रिकॉर्ड कमाई बनाम रिकॉर्ड कर्ज: विकास के दावों का हिसाब कौन देगा?
देश में जब विकास के आंकड़े पेश किए जाते हैं तो अक्सर बड़ी परियोजनाओं, बढ़ते बाजार पूंजीकरण, रिकॉर्ड निवेश और आर्थिक वृद्धि की चर्चा होती है। लेकिन लोकतंत्र में एक दूसरा सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है—इस विकास का लाभ किसे मिला और इसकी कीमत कौन चुका रहा है?
आज आम नागरिक के सामने यही विरोधाभास खड़ा है। एक तरफ देश के कुछ बड़े कारोबारी समूहों की संपत्ति और आय में असाधारण वृद्धि की खबरें आती हैं, दूसरी तरफ केंद्र सरकार की देनदारियां लगातार बढ़ती दिखाई देती हैं। भारतीय जनता पार्टी की चुनावी और राजनीतिक आय में वृद्धि के आंकड़े भी सार्वजनिक बहस का हिस्सा हैं। इन सभी आंकड़ों को एक ही तराजू पर रखना आर्थिक रूप से सही नहीं होगा, लेकिन इनके बीच मौजूद असमानता और जवाबदेही का सवाल जरूर लोकतांत्रिक विमर्श का विषय है।
यहां सबसे जरूरी बात आंकड़ों की राजनीतिक व्याख्या नहीं, बल्कि उनकी पारदर्शी जांच है।
यदि 2014 के आसपास केंद्र सरकार की कुल देनदारियां लगभग ₹55 लाख करोड़ के स्तर पर थीं और आने वाले वर्षों में यह आंकड़ा ₹200 लाख करोड़ से अधिक पहुंच गया है, तो सरकार को यह बताना चाहिए कि इस वृद्धि में किन-किन मदों की भूमिका है। इसमें केंद्र सरकार की प्रत्यक्ष देनदारी, बाजार ऋण, बाहरी ऋण, सार्वजनिक खाते तथा अन्य देनदारियों को अलग-अलग समझना होगा।
क्योंकि कर्ज अपने आप में अपराध नहीं है। सरकारें सड़क, रेल, रक्षा, ऊर्जा, स्वास्थ्य, शिक्षा और आधारभूत ढांचे के लिए उधार लेती हैं। सवाल यह है कि कर्ज लेकर बनाई गई परिसंपत्तियों से आम जनता को कितना लाभ मिला और उस कर्ज की अदायगी का बोझ किस पर पड़ेगा?
यही वह बिंदु है जहां विकास के चमकदार ग्राफ और जमीन की वास्तविकता आमने-सामने आ जाते हैं।
आम आदमी का सवाल सिर्फ कर्ज का नहीं है
देश का गरीब नागरिक यह नहीं पूछ रहा कि किसी उद्योगपति की संपत्ति क्यों बढ़ी। वह यह भी नहीं कह रहा कि बड़े उद्योगपति सफल क्यों हुए।
उसका सवाल इससे कहीं ज्यादा बुनियादी है—
मेरी आय क्यों नहीं बढ़ रही?
मेरी जमीन का मूल्यांकन कौन तय करेगा?
मेरे गांव में बिजली क्यों नहीं है?
सड़क बारिश में क्यों टूट जाती है?
पीने का पानी नियमित क्यों नहीं आता?
युवाओं को रोजगार क्यों नहीं मिलता?
और सरकारी योजनाओं का लाभ आखिरी व्यक्ति तक क्यों नहीं पहुंचता?
यदि देश की अर्थव्यवस्था बढ़ रही है तो उसका असर गांव के घर तक दिखाई देना चाहिए।
किसी सैनिक का बेटा यदि आज भी अस्थायी खंभे के सहारे बिजली के तार खींचकर अपने घर को रोशन करने की कोशिश कर रहा है, तो उसके लिए GDP का आंकड़ा तब तक अधूरा है जब तक उसके घर में स्थायी बिजली नहीं पहुंचती।
किसी किसान के पास जमीन है लेकिन सिंचाई नहीं है, किसी गांव में सड़क है लेकिन बरसात में संपर्क टूट जाता है, किसी परिवार के पास मकान है लेकिन पीने का पानी नहीं—तो विकास के दावों की परीक्षा इन्हीं परिस्थितियों में होनी चाहिए।
अंबानी-अडानी नहीं, व्यवस्था से सवाल
राजनीतिक बहस में अक्सर बड़े उद्योगपतियों के नाम प्रतीक बन जाते हैं। लेकिन लोकतांत्रिक सवाल व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं होना चाहिए।
अंबानी से बैर नहीं, अडानी से लड़ाई नहीं। सवाल व्यवस्था से है।
यदि किसी निजी कारोबारी ने वैध तरीके से संपत्ति बनाई है तो उसे संपत्ति बनाने का अधिकार है। बाजार अर्थव्यवस्था में उद्यमिता और पूंजी निर्माण आवश्यक हैं।
लेकिन सरकार और बड़े कारोबार के संबंधों में पारदर्शिता, प्रतिस्पर्धा और समान अवसर सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है।
सरकार की नीतियां ऐसी होनी चाहिए कि छोटे उद्यमी, किसान, श्रमिक और स्थानीय कारोबारी भी आर्थिक विकास में भागीदार बन सकें।
अगर बड़े उद्योगों को हजारों करोड़ की परियोजनाएं मिलती हैं, तो छोटे उद्यमी को बैंक ऋण, लाइसेंस, बाजार और भुगतान के लिए महीनों कार्यालयों के चक्कर क्यों लगाने पड़ें?
यही वास्तविक प्रश्न है।
राजनीतिक दलों की बढ़ती आय पर भी सवाल जरूरी
यदि किसी राजनीतिक दल की आय कुछ वर्षों में कई गुना बढ़ती है तो यह भी लोकतांत्रिक पारदर्शिता का विषय है।
राजनीतिक दल लोकतंत्र के महत्वपूर्ण संस्थान हैं। उनके पास आने वाला पैसा जनता के राजनीतिक अधिकारों को प्रभावित कर सकता है। इसलिए राजनीतिक चंदे की व्यवस्था जितनी पारदर्शी होगी, लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा।
यह सवाल केवल भारतीय जनता पार्टी से नहीं बल्कि हर राजनीतिक दल से पूछा जाना चाहिए।
राजनीति में धन का बढ़ता प्रभाव चुनावों को महंगा बनाता है। महंगे चुनाव अंततः उस व्यवस्था को जन्म दे सकते हैं जिसमें आम नागरिक की राजनीतिक भागीदारी कमजोर और आर्थिक रूप से शक्तिशाली समूहों का प्रभाव मजबूत होता जाता है।
इसलिए सवाल होना चाहिए—
चंदा किससे आया?
कितना आया?
किस नियम के तहत आया?
किसे राजनीतिक लाभ मिला?
और जनता को इसकी जानकारी कितनी है?
कर्ज बढ़ना विकास का प्रमाण नहीं
कर्ज बढ़ना अपने आप में विकास का प्रमाण नहीं है।
यदि ₹100 का कर्ज लेकर ₹150 की उत्पादक संपत्ति बनाई जाती है, रोजगार पैदा होता है और भविष्य में राजस्व बढ़ता है, तो यह आर्थिक दृष्टि से अलग स्थिति है।
लेकिन यदि कर्ज बढ़ता रहे और नागरिक सेवाओं की गुणवत्ता उसी अनुपात में न बढ़े, रोजगार पर्याप्त न पैदा हो, किसानों की आय दबाव में रहे और स्थानीय निकाय बुनियादी सुविधाओं के लिए संसाधनों की कमी से जूझते रहें, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
इसीलिए सरकार को केवल यह नहीं बताना चाहिए कि उसने कितना खर्च किया।
उसे यह भी बताना चाहिए—
कहां खर्च किया?
किस परियोजना पर कितना खर्च हुआ?
परियोजना की लागत कितनी बढ़ी?
किसे ठेका मिला?
काम पूरा हुआ या नहीं?
और उस निवेश से जनता को क्या मिला?
यही असली ‘विकास का हिसाब’ है।
गांव के बावन बीघा से दिल्ली के बजट तक
भारत की आर्थिक कहानी केवल मुंबई के शेयर बाजार या दिल्ली के बजट दस्तावेजों में नहीं लिखी जाती।
वह कहानी उत्तराखंड के गांव में भी लिखी जाती है।
वह उस किसान की जमीन में लिखी जाती है जिसकी रजिस्ट्री वर्षों से विवादित है।
वह उस पूर्व सैनिक के घर में लिखी जाती है जिसने देश के लिए सेवा की लेकिन अपने गांव में सड़क और बिजली के लिए आज भी संघर्ष करना पड़ रहा है।
वह उस युवा की आंखों में लिखी जाती है जो पहाड़ से पलायन कर गया क्योंकि उसके गांव में रोजगार नहीं था।
और वह उस परिवार के जीवन में लिखी जाती है जिसने मेहनत से पैसा जोड़ा लेकिन सरकारी व्यवस्था की जटिलताओं के बीच अपनी ही संपत्ति के अधिकार के लिए संघर्ष करना पड़ा।
इसलिए दिल्ली के आर्थिक ग्राफ और गांव की जमीन के बीच की दूरी कम करना ही वास्तविक विकास है।
सरकार से पांच सीधे सवाल
देश के नागरिकों को राजनीतिक नारों से अधिक अब सार्वजनिक हिसाब चाहिए।
- केंद्र सरकार की कुल देनदारियों में वृद्धि का वर्षवार विवरण क्या है?
- इस बढ़े हुए कर्ज से कितनी उत्पादक परिसंपत्तियां और कितने रोजगार पैदा हुए?
- राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे और उनकी आय का पूरा पारदर्शी विवरण जनता को कब मिलेगा?
- बड़े कॉरपोरेट समूहों को मिलने वाले सरकारी ठेकों और नीतिगत लाभों में प्रतिस्पर्धा और पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित की जा रही है?
- गांवों में बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य और रोजगार के लिए खर्च किए गए प्रत्येक बड़े बजट का सामाजिक ऑडिट क्यों न हो?
इन सवालों को पूछना राजनीति नहीं है।
जनता का पैसा और जनता का कर्ज—दोनों पर जनता का सवाल पूछना लोकतंत्र है।
विकास का अर्थ आखिरी व्यक्ति तक रोशनी पहुंचना है
भारत को बड़े उद्योग चाहिए। मजबूत कॉरपोरेट चाहिए। विदेशी निवेश चाहिए। आधुनिक आधारभूत ढांचा चाहिए। वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत की मजबूत स्थिति भी जरूरी है।
लेकिन इसके साथ एक और चीज जरूरी है—समान अवसर।
देश की सफलता तब मानी जाएगी जब अरबपति और गरीब के बीच केवल संपत्ति का अंतर नहीं बल्कि अवसरों का अंतर भी लगातार कम हो।
जब पहाड़ का युवा रोजगार के लिए मजबूरी में पलायन न करे।
जब सैनिक का परिवार बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष न करे।
जब किसान अपनी जमीन के अधिकार के लिए वर्षों तक दफ्तरों के चक्कर न लगाए।
जब छोटे व्यापारी को बड़े उद्योग की तरह संस्थागत सुविधा मिले।
और जब सरकार यह कह सके कि देश पर जितना कर्ज बढ़ा है, उसके बदले जनता को उतनी ही स्पष्ट और मापने योग्य संपत्ति, सुविधा और अवसर मिले हैं।
किसी की कमाई बढ़ने से हमें जलन नहीं होनी चाहिए।
लेकिन देश का कर्ज बढ़े और नागरिक का जीवन उसी अनुपात में बेहतर न हो, तो सवाल जरूर होना चाहिए।
क्योंकि लोकतंत्र में जनता केवल वोट देने वाली भीड़ नहीं है।
वह करदाता है।
वह नागरिक है।
वह कर्ज चुकाने वाली पीढ़ी है।
और सबसे बढ़कर—वह इस देश की असली हिस्सेदार है।
इसलिए सवाल किसी व्यक्ति से नहीं, पूरी व्यवस्था से है—
रिकॉर्ड कमाई किसकी हुई, यह बाजार बताएगा।
रिकॉर्ड कर्ज किसके नाम है, इसका हिसाब सरकार को देना होगा।
और उस कर्ज के बदले आम आदमी को क्या मिला—इसका जवाब इतिहास नहीं, आज की जनता मांगेगी।
यही विकास की असली कसौटी है।
कुछ की कमाई बढ़े—बढ़े।
लेकिन देश बढ़े तो हर घर बढ़े।
कर्ज बढ़े तो संपत्ति और अवसर भी बढ़ें।
और विकास हो तो उसका उजाला गांव के आखिरी घर तक पहुंचे।
