नई दिल्ली/पोलाची। कभी नारियल की खेती में हर पेड़ पर 200 रुपये का घाटा झेलने वाले तमिलनाडु के किसान आज एक ऐसी कृषि प्रणाली के प्रतीक बन चुके हैं, जिसकी चर्चा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही है। उनकी सफलता ने यह साबित किया है कि जलवायु परिवर्तन, घटती मिट्टी की उर्वरता और खेती की बढ़ती लागत जैसी चुनौतियों का समाधान पारंपरिक एकल फसल प्रणाली से आगे बढ़कर बहुफसली और वृक्ष आधारित कृषि में छिपा हो सकता है।
58 वर्षीय वल्लुवन तमिलनाडु के क्षेत्र में लगभग 11 हेक्टेयर भूमि पर खेती करते हैं। वर्ष 2009 तक उनकी स्थिति चिंताजनक थी। नारियल के प्रत्येक पेड़ पर सालाना लगभग 500 रुपये खर्च होते थे, जबकि आय मात्र 300 रुपये होती थी। लगातार घाटे के कारण खेती का भविष्य संकट में दिखाई देने लगा था।
एक निर्णय जिसने बदल दी किस्मत
इसी दौरान वल्लुवन को के “सेव सॉयल – कावेरी कॉलिंग” अभियान की जानकारी मिली। अभियान के तहत उन्हें बहुफसली, बहुस्तरीय और वृक्ष आधारित कृषि मॉडल अपनाने की सलाह दी गई। उन्होंने जोखिम उठाया और अपनी खेती की पूरी संरचना बदल दी।
जहां पहले खेत में केवल तीन प्रकार की फसलें थीं, वहीं आज उनके खेत में 14 से अधिक कृषि उत्पाद और लगभग 30 प्रकार के वृक्ष मौजूद हैं। इनमें नारियल, जायफल, काली मिर्च, सात किस्मों के केले, हल्दी, सूरन (एलीफेंट याम), करी पत्ता और अन्य वृक्ष प्रजातियां शामिल हैं।
आय में दस गुना से अधिक वृद्धि
इस परिवर्तन का सबसे बड़ा प्रभाव आय पर पड़ा। पहले जहां प्रति एकड़ आय लगभग 30 हजार रुपये थी, वहीं अब यह बढ़कर 2.5 से 3 लाख रुपये प्रति एकड़ प्रतिवर्ष तक पहुंच गई है। खेती केवल लाभकारी ही नहीं बनी, बल्कि आर्थिक रूप से अधिक स्थिर भी हुई है।
विशेषज्ञों के अनुसार बहुफसली मॉडल का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यदि किसी एक फसल का बाजार मूल्य गिर जाए तो दूसरी फसलें नुकसान की भरपाई कर देती हैं। इससे किसान की आय किसी एक उत्पाद पर निर्भर नहीं रहती।
सूखे में भी नहीं टूटा हौसला
वल्लुवन की खेती की असली परीक्षा वर्ष 2017 के भीषण सूखे में हुई। उस समय क्षेत्र में लगातार दो वर्षों तक पर्याप्त वर्षा नहीं हुई और भूजल स्तर 1000 फीट से नीचे चला गया। कई किसानों को अपने नारियल के पेड़ काटने पड़े, लेकिन वल्लुवन के खेत ने इस संकट का सामना किया।
मल्चिंग और वर्षा जल संचयन गड्ढों की मदद से खेत में नमी बनी रही। परिणामस्वरूप बिना अतिरिक्त सिंचाई के भी जायफल और काली मिर्च जैसी संवेदनशील फसलें सुरक्षित रहीं। आज उनका खेत पहले की तुलना में केवल दस प्रतिशत पानी का उपयोग करता है।
मिट्टी भी हुई अधिक उपजाऊ
आर्थिक लाभ के साथ-साथ मिट्टी की गुणवत्ता में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ। खेत की जैविक कार्बन मात्रा पहले वर्ष के 0.5 प्रतिशत से बढ़कर सातवें वर्ष में 1.56 प्रतिशत तक पहुंच गई। यह संकेत है कि वृक्ष आधारित खेती केवल उत्पादन नहीं बढ़ाती, बल्कि मिट्टी के स्वास्थ्य को भी पुनर्जीवित करती है।
जलवायु संकट के दौर में एक मॉडल
वल्लुवन का अनुभव केवल व्यक्तिगत सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि भारत की कृषि नीति के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत देता है। बढ़ते तापमान, अनियमित मानसून और जल संकट के बीच ऐसी खेती प्रणालियां किसानों को अधिक लचीला और आत्मनिर्भर बना सकती हैं।
इसी योगदान के लिए उन्हें संयुक्त राष्ट्र की द्वारा “सॉइल फार्मर हीरो” के रूप में सम्मानित किया गया है।
वल्लुवन का मानना है कि वृक्ष आधारित कृषि केवल किसानों की आय बढ़ाने का माध्यम नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन से निपटने का भी प्रभावी उपाय है। उनका संदेश स्पष्ट है—भविष्य की खेती वही होगी जो मिट्टी, पानी और जैव विविधता को साथ लेकर चले।
