हर कोई पत्रकार बनने लगेगा तो मुश्किलें पैदा होंगी—CJI सूर्यकांत की टिप्पणी के बीच सवाल यह भी कि क्या बिना सरकारी मान्यता वाला पत्रकार जनता की आवाज उठा सकता है?
लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं, बल्कि नागरिक का अधिकार है। सत्ता से जवाब मांगना, प्रशासन की विफलताओं को उजागर करना और जनता की आवाज को व्यवस्था तक पहुंचाना पत्रकारिता का मूल उद्देश्य है। लेकिन जब पत्रकार कौन है और पत्रकारिता किसे करनी चाहिए, यह सवाल सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचता है, तो बहस केवल एक पेशे की मर्यादा तक सीमित नहीं रहती। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र में असहमति की जगह का सवाल भी बन जाती है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की यह मौखिक टिप्पणी कि यदि हर कोई पत्रकार बनने लगेगा तो दूसरों के लिए मुश्किलें पैदा होंगी, पत्रकारिता के बदलते स्वरूप पर गंभीर विमर्श की मांग करती है। 16 अक्टूबर 2026 को सामने आई इस टिप्पणी के संदर्भ में अदालत स्वतंत्र पत्रकारों, फ्रीलांस पत्रकारों और सोशल मीडिया पर सामग्री बनाने वालों के अधिकारों तथा सुरक्षा के सवालों पर विचार कर रही थी।
लेकिन इस बहस को उत्तराखंड के पहाड़ों से भी देखने की जरूरत है। यहां पत्रकारिता केवल दिल्ली के बड़े मीडिया संस्थानों के दफ्तरों में नहीं होती। यह उन छोटे कस्बों में भी होती है, जहां एक पत्रकार सड़क टूटने, अस्पताल में डॉक्टर न होने, स्कूल में शिक्षकों की कमी, जंगलों में आग, आपदा पीड़ितों की परेशानी और गांवों से लगातार हो रहे पलायन की खबर प्रशासन तक पहुंचाता है।
कोटद्वार का उदाहरण: सवाल पूछना भी पड़ सकता है भारी
मार्च 2025 में कोटद्वार के पत्रकार सुधांशु थपलियाल का मामला चर्चा में आया। एक सड़क दुर्घटना में युवती की मौत के बाद उन्होंने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था। इसके बाद उनके विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज हुई और उन्हें हिरासत में लिया गया। मामले की सुनवाई के दौरान उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पुलिस को उनके विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया।
यह मामला अपने आप में किसी पत्रकार को कानून से ऊपर रखने का तर्क नहीं है। सोशल मीडिया पर लगाए गए आरोप भी तथ्य और कानून की कसौटी पर परखे जाने चाहिए। लेकिन यह घटना एक बुनियादी प्रश्न अवश्य उठाती है—जब कोई पत्रकार पुलिस या प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है, तो क्या उसकी आलोचना को निष्पक्षता से परखा जाता है, या उसे ही परेशानी का कारण मान लिया जाता है?
यही वह प्रश्न है जिसे पत्रकार की सरकारी मान्यता और पेशेवर पहचान की बहस से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
पहाड़ में पत्रकारिता का मतलब केवल प्रेस कार्ड नहीं
उत्तराखंड के पौड़ी, चमोली, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़ और चंपावत जैसे जिलों में स्थानीय पत्रकार कई बार सीमित संसाधनों के साथ काम करते हैं। उनके पास बड़े मीडिया संस्थानों का आर्थिक सहयोग, कानूनी सहायता या तकनीकी सुविधाएं नहीं होतीं। फिर भी वे गांवों की समस्याओं, वन विभाग की कार्रवाई, सड़क और स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली तथा सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर नजर रखते हैं।
कोटद्वार और आसपास के क्षेत्रों में भी अतिक्रमण, नजूल भूमि पर बसे परिवारों, स्थानीय व्यापारियों की आजीविका, नगर निकायों की जवाबदेही और पर्यावरण से जुड़े प्रश्न केवल प्रशासनिक फाइलों के विषय नहीं हैं। इनके पीछे हजारों लोगों के जीवन और अधिकार जुड़े हैं। इन मुद्दों को उठाने वाला पत्रकार यदि किसी बड़े संस्थान से नहीं जुड़ा है या उसके पास सरकारी मान्यता कार्ड नहीं है, तो क्या उसकी रिपोर्टिंग का महत्व कम हो जाता है?
पत्रकार की पहचान का एकमात्र आधार सरकारी कार्ड नहीं हो सकता। सरकारी मान्यता की अपनी निर्धारित प्रक्रिया और उपयोगिता है, लेकिन पत्रकारिता का वास्तविक मूल्य उसके काम, तथ्यों की विश्वसनीयता और जनहित के प्रति जिम्मेदारी से भी तय होता है।
सोशल मीडिया ने आवाज दी, लेकिन जिम्मेदारी भी बढ़ाई
आज मोबाइल फोन और इंटरनेट ने आम नागरिक को भी घटनाओं का साक्ष्य सामने लाने की क्षमता दी है। किसी गांव की टूटी सड़क का वीडियो, अस्पताल की अव्यवस्था की तस्वीर या किसी सार्वजनिक समस्या की जानकारी प्रशासन तक पहुंच सकती है। कई बार ऐसी नागरिक भागीदारी उन मुद्दों को सामने लाती है, जिन्हें पारंपरिक मीडिया पर्याप्त जगह नहीं दे पाता।
लेकिन हर वायरल पोस्ट पत्रकारिता नहीं है। बिना पुष्टि के आरोप लगाना, किसी की निजी जानकारी सार्वजनिक करना, अफवाह फैलाना या किसी को धमकाने के लिए पत्रकारिता का नाम इस्तेमाल करना गलत है। पेशेवर पत्रकारिता में तथ्य-जांच, संबंधित पक्ष का जवाब, सार्वजनिक हित और सुधार की गुंजाइश जैसे मानक जरूरी हैं।
समाधान यह नहीं कि हर नागरिक को पत्रकार मान लिया जाए। समाधान यह भी नहीं कि केवल मान्यता प्राप्त पत्रकारों को ही सवाल पूछने और सार्वजनिक घटनाओं की रिपोर्टिंग करने का अधिकार मिले। जरूरत है स्पष्ट, पारदर्शी और निष्पक्ष नियमों की, जो वास्तविक पत्रकारों की सुरक्षा करें और गलत सूचना फैलाने वालों की जवाबदेही भी तय करें।
पत्रकारिता पर नियंत्रण से किसे लाभ होगा?
उत्तराखंड जैसे राज्य में, जहां पर्यावरण, पर्यटन, वनाधिकार, खनन, आपदा प्रबंधन और पलायन जैसे विषय सीधे जनता के जीवन से जुड़े हैं, स्वतंत्र पत्रकारिता की भूमिका महत्वपूर्ण है। यदि स्थानीय पत्रकारों को अपनी पहचान साबित करने के लिए ऐसी शर्तों का सामना करना पड़े जिन्हें पूरा करना छोटे समाचार पत्रों या स्वतंत्र पत्रकारों के लिए कठिन हो, तो इसका असर केवल पत्रकारों पर नहीं पड़ेगा। उन ग्रामीणों की आवाज भी कमजोर होगी, जिनके पास अपनी समस्या उठाने का दूसरा मंच नहीं है।
दूसरी ओर, पत्रकारिता के नाम पर अनुचित दबाव बनाने वालों को भी संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। प्रेस की स्वतंत्रता और पत्रकार की जवाबदेही एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। एक जिम्मेदार पत्रकार तथ्यों के प्रति जवाबदेह होता है, लेकिन उसे प्रशासन की आलोचना करने के लिए प्रशासन की अनुमति की जरूरत नहीं होनी चाहिए।
संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। इस अधिकार के तहत उचित कानूनी सीमाएं लागू होती हैं, लेकिन स्वतंत्र अभिव्यक्ति को केवल सरकारी मान्यता के साथ जोड़ देना उचित नहीं होगा।
पहाड़ की आवाज को पहचानिए
मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी पत्रकारिता के पेशेवर मानकों और सुरक्षा व्यवस्था पर विचार करने का अवसर देती है। लेकिन इस बहस में छोटे शहरों, ग्रामीण क्षेत्रों और स्वतंत्र पत्रकारों की वास्तविक परिस्थितियों को भी शामिल करना जरूरी है।
उत्तराखंड में जब कोई पत्रकार गांव की बंद पड़ी सड़क, अस्पताल में डॉक्टरों की कमी, जंगलों में अवैध गतिविधियों या विस्थापन की समस्या को सामने लाता है, तो वह केवल खबर नहीं लिखता—वह जनता और शासन के बीच जवाबदेही का माध्यम बनता है।
पत्रकारिता को मर्यादा चाहिए, लेकिन एकाधिकार नहीं। उसे जिम्मेदारी चाहिए, लेकिन मनमाना नियंत्रण नहीं। गलत खबर पर कार्रवाई होनी चाहिए, मगर सही सवाल पूछने वाले को केवल उसकी पहचान या मान्यता के अभाव में कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।
लोकतंत्र की असली परीक्षा यह नहीं कि कितने लोगों को पत्रकार बनने की अनुमति है, बल्कि यह है कि जो लोग जनता के पक्ष में सवाल पूछते हैं, उन्हें बिना भय और भेदभाव के अपना काम करने का अवसर मिलता है या नहीं।
