सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: अकेले रहकर वेश्यावृत्ति करने वाली महिला का घर स्वतः “कोठा” नहीं
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मानव तस्करी, सेक्स वर्क और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई वयस्क महिला अपनी इच्छा से और अकेले आजीविका के लिए सेक्स वर्क करती है, तथा उसके कार्य से किसी अन्य व्यक्ति को आर्थिक लाभ नहीं मिलता, तो उसके निवास स्थान को स्वतः “ब्रॉथल (कोठा)” नहीं माना जा सकता। यह फैसला 29 मई 2026 को दिए गए 298 पृष्ठों के विस्तृत निर्णय Prajwala v. Union of India में आया।
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?
न्यायमूर्ति J.B. Pardiwala और R. Mahadevan की पीठ ने कहा कि भारत में स्वैच्छिक वयस्क सेक्स वर्क अपने आप में अवैध नहीं है। कानून का उद्देश्य वेश्यावृत्ति को अपराध बनाना नहीं, बल्कि मानव तस्करी, शोषण, दलाली और संगठित देह व्यापार पर रोक लगाना है।
अदालत ने यह भी कहा कि पुलिस और प्रशासन अक्सर मानव तस्करी के शिकार लोगों तथा स्वेच्छा से सेक्स वर्क करने वाले वयस्कों के बीच अंतर नहीं कर पाते, जिससे कई महिलाओं के मौलिक अधिकार प्रभावित होते हैं।
“रेस्क्यू” हमेशा जरूरी नहीं
फैसले में कहा गया कि यदि कोई वयस्क महिला अपनी इच्छा से सेक्स वर्क कर रही है, तो उसे जबरन “रेस्क्यू” कर संरक्षण गृह में भेजना या उसकी इच्छा के विरुद्ध पुनर्वास के लिए बाध्य करना उचित नहीं है। किसी भी कार्रवाई से पहले यह जांच आवश्यक होगी कि महिला वास्तव में तस्करी या दबाव का शिकार है या स्वेच्छा से कार्य कर रही है।
मानव तस्करी पीड़ितों के लिए बड़ा संरक्षण
सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही कहा कि मानव तस्करी और व्यावसायिक यौन शोषण (Commercial Sexual Exploitation) के पीड़ितों को संविधान के अनुच्छेद 21 और 23 के तहत पुनर्वास का मौलिक अधिकार प्राप्त है। राज्यों और केंद्र सरकार को उनके लिए सुरक्षा, चिकित्सा सहायता, मानसिक स्वास्थ्य सहायता, कौशल विकास और पुनर्वास की व्यवस्था करनी होगी।
फैसले का महत्व
यह निर्णय भारत में सेक्स वर्क और मानव तस्करी को लेकर कानूनी दृष्टिकोण में महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि हर सेक्स वर्कर तस्करी की शिकार नहीं होती और हर तस्करी पीड़ित सेक्स वर्कर नहीं होती। इसलिए कानून का फोकस महिला की गरिमा, सहमति और स्वतंत्रता पर होना चाहिए।
मुख्य बिंदु
- वयस्क और स्वैच्छिक सेक्स वर्क स्वयं में अपराध नहीं।
- अकेली महिला के निवास को स्वतः “कोठा” नहीं माना जा सकता।
- जबरन पुनर्वास या संरक्षण गृह भेजना उचित नहीं।
- मानव तस्करी पीड़ितों को पुनर्वास का मौलिक अधिकार।
- पुलिस को स्वैच्छिक सेक्स वर्करों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार नहीं करना चाहिए।
