उत्तराखंड की स्थापना को 26 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं, लेकिन पहाड़ का सबसे बड़ा सवाल आज भी वही है—युवा रोजगार के लिए बाहर क्यों जा रहा है?
NITI Aayog से जुड़ी उत्तराखंड की विकास रणनीति में अगले पांच वर्षों में लगभग 8–9 लाख रोजगार के अवसर सृजित करने की आवश्यकता/लक्ष्य सामने आया है। खाद्य प्रसंस्करण, आधुनिक कृषि, ग्रामीण पर्यटन और युवाओं के कौशल विकास को रोजगार के प्रमुख क्षेत्र माना गया है।
यह लक्ष्य महत्वाकांक्षी है। लेकिन इसके साथ एक बुनियादी सवाल भी खड़ा होता है—
इन 8–9 लाख रोजगारों में पहाड़ के युवाओं का हिस्सा कितना होगा?
क्योंकि उत्तराखंड में रोजगार का संकट केवल बेरोजगारी का संकट नहीं है। यह क्षेत्रीय असमानता, पलायन, मौसमी रोजगार और कम आय वाले काम का भी संकट है।
रोजगार पैदा करना और रोजगार रोकना—दो अलग बातें
देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर जैसे क्षेत्रों में उद्योग, निर्माण, शिक्षा, स्वास्थ्य और सेवा क्षेत्र रोजगार पैदा करते हैं। लेकिन यदि राज्य की अधिकांश नई नौकरियां इन्हीं क्षेत्रों में केंद्रित होती हैं तो पहाड़ी जिलों की मूल समस्या बनी रहेगी।
पौड़ी का युवा देहरादून चला गया, चमोली का युवा ऋषिकेश या दिल्ली चला गया और पिथौरागढ़ का युवा हल्द्वानी या महानगरों में चला गया—तो राज्य के रोजगार आंकड़े भले सुधर जाएं, लेकिन पहाड़ का सामाजिक-आर्थिक ढांचा कमजोर होता रहेगा।
इसलिए उत्तराखंड की रोजगार नीति का मूल्यांकन राज्य स्तर पर नहीं, जिला और ब्लॉक स्तर पर होना चाहिए।
युवा केवल नौकरी मांगने वाला नहीं, आर्थिक शक्ति है
उत्तराखंड के युवाओं को सरकारी नौकरी के लिए दोष देना आसान है। लेकिन इसके पीछे की आर्थिक वास्तविकता को समझना होगा।
जब स्थानीय स्तर पर स्थायी निजी रोजगार सीमित हो, खेती से आय अनिश्चित हो, छोटे कारोबार के लिए पूंजी और बाजार की समस्या हो और पर्यटन मौसमी हो, तब सरकारी नौकरी स्वाभाविक रूप से सबसे सुरक्षित विकल्प दिखाई देती है।
इसलिए समाधान यह नहीं कि युवाओं से कहा जाए कि वे सरकारी नौकरी की तैयारी छोड़ दें।
समाधान यह है कि सरकार स्थानीय स्तर पर ऐसे विकल्प पैदा करे जिनमें युवा सम्मानजनक और स्थायी आय अर्जित कर सके।
उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था में रोजगार की अपार संभावनाएं
राज्य को रोजगार के लिए केवल बड़े उद्योगों की प्रतीक्षा करने की जरूरत नहीं है।
मंडुवा, झंगोरा, गहत, भट्ट, राजमा, माल्टा, बुरांश, शहद, जड़ी-बूटियां, फल-सब्जियां, हस्तशिल्प और ऊनी उत्पाद—ये सभी रोजगार के बड़े आधार बन सकते हैं।
समस्या यह है कि हम अक्सर स्थानीय उत्पाद को कच्चे माल के रूप में बेच देते हैं।
यदि मंडुवा खेत से सीधे बाजार में जाता है तो उसका मूल्य सीमित रहता है। लेकिन वही मंडुवा processing, packaging, branding और e-commerce से जुड़ता है तो किसान के साथ processor, packaging worker, transporter, marketer और retailer के लिए भी रोजगार पैदा होता है।
यही मॉडल बुरांश, माल्टा, शहद और अन्य हिमालयी उत्पादों पर लागू किया जा सकता है।
पर्यटन को रोजगार की पूरी श्रृंखला बनाना होगा
उत्तराखंड में पर्यटन की क्षमता को अक्सर होटल और तीर्थयात्रा तक सीमित करके देखा जाता है।
जबकि ग्रामीण पर्यटन, होमस्टे, ट्रेकिंग, adventure tourism, स्थानीय भोजन, हस्तशिल्प, सांस्कृतिक कार्यक्रम, स्थानीय गाइड, परिवहन, फोटोग्राफी और डिजिटल marketing—सभी रोजगार पैदा कर सकते हैं।
NITI Aayog ने भी उत्तराखंड में homestay को स्थानीय आर्थिक अवसर और out-migration कम करने की संभावित रणनीति के रूप में रेखांकित किया है।
लेकिन होमस्टे की सफलता तभी होगी जब उसके आसपास स्थानीय अर्थव्यवस्था विकसित हो। पर्यटक कमरे में ठहरे और भोजन, परिवहन, गाइड, खरीदारी तथा मनोरंजन का लाभ भी स्थानीय लोगों को मिले—तभी पर्यटन वास्तव में community-based employment model बनेगा।
Skill development की सफलता रोजगार से मापी जाए
उत्तराखंड में युवाओं को प्रशिक्षण देने वाली योजनाओं की कमी नहीं है। कमी है तो प्रशिक्षण और रोजगार के बीच मजबूत कड़ी की।
किसी युवा को तीन महीने का certificate दे देना कौशल विकास की सफलता नहीं है।
सवाल होना चाहिए—
प्रशिक्षण के बाद उसे नौकरी मिली या नहीं?
उसकी आय कितनी बढ़ी?
क्या उसने अपना उद्यम शुरू किया?
छह महीने या एक साल बाद वह काम में बना रहा या नहीं?
यदि इन सवालों का जवाब नहीं मिलता तो skill development केवल प्रमाणपत्र वितरण की प्रक्रिया बनकर रह जाएगी।
हर जिले की अलग रोजगार रणनीति क्यों जरूरी है?
उत्तराखंड की भौगोलिक विविधता ऐसी है कि पूरे राज्य के लिए एक जैसा रोजगार मॉडल प्रभावी नहीं हो सकता।
पौड़ी में ग्रामीण पर्यटन, food processing और horticulture की अलग संभावनाएं हैं।
चमोली और रुद्रप्रयाग में धार्मिक एवं adventure tourism के साथ स्थानीय उत्पादों का बड़ा बाजार है।
उत्तरकाशी में पर्यटन, horticulture और पर्वतीय कृषि की संभावनाएं हैं।
अल्मोड़ा और बागेश्वर में हस्तशिल्प, स्थानीय खाद्य उत्पाद और wellness tourism विकसित किया जा सकता है।
पिथौरागढ़ जैसे सीमांत जिलों में पर्यटन, स्थानीय उत्पाद और सीमा क्षेत्र की विशेष आर्थिक गतिविधियों को रोजगार से जोड़ा जा सकता है।
इसलिए “One District, One Employment Strategy” उत्तराखंड के लिए अधिक व्यावहारिक मॉडल हो सकता है।
सरकार से अब आंकड़ों के साथ जवाबदेही भी अपेक्षित है
यदि 8–9 लाख रोजगार का लक्ष्य रखा जाता है तो इसकी सार्वजनिक निगरानी भी होनी चाहिए।
हर वर्ष सरकार को बताना चाहिए—
- कितने नए रोजगार पैदा हुए?
- कितने रोजगार पहाड़ी जिलों में बने?
- कितने स्थायी और कितने मौसमी हैं?
- कितने युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिला?
- कितने नए उद्यम शुरू हुए?
- कितने उद्यम बंद हुए?
- महिलाओं के लिए कितने रोजगार बने?
- औसत आय में कितना सुधार हुआ?
- पलायन करने वाले युवाओं की संख्या में क्या बदलाव आया?
रोजगार की घोषणा से ज्यादा महत्वपूर्ण रोजगार का सामाजिक प्रभाव है।
पलायन रोकने का सबसे प्रभावी रास्ता रोजगार है
उत्तराखंड में पलायन रोकने के लिए वर्षों से योजनाएं बनती रही हैं। लेकिन पलायन किसी सरकारी आदेश से नहीं रुकता।
जब गांव में आय का अवसर नहीं होता तो सड़क, बिजली और इंटरनेट भी युवा को रोक नहीं सकते।
युवा वहीं रहेगा जहां उसे रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन मिलेगा।
इसलिए पलायन रोकने की सबसे प्रभावी नीति वास्तव में स्थानीय रोजगार नीति है।
निष्कर्ष
NITI Aayog के 8–9 लाख रोजगार के लक्ष्य को उत्तराखंड के लिए एक बड़े अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। लेकिन यह अवसर तभी ऐतिहासिक उपलब्धि बनेगा जब रोजगार का लाभ केवल देहरादून और मैदानी औद्योगिक क्षेत्रों तक सीमित न रहे।
उत्तराखंड को अब रोजगार की ऐसी नीति चाहिए जिसमें स्थानीय संसाधन, स्थानीय युवा, स्थानीय उद्यम और स्थानीय बाजार एक-दूसरे से जुड़े हों।
सरकार को यह तय करना होगा कि उसका लक्ष्य केवल बेरोजगारी दर कम करना है या उत्तराखंड के गांवों की अर्थव्यवस्था को मजबूत करना।
क्योंकि पहाड़ का युवा अगर अपने गांव में ₹20–30 हजार की सम्मानजनक और नियमित आय कमा सकता है, तो उसे पलायन के लिए मजबूर नहीं होना पड़ेगा।
विकसित उत्तराखंड का असली पैमाना यह नहीं होगा कि कितने रोजगार के आंकड़े जारी किए गए। असली पैमाना यह होगा कि कितने युवाओं ने रोजगार के लिए अपना घर, गांव और पहाड़ छोड़ना बंद किया।
8–9 लाख रोजगार का लक्ष्य तभी सफल माना जाएगा, जब उत्तराखंड का युवा यह कह सके—“रोजगार के लिए मुझे अपना पहाड़ छोड़ने की जरूरत नहीं है।”
