फ्यूज़ बल्ब पत्रकार: लोकतंत्र के अंधेरे को बढ़ाने वाली प्रवृत्ति
पत्रकारिता का धर्म है—सत्ता से प्रश्न करना, समाज की आवाज़ बनना और सच को जनता तक पहुँचाना। पत्रकार की कलम का मूल्य उसके परिचय-पत्र, कैमरे या सोशल मीडिया पर लिखे “सीनियर जर्नलिस्ट” से नहीं, बल्कि उसके साहस, ईमानदारी और जनपक्षधरता से तय होता है।
दुर्भाग्य से पत्रकारिता के क्षेत्र में एक ऐसी प्रवृत्ति भी बढ़ी है, जिसे व्यंग्य में “फ्यूज़ बल्ब पत्रकारिता” कहा जा सकता है।
फ्यूज़ बल्ब पत्रकार वह नहीं जो संसाधनों के अभाव में काम कर रहा हो। वह वह है, जिसने अपनी चेतना, जिज्ञासा और नैतिकता को स्वयं निष्क्रिय कर दिया है। उसके पास कैमरा है, माइक है, परिचय-पत्र है, लेकिन खबर नहीं है। उसके पास मंच है, पर सवाल नहीं हैं। उसके पास शब्द हैं, पर सच नहीं है।
ऐसे लोग जनहित से अधिक व्यक्तिगत हित में सक्रिय दिखाई देते हैं। सरकारी कार्यक्रमों में पहली पंक्ति में बैठना, नेताओं के साथ तस्वीरें खिंचवाना, छोटे-छोटे लाभों के लिए पत्रकारिता की गरिमा गिराना और कठिन सवालों से बचना उनकी पहचान बन जाती है।
सबसे बड़ा संकट तब पैदा होता है जब ऐसे लोग ईमानदार पत्रकारों की राह में भी बाधा बनने लगते हैं। वे सत्ता से सवाल पूछने वालों को असहज बताते हैं, खोजी पत्रकारिता को अनावश्यक विवाद कहते हैं और चाटुकारिता को “व्यावहारिक पत्रकारिता” का नाम दे देते हैं।
आज डिजिटल युग में हर मोबाइल कैमरा पत्रकारिता नहीं है और हर वायरल वीडियो समाचार नहीं है। पत्रकारिता का अर्थ है—तथ्यों की पुष्टि, सभी पक्षों को सुनना, जनता के प्रति जवाबदेही और सत्य के प्रति प्रतिबद्धता।
समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। पत्रकार की पहचान उसके वाहन पर लगे “PRESS” से नहीं, बल्कि उसके काम से होनी चाहिए। जो पत्रकार जनता के सवाल उठाता है, वही लोकतंत्र का प्रहरी है। जो केवल सुविधा, प्रभाव और प्रचार में लगा है, वह पत्रकारिता का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि उसकी विश्वसनीयता पर बोझ है।
पत्रकारिता को फिर से रोशनी बनना होगा। क्योंकि जब कलम फ्यूज़ हो जाती है, तो केवल मीडिया नहीं, लोकतंत्र भी अंधेरे में चला जाता है।
