनिक समीक्षा कब की जाएगी?
इन सवालों का जवाब केवल घोषणाओं या समीक्षा बैठकों से नहीं, बल्कि सार्वजनिक आंकड़ों, समयबद्ध कार्ययोजना और नियमित प्रगति रिपोर्ट से मिलना चाहिए।
जिलाधिकारियों को अपने-अपने जिलों में शिक्षा संबंधी समस्याओं की समीक्षा करनी चाहिए। शिक्षा विभाग को सुधार की जिम्मेदारी और समयसीमा स्पष्ट करनी चाहिए। जनप्रतिनिधियों को भी अपने क्षेत्रों में विद्यालयों की स्थिति पर नियमित रूप से सवाल उठाने चाहिए।
बेटियों की शिक्षा पर समझौता, उत्तराखंड के भविष्य पर समझौता
शिक्षा से वंचित होने का असर केवल एक बच्ची तक सीमित नहीं रहता। इससे उसके रोजगार, आत्मनिर्भरता, सामाजिक भागीदारी और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने के अवसर प्रभावित हो सकते हैं।
इसलिए शिक्षा को केवल विभागीय योजना या बजट का विषय मानना पर्याप्त नहीं है। यह सामाजिक न्याय और समान अवसर से जुड़ा प्रश्न है।
उत्तराखंड की किसी बेटी की पढ़ाई केवल इसलिए नहीं छूटनी चाहिए कि उसका गांव दूर है, परिवार आर्थिक रूप से कमजोर है, विद्यालय में पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं या जरूरी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।
शिक्षा दान नहीं, अधिकार है। बजट प्रावधान है तो परिणाम भी दिखने चाहिए। योजनाएं हैं तो उनकी प्रगति का हिसाब भी सार्वजनिक होना चाहिए।
अब उत्तराखंड सरकार को बताना होगा कि प्रत्येक बच्ची तक शिक्षा पहुंचाने और उसकी पढ़ाई पूरी कराने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जा रहे हैं।
क्योंकि शिक्षा का अधिकार तभी वास्तविक होगा, जब सरकार की जिम्मेदारी कागजों से निकलकर विद्यालयों और बच्चों के जीवन में दिखाई देगी।
