उत्तराखंड में समावेशी एवं न्यायपूर्ण विकास मॉडल की आवश्यकता पर बल( वरिष्ठ पत्रकार बेणीराम उनियाल)
देहरादून।
उत्तराखंड में समावेशी एवं न्यायपूर्ण विकास मॉडल की आवश्यकता पर बल( वरिष्ठ पत्रकार बेणीराम उनियाल)
उत्तराखंड प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध राज्य है। यहां की जल, जंगल, जमीन, नदियां, खनिज, जलविद्युत क्षमता तथा पर्यटन राज्य की आर्थिक उन्नति की महत्वपूर्ण आधारशिला हैं। इन संसाधनों के प्रभावी उपयोग से सड़क, ऊर्जा, पर्यटन और आधारभूत ढांचे के क्षेत्र में उल्लेखनीय विकास हुआ है, जो राज्य की प्रगति का सकारात्मक संकेत है।
हालांकि, इसके साथ यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि इस विकास का लाभ राज्य के स्थानीय समाज, युवाओं, किसानों और दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों तक समान रूप से पहुंच रहा है या नहीं। आज भी राज्य के अनेक क्षेत्रों में पलायन, सीमित रोजगार के अवसर, कृषि से घटती आय तथा स्थानीय उद्यमों के सामने विभिन्न चुनौतियां बनी हुई हैं।
यह विषय विकास का विरोध नहीं, बल्कि विकास को अधिक समावेशी, संतुलित और जनहितकारी बनाने की आवश्यकता पर केंद्रित एक रचनात्मक विमर्श है। यदि उत्तराखंड के प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग राज्य के विकास के लिए किया जा रहा है, तो यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि स्थानीय लोगों की भागीदारी, आर्थिक सशक्तिकरण, रोजगार और संसाधनों से मिलने वाले लाभ में उनकी प्रभावी हिस्सेदारी हो।
आवश्यकता ऐसे विकास मॉडल की है जो आधारभूत संरचना के निर्माण के साथ-साथ स्थानीय रोजगार, ग्राम आधारित अर्थव्यवस्था, कृषि, पर्यटन, लघु उद्योग, हस्तशिल्प और स्वरोजगार को समान प्राथमिकता प्रदान करे। विकास तभी वास्तविक और स्थायी माना जाएगा, जब उसका प्रत्यक्ष लाभ राज्य के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे तथा पलायन के स्थान पर गांवों और पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार एवं आजीविका के नए अवसर विकसित हों।
उत्तराखंड का भविष्य तभी अधिक सशक्त और समृद्ध होगा, जब प्राकृतिक संसाधनों से प्राप्त विकास का लाभ राज्य के स्थानीय नागरिकों तक न्यायपूर्ण और संतुलित रूप से पहुंचे।
