भारत में बढ़ रही गर्मी की दस्तक: पिछले दशक में 0.9°C बढ़ा तापमान, हर दशक 10 दिन तक बढ़ रहे ‘गर्म दिन’
नई दिल्ली। जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अब भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि वर्तमान की वास्तविकता बन चुका है। स्टेट ऑफ इंडिया्स एनवायरमेंट 2026: इन फिगर्स रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2015-2024 के दौरान भारत के भूभाग का औसत तापमान 1901-1930 की अवधि की तुलना में लगभग 0.9 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया है। रिपोर्ट बताती है कि देश में तापमान वृद्धि समान रूप से नहीं हुई है और कुछ क्षेत्र तेजी से गर्म हो रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार उत्तरी भारत के कई हिस्सों में पिछले तीन दशकों के दौरान तापमान में प्रति दशक 0.2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई है। यह संकेत देता है कि क्षेत्रीय स्तर पर जलवायु परिवर्तन का असर राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक गंभीर हो सकता है।
बढ़ रहे हैं ‘गर्म दिन’
अध्ययन में पाया गया है कि सिंधु-गंगा के मैदानों को छोड़कर देश के अधिकांश हिस्सों में “गर्म दिनों” की संख्या लगातार बढ़ रही है। हर दशक में ऐसे दिनों की संख्या 5 से 10 दिन तक बढ़ी है। वैज्ञानिकों के अनुसार “गर्म दिन” वे दिन होते हैं जब अधिकतम तापमान 1995-2014 की अवधि के दैनिक अधिकतम तापमान के 90वें परसेंटाइल से अधिक हो।
विशेषज्ञों का मानना है कि गर्म दिनों और गर्म रातों की बढ़ती संख्या स्वास्थ्य, कृषि, जल संसाधनों और श्रम उत्पादकता पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है। हाल के अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि भारत में हीटवेव की अवधि और तीव्रता दोनों बढ़ रही हैं तथा रात के तापमान में भी लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है।
वैश्विक औसत से कम, लेकिन खतरा कम नहीं
हालांकि भारत में तापमान वृद्धि वर्तमान वैश्विक औसत तापमान वृद्धि (लगभग 1.3°C) से कम है, लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि चरम मौसम घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति अधिक चिंता का विषय है। देश में हीटवेव, अनियमित वर्षा, सूखा और बाढ़ जैसी घटनाओं में वृद्धि दर्ज की जा रही है।
हिमालयी राज्यों पर बढ़ता दबाव
उत्तराखंड सहित हिमालयी राज्यों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। बढ़ते तापमान का असर ग्लेशियरों के पिघलने, जल स्रोतों के सूखने, जंगलों में आग की घटनाओं और पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि तापमान वृद्धि की वर्तमान प्रवृत्ति जारी रही तो हिमालयी क्षेत्र जलवायु संकट का सबसे संवेदनशील क्षेत्र बन सकता है।
निष्कर्ष
रिपोर्ट का संदेश स्पष्ट है—भारत में जलवायु परिवर्तन केवल तापमान बढ़ने की कहानी नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य, कृषि, जल सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता से जुड़ा बहुआयामी संकट बनता जा रहा है। बढ़ते ‘गर्म दिन’ और चरम मौसम की घटनाएं संकेत दे रही हैं कि अनुकूलन (Adaptation) और उत्सर्जन नियंत्रण (Mitigation) की नीतियों को अब और अधिक प्रभावी तथा स्थानीय स्तर पर लागू करने की आवश्यकता है।
