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भारत को दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में गिना जाता है। यही युवा शक्ति भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने की सबसे बड़ी ताकत मानी जा रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत अपने युवाओं को पर्याप्त संख्या में सम्मानजनक, उत्पादक और स्थायी रोजगार दे पा रहा है?

NITI Aayog की हालिया रिपोर्ट “Reimagining Skilling for Viksit Bharat@2047” ने इस सवाल को और गंभीर बना दिया है। रिपोर्ट केवल बेरोजगारी की दर पर बात नहीं करती, बल्कि शिक्षा, कौशल, रोजगार और उद्योग की जरूरतों के बीच मौजूद अंतर को रेखांकित करती है। रिपोर्ट में 15–29 वर्ष के युवाओं को NEET—यानी शिक्षा, रोजगार या प्रशिक्षण से बाहर—की श्रेणी में भी देखा गया है।

समस्या केवल बेरोजगारी नहीं, रोजगार की गुणवत्ता भी है

भारत में रोजगार के आंकड़ों को देखते समय केवल Unemployment Rate पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। यदि कोई व्यक्ति किसी छोटे असंगठित काम, कम आय वाले स्वरोजगार या अस्थायी काम में लगा है, तो वह सांख्यिकीय रूप से बेरोजगार नहीं माना जाता। लेकिन उसका रोजगार आर्थिक सुरक्षा और भविष्य की स्थिरता की गारंटी नहीं देता।

NITI Aayog की रिपोर्ट इसी व्यापक चुनौती की ओर संकेत करती है। भारत को ऐसे रोजगार की जरूरत है जो युवाओं को केवल काम न दे, बल्कि आय, कौशल-वृद्धि, सामाजिक सुरक्षा और आगे बढ़ने का अवसर भी दे।

यही वह बिंदु है जहां भारत के विकास मॉडल की वास्तविक परीक्षा शुरू होती है।

डिग्री और नौकरी के बीच बढ़ती दूरी

आज लाखों युवा कॉलेज और विश्वविद्यालयों से डिग्री लेकर निकल रहे हैं। दूसरी ओर उद्योगों को ऐसे युवाओं की जरूरत है जिनके पास व्यावहारिक कौशल, डिजिटल दक्षता, तकनीकी क्षमता और समस्या-समाधान की योग्यता हो।

NITI Aayog का मार्च 2026 का अध्ययन “Education and Skilling for Employment: From Credentials to Learning Outcomes” इसी शिक्षा और रोजगार के बीच मौजूद अंतर पर केंद्रित है। रिपोर्ट का मूल सवाल है कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था केवल प्रमाणपत्र दे रही है या वास्तव में रोजगार योग्य मानव संसाधन तैयार कर रही है?

यह प्रश्न विशेष रूप से सरकारी भर्ती की तैयारी कर रहे युवाओं के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। जब निजी क्षेत्र पर्याप्त गुणवत्तापूर्ण रोजगार नहीं पैदा करता और सरकारी नौकरियां सीमित होती हैं, तो लाखों युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगे रहते हैं। इससे उनकी उत्पादक उम्र का महत्वपूर्ण हिस्सा रोजगार की प्रतीक्षा में निकल सकता है।

NEET युवा केवल आंकड़ा नहीं, नीति की चेतावनी हैं

NEET युवाओं का मुद्दा और गंभीर है। शिक्षा से बाहर, रोजगार से बाहर और प्रशिक्षण से बाहर रहने वाला युवा केवल वर्तमान आर्थिक व्यवस्था से बाहर नहीं होता; वह भविष्य की उत्पादक क्षमता से भी दूर हो सकता है।

ऐसे युवाओं में बेरोजगार नौकरी तलाशने वाले लोग हो सकते हैं, लेकिन घरेलू जिम्मेदारियों में लगे युवा और अन्य कारणों से शिक्षा एवं रोजगार से बाहर लोग भी शामिल हो सकते हैं। इसलिए NEET की समस्या का समाधान केवल रोजगार कार्यालय खोलने से नहीं होगा।

इसके लिए करियर काउंसलिंग, व्यावसायिक शिक्षा, apprenticeships, स्थानीय उद्योग, डिजिटल कौशल और उद्यमिता को एकीकृत करना होगा।

उत्तराखंड के लिए यह चेतावनी और भी गंभीर है

उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य के लिए यह विषय केवल रोजगार का नहीं बल्कि पलायन और क्षेत्रीय असंतुलन का भी प्रश्न है।

पहाड़ में पढ़ा-लिखा युवा यदि अपने गांव या जिले में रोजगार नहीं पाता तो उसके सामने सामान्यतः तीन विकल्प बचते हैं—देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश जैसे मैदानी शहरों की ओर जाना; दिल्ली-एनसीआर या दूसरे राज्यों में पलायन करना; अथवा सरकारी नौकरी की तैयारी में वर्षों लगाना।

इस स्थिति में पहाड़ की युवा आबादी धीरे-धीरे कम होती है और गांवों की अर्थव्यवस्था कमजोर होती जाती है।

उत्तराखंड की रोजगार नीति इसलिए केवल सरकारी पदों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। राज्य को स्थानीय अर्थव्यवस्था आधारित रोजगार मॉडल बनाना होगा।

पहाड़ में रोजगार के हजारों अवसर मौजूद हैं

उत्तराखंड में रोजगार की कमी को केवल “नौकरी की कमी” के रूप में देखना गलत होगा। समस्या यह भी है कि स्थानीय संसाधनों को रोजगार में बदलने की क्षमता पर्याप्त विकसित नहीं हुई है।

हिमालयी कृषि, बागवानी, जड़ी-बूटी, खाद्य प्रसंस्करण, मधुमक्खी पालन, हस्तशिल्प, ऊन, स्थानीय अनाज, पर्यटन, होमस्टे, साहसिक पर्यटन, धार्मिक पर्यटन, वन-आधारित उद्यम और डिजिटल सेवाएं—ये सभी बड़े रोजगार क्षेत्र बन सकते हैं।

लेकिन इसके लिए केवल योजनाओं की घोषणा नहीं, बल्कि बाजार, वित्त, प्रशिक्षण, तकनीक, ब्रांडिंग और बिक्री की पूरी श्रृंखला विकसित करनी होगी।

यदि पौड़ी का मंडुवा केवल कच्चे अनाज के रूप में बिकता है तो किसान को सीमित आय मिलेगी। वही मंडुवा यदि पैकेज्ड फूड, रेडी-टू-कुक उत्पाद या स्वास्थ्य उत्पाद के रूप में बाजार तक पहुंचे तो मूल्यवर्धन और रोजगार दोनों बढ़ सकते हैं।

इसी तरह बुरांश, माल्टा, शहद, जड़ी-बूटियों और स्थानीय हस्तशिल्प को केवल “स्थानीय उत्पाद” कहने के बजाय राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ना होगा।

Skill India से आगे बढ़ने का समय

NITI Aayog की नई रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि भारत को skilling को employment से जोड़ना होगा। केवल प्रशिक्षण प्रमाणपत्र बांटने से रोजगार पैदा नहीं होगा। प्रशिक्षण का मूल्य तभी है जब उसके बाद व्यक्ति को काम, बाजार या अपना व्यवसाय शुरू करने की वास्तविक संभावना मिले।

इसलिए प्रत्येक जिले में यह पता होना चाहिए कि अगले पांच और दस वर्षों में किन क्षेत्रों में रोजगार पैदा हो सकता है।

उत्तराखंड में उदाहरण के लिए यदि किसी जिले में पर्यटन की संभावना अधिक है तो प्रशिक्षण भी उसी के अनुरूप हो—हॉस्पिटैलिटी, गाइडिंग, भाषा, डिजिटल मार्केटिंग, स्थानीय भोजन, ट्रैवल मैनेजमेंट और साहसिक पर्यटन।

जहां कृषि प्रमुख है वहां खाद्य प्रसंस्करण, cold chain, packaging, branding और e-commerce पर जोर होना चाहिए।

रोजगार नीति का केंद्र युवा होना चाहिए, केवल आंकड़े नहीं

भारत को अब यह तय करना होगा कि वह रोजगार के आंकड़ों को बेहतर दिखाना चाहता है या युवाओं का वास्तविक जीवन बेहतर बनाना चाहता है।

युवा को केवल “employed” घोषित कर देना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना होगा कि उसकी आय कितनी है, काम कितना सुरक्षित है, सामाजिक सुरक्षा है या नहीं, कौशल बढ़ रहा है या नहीं और क्या वह भविष्य में अपनी आय बढ़ा सकता है।

NITI Aayog की 2025 Voluntary National Review भी युवाओं को सशक्त करने, skilling और employment opportunities बढ़ाने तथा workforce में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने को महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं में रखती है।

सरकारों को अब रोजगार का जिला-स्तरीय मॉडल बनाना चाहिए

भारत में रोजगार नीति को राष्ट्रीय और राज्य स्तर से आगे बढ़ाकर district employment planning से जोड़ना चाहिए।

हर जिले के लिए स्पष्ट लक्ष्य होने चाहिए—

  • कितने नए रोजगार पैदा होंगे?
  • किस क्षेत्र में पैदा होंगे?
  • कितने युवाओं को प्रशिक्षण मिलेगा?
  • प्रशिक्षण के बाद कितनों को रोजगार मिलेगा?
  • कितने युवा उद्यमी बनेंगे?
  • महिलाओं की रोजगार भागीदारी कितनी बढ़ेगी?
  • कितने युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिलेगा?

इसका सार्वजनिक डैशबोर्ड भी होना चाहिए ताकि सरकार के दावों की स्वतंत्र रूप से समीक्षा की जा सके।

निष्कर्ष: 2047 की असली परीक्षा

भारत के पास विशाल युवा आबादी है। यह जनसांख्यिकीय लाभ तभी आर्थिक शक्ति बनेगा जब युवाओं को शिक्षा, कौशल और रोजगार की एक मजबूत श्रृंखला उपलब्ध हो।

अन्यथा यही demographic dividend भविष्य में demographic burden बन सकता है।

विकसित भारत का रास्ता केवल GDP, एक्सप्रेसवे और बड़े निवेश से नहीं निकलेगा। उसकी असली बुनियाद उस युवा के हाथ में होगी जिसे आज शिक्षा के बाद सम्मानजनक रोजगार चाहिए।

उत्तराखंड के लिए चुनौती और बड़ी है। यहां सवाल केवल यह नहीं कि युवाओं को नौकरी मिले; सवाल यह भी है कि क्या पहाड़ का युवा अपने गांव में रहकर सम्मानजनक आय अर्जित कर सकता है?

यदि इसका उत्तर “हां” नहीं है तो पलायन जारी रहेगा, गांव कमजोर होंगे और विकास का लाभ असमान रूप से वितरित होगा।

इसलिए अब समय आ गया है कि रोजगार को चुनावी वादे की भाषा से निकालकर मापने योग्य आर्थिक नीति का केंद्र बनाया जाए।

क्योंकि 2047 का विकसित भारत आज के युवा की रोजगार स्थिति से तय होगा—और पहाड़ का भविष्य इस बात से कि उसका युवा पहाड़ छोड़ता है या पहाड़ में अवसर पैदा करता है।


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By udaen

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