कृषि विभाग स्थानीय फसलों और पारंपरिक बीजों के संरक्षण की दिशा में काम कर रहा है।
SHABD,Dehradun
उत्तराखण्ड : चमोली जिले के सीमांत गांवों में होती है जैविक खेती
चमोली जिले के सीमांत गांव आज भी जैविक खेती और पारंपरिक फसलों के उत्पादन के लिए पहचाने जाते हैं। यहां के किसान मोटे अनाज, राजमा, आलू और अन्य स्थानीय फसलों का उत्पादन कर अपनी आजीविका चलाते हैं। इन पारंपरिक फसलों और स्थानीय बीजों को भविष्य के लिए संरक्षित करने के उद्देश्य से कृषि विभाग ने पहल शुरू की है। जिले के नंदानगर, देवाल, ज्योतिर्मठ और दशोली विकासखंड के विभिन्न गांवों में पारंपरिक फसलों का उत्पादन किया जाता है। हालांकि, सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में किसानों को अपने उत्पाद बाजार तक पहुंचाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। समय पर उत्पाद बाजार तक नहीं पहुंचने और परिवहन पर अधिक खर्च होने से उन्हें अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। निजमुला घाटी के मानुरा गांव निवासी किसान भी इसी समस्या से जूझ रहे हैं। उनका कहना है कि वह अपने खेतों में आलू, राजमा और अन्य सब्जियों का उत्पादन करते हैं, लेकिन सड़क तक उपज पहुंचाने में अधिक भाड़ा खर्च करना पड़ता है। इससे खेती की लागत बढ़ जाती है और मेहनत के अनुरूप आमदनी नहीं हो पाती। दूसरी ओर कृषि विभाग स्थानीय फसलों और पारंपरिक बीजों के संरक्षण की दिशा में काम कर रहा है। मुख्य कृषि अधिकारी के अनुसार, जिले में स्थानीय बीजों को संरक्षित करने के लिए योजना तैयार की जा रही है। इसके तहत गांवों में स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से बीज संग्रहण और संरक्षण का कार्य किया जा रहा है, ताकि आने वाली पीढ़ियों तक स्थानीय कृषि परंपराओं को सुरक्षित रखा जा सके।
बाइट – वीरेंद्र सिंह, किसान, मानुरा गांव, चमोली
बाइट – जयप्रकाश तिवारी, मुख्य कृषि अधिकारी, चमोली
