संपादकीय
समावेशन: दया नहीं, अधिकार का प्रश्न
“किसी समाज की महानता का आकलन इस बात से नहीं होता कि वह कितने शक्तिशाली लोगों को आगे बढ़ाता है, बल्कि इस बात से होता है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिकों को कितनी गरिमा और अवसर देता है।”
भारत आज विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। आधुनिक राजमार्ग, डिजिटल सेवाएँ, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्मार्ट शहर और बढ़ती अर्थव्यवस्था विकास की नई तस्वीर प्रस्तुत कर रहे हैं। लेकिन एक मूलभूत प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़ा है—क्या यह विकास वास्तव में सबका विकास है? क्या दिव्यांगजन, वरिष्ठ नागरिक, महिलाएँ, ग्रामीण समुदाय, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और समाज के अन्य वंचित समूह इस विकास यात्रा में समान भागीदार हैं?
यदि उत्तर पूरी तरह “हाँ” नहीं है, तो हमें स्वीकार करना होगा कि समावेशन अभी भी एक अधूरा लक्ष्य है।
समावेशन का अर्थ केवल किसी व्यक्ति को किसी कार्यक्रम में शामिल कर लेना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है ऐसी व्यवस्था का निर्माण, जिसमें प्रत्येक नागरिक बिना किसी भेदभाव के समान अवसर, सम्मान और गरिमा के साथ जीवन जी सके। यह केवल सामाजिक संवेदनशीलता का विषय नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक दायित्वों का प्रश्न है।
भारतीय संविधान समानता, गरिमा और अवसर की समान उपलब्धता की गारंटी देता है। इसी भावना को आगे बढ़ाते हुए भारत ने दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 लागू किया, जिसने दिव्यांगता को दान या सहानुभूति का विषय नहीं, बल्कि अधिकार आधारित दृष्टिकोण से देखने की दिशा दी। भारत संयुक्त राष्ट्र के Convention on the Rights of Persons with Disabilities (CRPD) का भी हस्ताक्षरकर्ता है, जो यह स्पष्ट करता है कि दिव्यांगजन समाज पर बोझ नहीं, बल्कि समान अधिकारों वाले नागरिक हैं, जिन्हें शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, परिवहन, न्याय और सार्वजनिक जीवन में पूर्ण भागीदारी का अधिकार है।
फिर भी वास्तविकता कई प्रश्न खड़े करती है।
आज भी अनेक सरकारी कार्यालय, विद्यालय, अस्पताल, बैंक, न्यायालय और सार्वजनिक स्थल ऐसे हैं जहाँ व्हीलचेयर उपयोगकर्ता स्वतंत्र रूप से प्रवेश नहीं कर सकते। अनेक वेबसाइटें और मोबाइल ऐप दृष्टिबाधित या श्रवणबाधित व्यक्तियों के लिए अनुकूल नहीं हैं। रोजगार के अवसर सीमित हैं और सामाजिक पूर्वाग्रह अक्सर किसी व्यक्ति की योग्यता से अधिक उसकी दिव्यांगता को महत्व देते हैं। यह केवल सुविधाओं की कमी नहीं, बल्कि सोच की चुनौती भी है।
समावेशन का सबसे बड़ा शत्रु भौतिक बाधाएँ नहीं, मानसिक बाधाएँ हैं।
जब समाज किसी व्यक्ति को उसकी क्षमता के बजाय उसकी सीमाओं से पहचानने लगता है, तब असमानता जन्म लेती है। इसलिए समावेशन की शुरुआत कानूनों से पहले हमारी सोच से होनी चाहिए। विद्यालयों में समावेशी शिक्षा, कार्यस्थलों पर समान अवसर, मीडिया में सकारात्मक प्रतिनिधित्व और सार्वजनिक जीवन में सम्मानजनक व्यवहार—यही वास्तविक परिवर्तन की नींव हैं।
मीडिया की भूमिका यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। पत्रकारिता यदि दिव्यांगजनों को केवल प्रेरणादायक कहानियों या दया के पात्र के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उन्हें अधिकारों, उपलब्धियों और सामाजिक योगदान के संदर्भ में दिखाए, तो समाज की सोच बदल सकती है। समाचारों में प्रतिनिधित्व केवल दृश्यता नहीं देता, बल्कि सामाजिक स्वीकृति भी बढ़ाता है।
सरकार की योजनाएँ तभी सफल मानी जाएँगी जब उनका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। “सुगम्य भारत अभियान” जैसी पहलें तभी सार्थक होंगी जब प्रत्येक सरकारी भवन, सार्वजनिक परिवहन, डिजिटल सेवा और नागरिक सुविधा वास्तव में सभी के लिए सुलभ हो। विकास की किसी भी परियोजना का मूल्यांकन केवल लागत और लाभ से नहीं, बल्कि इस आधार पर भी होना चाहिए कि वह कितनी समावेशी है।
हमें यह भी समझना होगा कि समावेशन केवल दिव्यांगजनों का मुद्दा नहीं है। यह हर उस व्यक्ति का प्रश्न है जिसे किसी भी कारण से पीछे छोड़ दिया जाता है। एक समावेशी समाज में विविधता कमजोरी नहीं, बल्कि शक्ति होती है। विभिन्न अनुभव, क्षमताएँ और दृष्टिकोण किसी भी राष्ट्र को अधिक नवाचारी, संवेदनशील और सशक्त बनाते हैं।
आज आवश्यकता किसी नई संवेदना की नहीं, बल्कि नई प्रतिबद्धता की है। हमें ऐसी नीतियाँ चाहिए जो कागज़ों से निकलकर ज़मीन पर दिखाई दें। ऐसे विद्यालय चाहिए जहाँ हर बच्चा साथ पढ़े। ऐसे कार्यस्थल चाहिए जहाँ अवसर क्षमता के आधार पर मिलें। ऐसे शहर चाहिए जहाँ हर नागरिक स्वतंत्र रूप से चल-फिर सके। और ऐसा समाज चाहिए जहाँ किसी व्यक्ति को अपनी पहचान या दिव्यांगता के कारण स्वयं को कमतर साबित न करना पड़े।
समावेशन किसी पर किया गया उपकार नहीं, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार है।
जब तक विकास की धारा समाज के अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुँचेगी, तब तक विकास अधूरा रहेगा। और जिस दिन भारत का प्रत्येक नागरिक बिना किसी भेदभाव के समान अवसर, सम्मान और गरिमा के साथ आगे बढ़ सकेगा, उसी दिन हम वास्तविक अर्थों में विकसित भारत का निर्माण कर चुके होंगे।
समावेशन का अर्थ है—हर व्यक्ति को अवसर, हर आवाज़ को सम्मान और हर जीवन को गरिमा। यही लोकतंत्र की आत्मा है, यही संविधान की भावना है और यही विकसित भारत का भविष्य है।
— संपादकीय, दिव्यांगवाणी
