Spread the love

लोकतंत्र की सफलता केवल चुनावों से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से भी तय होती है कि उसके संस्थान कितने स्वतंत्र और जवाबदेह हैं। इनमें पत्रकारिता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ इसलिए कहा गया है क्योंकि उसका मूल उद्देश्य सत्ता की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछना और जनता के मुद्दों को देश के सामने लाना है।

सत्ता चाहे किसी भी राजनीतिक दल की हो, लोकतंत्र में उसका उत्तरदायित्व जनता के प्रति होता है। इस उत्तरदायित्व को सुनिश्चित करने का कार्य पत्रकारिता करती है। जब मीडिया सरकार की नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों और सार्वजनिक धन के उपयोग पर प्रश्न उठाता है, तब वह किसी सरकार का विरोध नहीं कर रहा होता, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत कर रहा होता है। सवाल पूछना लोकतंत्र का अधिकार है और उन सवालों को जनता तक पहुँचाना पत्रकारिता का कर्तव्य।

दुर्भाग्य से आज पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा प्रतिस्पर्धा, टीआरपी, राजनीतिक ध्रुवीकरण और व्यावसायिक हितों के दबाव में दिखाई देता है। कई बार जनता के वास्तविक मुद्दे—बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, पर्यावरण, किसानों और श्रमिकों की समस्याएँ—हाशिए पर चले जाते हैं, जबकि राजनीतिक बयानबाज़ी और सनसनीखेज़ विषय प्रमुखता पा लेते हैं। इससे लोकतंत्र की गुणवत्ता प्रभावित होती है और जनता का मीडिया पर विश्वास भी कमजोर पड़ता है।

एक स्वतंत्र पत्रकार की सबसे बड़ी पूंजी उसकी विश्वसनीयता होती है। यदि पत्रकार सत्ता से असहज सवाल पूछने का साहस खो देता है या विपक्ष से भी समान कठोरता से प्रश्न नहीं करता, तो उसकी निष्पक्षता संदेह के घेरे में आ जाती है। पत्रकारिता का दायित्व किसी पक्ष का समर्थन या विरोध करना नहीं, बल्कि तथ्यों के आधार पर सत्य को सामने रखना है। सत्ता की उपलब्धियों को भी तथ्यात्मक रूप से प्रस्तुत करना और उसकी कमियों को भी निर्भीकता से उजागर करना—यही संतुलित पत्रकारिता है।

पत्रकारिता का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि समाज को जागरूक करना, शासन को जवाबदेह बनाना और नागरिकों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करना भी है। जब मीडिया जनता की आवाज़ बनता है, तब लोकतंत्र मजबूत होता है। लेकिन जब वह केवल सत्ता या किसी विशेष हित समूह का माध्यम बन जाता है, तब लोकतंत्र की आत्मा कमजोर पड़ने लगती है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि पत्रकारिता अपने मूल आदर्शों की ओर लौटे। तथ्य सर्वोपरि हों, जनहित सर्वोच्च हो और सत्य के प्रति प्रतिबद्धता अडिग रहे। पत्रकार का कर्तव्य सत्ता के साथ खड़ा होना नहीं, बल्कि सत्य के साथ खड़ा होना है। सत्ता बदलती रहती है, लेकिन पत्रकारिता का धर्म नहीं बदलता।

लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति भव्य आयोजनों, बड़े-बड़े दावों या प्रचार अभियानों में नहीं, बल्कि उन निर्भीक सवालों में निहित है जो जनता की ओर से सत्ता से पूछे जाते हैं। जब पत्रकारिता यह जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभाती है, तभी लोकतंत्र जीवंत, उत्तरदायी और मजबूत बनता है।


Spread the love

By udaen

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *