Share on linkedin
‘‘सहभागी जल बजटिंग के जरिए समुदायों का सशक्तीकरण’’
प्रविष्टि तिथि: 27 MAY 2026 11:29AM by PIB Delhi
बढ़ती मांग, असमान वितरण और जलवायु की भिन्नता की वजह से ग्रामीण भारत में जल शासन में सुधार ज्यादा महत्वपूर्ण होता जा रहा है। भारत हर बूंद का हिसाब रख कर जल सुरक्षा, जलवायु अनुकूलता और संवहनीय भविष्य का निर्माण कर सकता है। जल बजटिंग समुदायों को उपलब्धता और मांग का आकलन करने में समर्थ बनाती है। इससे उन्हें कृषि, घरेलू जरूरतों और मवेशियों के लिए जल के इस्तेमाल के बारे में जानकारी के आधार पर फैसला करने में सहायता मिलती है। अटल भूजल योजना और राष्ट्रीय जल मिशन जैसे केंद्र सरकार के कार्यक्रम तथा राजस्थान और महाराष्ट्र समेत विभिन्न राज्य सरकारों की पहलकदमियां सहभागिता की रणनीति की प्रभावशीलता को रेखांकित करती हैं। प्रौद्योगिकी स्थानीय स्तर पर ‘वरुणी वेब ऐप्लिकेशन’ जैसे साधनों के इस्तेमाल से डाटा आधारित योजना निर्माण में सहायता के जरिए इन प्रयासों को मजबूती देती है। योजना निर्माण में जल बजटिंग को शामिल किए जाने, सामुदायिक भागीदारी और नीतिगत समर्थन से पानी के संवहनीय उपयोग को बढ़ावा मिलता है।
भारत में जल संसाधन कार्यप्रणाली: मांग प्रबंधन और नीतिगत कदमों का एकीकरण
जल पर्यावरणीय संवहनीयता और मानव कल्याण का एक मौलिक आधार है। विभिन्न क्षेत्रों में विकास की गति बरकरार रखने के लिए जल संसाधनों की उपलब्धता, वितरण और प्रबंधन महत्वपूर्ण है। केंद्रीय जल आयोग के ‘‘अंतरिक्ष आदानों के उपयोग से भारत में पानी की उपलब्धता का पुर्नआकलन, 2019’’ शीर्षक अध्ययन के अनुसार देश में औसतन सालाना लगभग 3880 अरब घन मीटर वर्षा होती है। अगर वाष्पण और अन्य प्राकृतिक कारणों से नुकसान को निकाल दें तो देश में औसत सालाना जल उपलब्धता 1999.20 अरब घन मीटर रहने का अनुमान है।
देश में जल की औसत सालाना उपलब्धता काफी हद तक जल-मौसम वैज्ञानिक और भूवैज्ञानिक कारकों पर निर्भर करती है। लेकिन पानी की प्रति व्यक्ति उपलब्धता आबादी के आकार से भी निर्धारित होती है। आबादी में लगातार वृद्धि के साथ ही पानी की प्रति व्यक्ति उपलब्धता घट रही है। इसके परिणामस्वरूप जल संसाधनों पर दबाव बढ़ता जा रहा है।
विश्व की 17.5 प्रतिशत जनसंख्या और 11.6 प्रतिशत मवेशी संख्या भारत में है। इससे देश जल संसाधनों पर दबाव काफी बढ़ जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में 80 से 90 प्रतिशत जल का उपयोग कृषि में किया जाता है।
सीमित जल संसाधनों पर बढ़ते दबाव के परिणामस्वरूप भूजल के स्तर में गिरावट आ रही है। इससे जल की मौसमी तंगी होने के साथ ही पानी के आवंटन को लेकर टकराव भी बढ़ रहे हैं। ये चुनौतियां आपूर्ति संचालित दृष्टिकोण के बजाय मांग आधारित और योजनाबद्ध जल प्रबंधन प्रणालियों को अपनाने की जरूरत को रेखांकित करती हैं। इस संदर्भ में जल बजटिंग पानी की कमी वाले उन क्षेत्रों में संवहनीय विकास के महत्वपूर्ण साधन के तौर पर उभरी है जहां तंगी और असमान वितरण से आर्थिक स्थिरता, खाद्य सुरक्षा और जलवायु अनुकूलनीयता को खतरा है।
हर बूंद का हिसाबः आखिर क्या है जल बजटिंग
जल बजटिंग का मतलब नवीकरणीय उपलब्धता के साथ पानी के इस्तेमाल को संतुलित करने के मकसद से गांव, जलक्षेत्र, प्रखंड और जिला जैसी किसी परिभाषित भौगोलिक इकाई में जल की सुलभता और मांग का व्यवस्थित ढंग से आकलन है।

जल बजटिंग के मूल में वाष्पण, बहाव और भूजल पुनर्भरण के बरक्श वर्षा, भूमि पर प्रवाह और भूजल संचय समेत जल के सभी आदानों का आकलन है। बुनियादी गणना से आगे एक विस्तृत जल बजट प्राकृतिक परिवेश के अंदर जल के प्रवाह और वितरण को समझने में मदद करता है। इसमें सतही जल और भूजल प्रणालियों के बीच अंतःक्रिया, वर्षा और रिचार्ज में मौसमी परिवर्तन तथा कृषि, शहरीकरण और औद्योगिक उपयोग जैसी मानव गतिविधियों का प्रभाव शामिल है।
जल बजटिंग को विभिन्न पैमानों पर व्यक्तिगत खेतों और गांवों से लेकर समूचे जलक्षेत्र और नदी घाटी तक लागू किया जा सकता है। इससे स्थानीय स्थितियों, संसाधनों की उपलब्धता और मांग की प्रकृति के आधार पर किसी खास स्थान के लिए जल प्रबंधन योजनाओं को तैयार करना संभव होता है। इस तरह का योजना निर्माण खास तौर से भूजल की कमी, मौसमी तंगी, बाढ़ या जलवायु से संबंधित अनिश्चितताओं का सामना कर रहे क्षेत्रों के लिए खास तौर से महत्वपूर्ण है।
शासन के दृष्टिकोण से देखें तो जल बजटिंग सूचनाओं और साक्ष्यों पर आधारित निर्णय लेने में मददगार है। यह अधिकता और तंगी वाले क्षेत्रों की पहचान कर कृषि, घरेलू उपयोग, मवेशियों और उद्योगों के लिए जल के कुशल आवंटन को संभव बनाती है।
जल बजटिंग के माध्यम से कृषि और मवेशियों की जल माँग को संतुलित बनाना

राष्ट्रीय एकीकृत जल संसाधन विकास आयोग का अनुमान है कि उच्च माँग वाले परिदृश्य में, वर्ष 2050 तक भारत में सिंचाई के लिए पानी की मांग 807 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) तक पहुँच सकती है। ये अनुमान जल संसाधनों पर बढ़ते दबाव को दर्शाते हैं और बेहतर योजना बनाने तथा माँग प्रबंधन की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।
जल बजटिंग कृषि पद्धतियों को उपलब्ध संसाधनों के साथ तालमेल बिठाने में मदद करती है। यह सोच-समझकर फ़सल की योजना बनाने में सक्षम बनाती है, जिससे स्थानीय जल स्थितियों के आधार पर फ़सल का चयन किया जा सके और दबाव को कम करने के लिए सिंचाई और बुवाई को बेहतर बनाया जा सके। नाबार्ड द्वारा सहायता प्राप्त सहभागी जल बजटिंग पहलकदमियों के साक्ष्यों से पता चलता है कि पानी की उपलब्धता के अनुरूप चुनी गई फसलें जोखिम को कम करती हैं और उत्पादकता को बढ़ाती हैं।
2019 की मवेशियों की गणना में 4.6% की वृद्धि देखी गई, 2012 में मवेशियों की संख्या के 51.2 करोड़ से बढ़कर 2019 में लगभग 53.6 करोड़ हो गई। 2012 की पिछली गणना की तुलना में गायों की आबादी में 18% की वृद्धि हुई। मवेशियों की आबादी में इस बढ़ोतरी का सीधा मतलब है कि पशुओं के पीने के पानी, चारे के उत्पादन और इससे जुड़ी अन्य गतिविधियों के लिए पानी की मांग भी उसी अनुपात में बढ़ी है।
जल बजट एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाता है, जिसमें मवेशी और मत्स्य पालन जैसे संबद्ध क्षेत्रों की जल आवश्यकताओं को भी शामिल किया जाता है। मानक मानदंडों का उपयोग करके मवेशियों की पानी की मांग का अनुमान लगाना और इसे समग्र जल मूल्यांकन में शामिल करना अधिक संतुलित आवंटन सुनिश्चित करता है। इस प्रकार, यह विविध और संवहनीय ग्रामीण आजीविकाओं को बढ़ावा देता है।
जल बजटिंग को संस्थागत बनाना: राष्ट्रीय मिशन और ज़मीनी स्तर पर कार्रवाई
अटल भूजल योजना और राष्ट्रीय जल मिशन सहित विभिन्न सरकारी कार्यक्रम, जल बजटिंग को संवहनीय जल प्रबंधन के लिए एक प्रमुख साधन के रूप में रेखांकित करते हैं।
भूजल योजना
2019 में शुरू की गई, अटल भूजल योजना ग्राम पंचायत स्तर पर विकेंद्रीकृत जल शासन के एक मुख्य साधन के रूप में ‘जल बजटिंग’ को बढ़ावा देती है। इस कार्यक्रम को भूजल की कमी वाले सात राज्यों के 229 ब्लॉकों में प्रायोगिक आधार पर लागू किया गया है। इन राज्यों और ग्राम पंचायत का चयन भूजल स्तर में गिरावट, संस्थागत तत्परता, मौजूदा जल प्रबंधन प्रणालियों, भूजल संरक्षण में पिछले अनुभव और इसमें भाग लेने की इच्छा के आधार पर किया गया था। ग्राम पंचायत का अंतिम चयन संबंधित राज्य सरकारों द्वारा किया गया, ताकि इसका प्रभावी कार्यान्वयन और बेहतर परिणाम सुनिश्चित किए जा सकें। 2023-24 और 2024-25 में किए गए आकलन के दौरान, 229 ब्लॉकों में से 180 ब्लॉकों में भूजल के स्तर में स्पष्ट सुधार देखा गया है।
यह योजना स्थानीय जरूरतों के अनुसार, पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों, जैसे कि गोकट्टे, बावड़ी, जोहड़, टांका, कल्याणी और डिग्गी जैसी पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों के पुनरुद्धार और सुदृढ़ीकरण को बढ़ावा देती है। मार्च 2026 तक, लगभग 81,700 जल संरक्षण और पुनर्भरण संरचनाओं का निर्माण या जीर्णोद्धार किया जा चुका है। यह योजना वार्षिक जल बजट तैयार करने और उसे अपडेट करने को अनिवार्य बनाती है, जिसके तहत भाग लेने वाली ग्राम पंचायतों में 8,203 जल बजट पूरे किए जा चुके हैं।
| क्र. सं. | राज्य | जल बजट तैयार करने वाली ग्राम पंचायतें |
| 1 | गुजरात | 1,873 |
| 2 | हरियाणा | 1,647 |
| 3 | कर्नाटक | 1,199 |
| 4 | मध्य प्रदेश | 670 |
| 5 | महाराष्ट्र | 1,133 |
| 6 | राजस्थान | 1,132 |
| 7 | उतर प्रदेश | 549 |
| कुल | 8203 |
इस प्रक्रिया को समर्थन देने के लिए, क्षमता-निर्माण की पहलकदमियां शुरू की गई हैं। विभिन्न स्तरों पर 1.25 लाख से अधिक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। लगभग 9 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में मांग-पक्ष के उपायों को सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया गया है। इसके परिणामस्वरूप, जल के कुशल उपयोग की पद्धतियों जैसे कि ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई, मल्चिंग और फसल विविधीकरण को अपनाया गया है।
जल बजटिंग का संस्थानीकरण: हिवरे बाज़ार से सीख
महाराष्ट्र का सूखा-प्रभावित गाँव, हिवरे बाज़ार, यह दिखाता है कि किस तरह भागीदारी-आधारित जल प्रबंधन, पानी की कमी वाले क्षेत्रों को एक मज़बूत और आत्मनिर्भर पारिस्थितिकी तंत्र में बदल सकता है। 1970 के दशक से ही पानी की भारी कमी का सामना कर रहे इस गाँव ने, समुदाय के नेतृत्व वाले जल-संभर प्रबंधन को अपनाया। इस तरीके ने पारंपरिक ज्ञान को संस्थागत नवाचार के साथ जोड़ा।
समय के साथ, गाँव ने कई व्यापक उपाय लागू किए, जिनमें वर्षा जल संचयन, जल-विभाजन विकास और भूजल पुनर्भरण के तरीके शामिल थे। एक प्रमुख पहल ग्राम सभा स्तर पर ‘जल बजट’ बनाना था, जहाँ कृषि नियोजन को दिशा देने के लिए वार्षिक जल उपलब्धता का आकलन किया जाता है। इन आकलनों के आधार पर, किसानों को फसल के ऐसे तरीके अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है जो उपलब्ध जल संसाधनों के अनुरूप हों। इसके अतिरिक्त, भूजल के अत्यधिक दोहन को रोकने के लिए गहरे बोरवेल पर प्रतिबंध जैसे नियम भी लागू किए गए हैं।
इस एकीकृत और भविष्य-उन्मुखी दृष्टिकोण ने हिवरे बाज़ार को सामान्य से कम बारिश वाले समय में भी जल सुरक्षा हासिल करने में सक्षम बनाया है। इस मॉडल ने राज्य-स्तरीय नीति को भी प्रभावित किया है; महाराष्ट्र ने अपनी सूखा-रोधी रणनीति में ‘जल बजटिंग’ को शामिल किया है, जिसका लक्ष्य हर साल 5,000 गाँवों को जल-सुरक्षित बनाना है।
राष्ट्रीय जल मिशन (एनडब्ल्यूएम)
राष्ट्रीय जल मिशन, जल बजट को एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन का एक बुनियादी तत्व मानता है। इस मिशन के अंतर्गत, जल बजटिंग जल संरक्षण, संवहनीयता और दीर्घकालिक जल सुरक्षा जैसी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप है।
इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय जल मिशन के अंतर्गत ‘नारी शक्ति से जल शक्ति’ अभियान जल संरक्षण और प्रबंधन में स्वयं सहायता समूहों, जल उपभोक्ता संघों और सामुदायिक समूहों सहित महिला-नेतृत्व वाली संस्थाओं पर विशेष जोर दिया जाता है। उदाहरण के लिए, उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले में जल जीवन मिशन के तहत लगभग 1,645 महिलाओं को प्रशिक्षित किया गया है। इसके अलावा, 300 महिला-नेतृत्व वाली ग्राम जल और स्वच्छता समितियां कार्यरत हैं और महिला स्वयं सहायता समूहों द्वारा 105 जागरूकता अभियान चलाए गए हैं।
राजस्थान में समुदाय-आधारित योजना के माध्यम से जल सुरक्षा
राजस्थान में अत्यधिक परिवर्तनशील वर्षा (कम-ज्यादा होने वाली बारिश) और लगातार पड़ने वाले सूखे के कारण वर्षा जल बहकर बर्बाद हो जाता है, भूजल स्तर में गिरावट आती है और कृषि की अस्थिरता जैसी समस्याएं उत्पन्न हुई हैं। इस समस्या से निपटने के लिए, राज्य ने वर्ष 2016 में “फोर वाटर्स कॉन्सेप्ट” (चार जल अवधारणा) पर आधारित ‘मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान‘ की शुरुआत की। इसमें जलसंभर उपचार और पारंपरिक संरचनाओं के पुनरुद्धार के माध्यम से वर्षा जल, भूजल, भूमिगत जल और मिट्टी की नमी के संरक्षण का कार्य किया जाता है।
इस दृष्टिकोण की एक मुख्य विशेषता ग्राम सभा स्तर पर जल बजटिंग को संस्थागत रूप देना है। इस प्रकार, समुदाय व्यवस्थित रूप से जल की उपलब्धता का आकलन करते हैं और पीने के पानी, सिंचाई, मवेशियों तथा आजीविका की अन्य आवश्यकताओं सहित विभिन्न प्रतिस्पर्धी ज़रूरतों के बीच जल का आवंटन करते हैं।
मुख्य परिणाम:
- भूजल स्तर में लगभग 4% की वृद्धि हुई।
- मिट्टी की उर्वरता में सुधार हुआ और कटाव कम हुआ, जिसके परिणामस्वरूप फ़सलों की पैदावार बढ़ी।
- 41 लाख लोगों और 45 लाख पशुओं के लिए पानी की उपलब्धता में सुधार हुआ।
यह उदाहरण दिखाता है कि कैसे समुदाय-आधारित जल बजट और संरक्षण, सूखा-प्रभावित क्षेत्रों में जल सुरक्षा को मज़बूत कर सकते हैं।
स्मार्ट तकनीक के साथ जल बजटिंग को सरल बनाना: ‘वरुणी वेब एप्लीकेशन‘
‘वरुणी वेब एप्लीकेशन’ ब्लॉक-स्तर पर जल बजट तैयार करने के लिए एक वैज्ञानिक रूप से सुदृढ़ और उपयोग में आसान कार्यप्रणाली है। यह आधिकारिक सरकारी पोर्टलों से स्वचालित रूप से प्राप्त डेटा को शामिल करती है, जिसमें वर्षा, भूमि उपयोग, फसल का पैटर्न, जनसंख्या और जल संसाधन शामिल हैं। इसके बाद, इस डेटा को एक संरचित जल बजट मूल्यांकन तैयार करने के लिए एक अंतर्निर्मित कंप्यूटेशनल फ्रेमवर्क (सॉफ्टवेयर के भीतर मौजूद गणना प्रणाली) के माध्यम से दर्ज किया जाता है। वरुणी वेब एप्लिकेशन (https://wasca.in/index) को भारत-जर्मन द्विपक्षीय परियोजना “ग्रामीण भारत में जल सुरक्षा और जलवायु अनुकूलन” (डब्ल्यूएएससीए) के तहत विकसित किया गया था। इस परियोजना को जल शक्ति मंत्रालय और ग्रामीण विकास मंत्रालय के सहयोग से लागू किया गया है, इसके लिए नीति आयोग से तकनीकी सहायता दी जा रही है।

‘वरुणी वेब एप्लिकेशन’ एक चक्र-आधारित पद्धति (छोटे-छोटे चक्रों में) का उपयोग करता है। यह एक व्यापक जल बजट तैयार करने के लिए, व्यवस्थित रूप से जल की उपलब्धता (आपूर्ति) की तुलना जल की आवश्यकताओं (मांग) से करता है। यह दर्शाता है कि किसी दिए गए ब्लॉक में जल की अधिकता है या कमी। इसके अलावा, यह स्थानीय भूगोल और जल संसाधन की स्थितियों के बारे में प्रासंगिक जानकारी भी प्रदान करता है।
सभी गणनाएँ एक स्वचालित प्रणाली के माध्यम से की जाती हैं, जिससे मानवीय हस्तक्षेप कम से कम हो जाता है और त्रुटियों की संभावना भी घट जाती है। इससे स्थानीय प्राधिकरण जल-संबंधी स्थितियों का सटीक आकलन कर पाते हैं और संदर्भ-विशिष्ट उपायों की पहचान कर सकते हैं। इसमें जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण और सिंचाई की कुशल पद्धतियों को अपनाना शामिल है।
जलयुक्त शिवर अभियान
महाराष्ट्र सरकार का एक प्रमुख कार्यक्रम ‘जलयुक्त शिवर अभियान‘ 2014 में शुरू किया गया था। इसे ग्रामीण इलाकों में पानी की कमी की समस्या का स्थायी और दीर्घकालिक समाधान प्रदान करने के लिए तैयार किया गया था। इस कार्यक्रम में जियोटैगिंग और महाराष्ट्र रिमोट सेंसिंग एप्लीकेशन सेंटर द्वारा विकसित एक मोबाइल एप्लीकेशन को शामिल किया गया है। यह विभिन्न उपायों की रियल-टाइम और वेब-आधारित निगरानी को संभव बनाता है। यह एक एकीकृत नियोजन दृष्टिकोण अपनाता है, जो जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण और ग्राम-स्तरीय जल बजट पर केंद्रित है।
इन उपायों के परिणामस्वरूप, 11,000 से अधिक गाँवों को सूखा-मुक्त घोषित किया गया है। इसके अतिरिक्त, भूजल स्तर में लगभग 1.5-2 मीटर की वृद्धि हुई है। साथ ही, जल भंडारण क्षमता में भी वृद्धि हुई है और कृषि उत्पादकता में अनुमानित 30-50 प्रतिशत का सुधार हुआ है।
सोच-समझकर लिए गए निर्णयों और स्थानीय प्रयासों के माध्यम से जल सुरक्षा को सुदृढ़ बनाना
जल एक सीमित संसाधन है, इसलिए इसके बेहतर प्रबंधन, दक्षता और सुशासन की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है। जल प्रबंधन के लिए टुकड़ों टुकड़ों में किये जाने वाले उपयों की बजाए एक एकीकृत और डेटा-आधारित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता अब अनिवार्य हो गई है। जनसंख्या वृद्धि, कृषि संबंधी माँग और जलवायु परिवर्तनशीलता के कारण बढ़ते दबावों ने इस बदलाव को और भी अधिक आवश्यक बना दिया है। इस संदर्भ में, ‘जल बजटिंग’ एक परिवर्तनकारी साधन के रूप में उभरकर सामने आता है।
कृषि पद्धतियों को स्थानीय जल उपलब्धता के अनुरूप ढालकर, भारत साक्ष्य-आधारित और सहभागी जल शासन को बढ़ावा दे रहा है। इसे समुदाय-नेतृत्व वाली संस्थाओं को मज़बूत करके और ‘वरुणी’ जैसे डिजिटल उपकरणों का लाभ उठाकर समर्थन दिया जा रहा है। हिवरे बाज़ार से लेकर ‘अटल भूजल योजना’ और ‘राष्ट्रीय जल मिशन’ जैसे बड़े कार्यक्रमों तक के सफल मॉडल, इसके प्रभावी परिणामों को दर्शाते हैं। नीति, प्रौद्योगिकी और सामूहिक कार्रवाई का मेल जल-संकट वाले क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता को काफी हद तक हासिल करने में सहायक हो सकता है। दीर्घकालिक जल सुरक्षा, कृषि संवहनीयता और समावेशी आर्थिक विकास सुनिश्चित करने के लिए सभी स्तरों पर नियोजन प्रक्रियाओं में ‘जल बजटिंग’ को संस्थागत रूप देना अनिवार्य हो गया है।
संदर्भ
नीति आयोग
- https://www.niti.gov.in/sites/default/files/2025-11/Water_Budgeting.pdf
- https://www.niti.gov.in/sites/default/files/2023-08/COMPENDIUM-OF-BEST-PRACTICES-IN-WATER-MANAGEMENT-3.0_Water-Resources-Vertical_2_8_23.pdf
- https://www.niti.gov.in/sites/default/files/2023-03/CompositeWaterManagementIndex.pdf
जल शक्ति मंत्रालय
- https://nwm.gov.in/nari-shakti-se-jal-shakti
- https://sansad.in/getFile/annex/266/AU2320_quD2Mi.pdf?source=pqars
- https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2153573®=3&lang=2
- https://eparlib.sansad.in/bitstream/123456789/2974318/1/AU1028.pdf
- https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2155030&®=3&lang=2
वित्त मंत्रालय
- https://www.nabard.org/auth/writereaddata/File/20%20_WATER_BUDGETING.pdf
- https://icrier.org/pdf/Water_Productivity_Mapping_of_Major_Indian_Crops.pdf
संयुक्त राष्ट्र
- https://www.unwomen.org/sites/default/files/2024-09/progress-on-the-sustainable-development-goals-the-gender-snapshot-2024-en.pdf
- https://www.un.org/sustainabledevelopment/water-and-sanitation/
पीआईबी शोध
****
पीके/केसी/एसके
(रिलीज़ आईडी: 2265723) आगंतुक पटल : 532
इस विज्ञप्ति को इन भाषाओं में पढ़ें: English , Tamil





- https://sansad.in/getFile/annex/266/AU2320_quD2Mi.pdf?source=pqars
- https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2153573®=3&lang=2
- https://eparlib.sansad.in/bitstream/123456789/2974318/1/AU1028.pdf
- https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2155030&®=3&lang=2
वित्त मंत्रालय
- https://www.nabard.org/auth/writereaddata/File/20%20_WATER_BUDGETING.pdf
- https://icrier.org/pdf/Water_Productivity_Mapping_of_Major_Indian_Crops.pdf
संयुक्त राष्ट्र
- https://www.unwomen.org/sites/default/files/2024-09/progress-on-the-sustainable-development-goals-the-gender-snapshot-2024-en.pdf
- https://www.un.org/sustainabledevelopment/water-and-sanitation/
