वन कारोबार से लोकपाल तक: खंडूड़ी परिवार की ऐतिहासिक यात्रा
खंडूड़ी बंधुओं की विरासत से लेकर जनरल बीसी खंडूड़ी की राजनीतिक यात्रा तक: एक युग का अवसान
गढ़वाल के मरगदना गांव से निकले खंडूड़ी परिवार ने उत्तराखंड के इतिहास में व्यापार, शिक्षा और जनसेवा की जो परंपरा स्थापित की, उसी विरासत को आगे बढ़ाते हुए इस परिवार ने राजनीति और राष्ट्रसेवा के क्षेत्र में भी अमिट पहचान बनाई। इसी गौरवशाली वंश परंपरा से निकले भुवन चंद्र खंडूरी ने सैन्य अनुशासन, राजनीतिक ईमानदारी और विकासपरक सोच के बल पर राष्ट्रीय राजनीति में विशिष्ट स्थान बनाया।
मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) भुवन चंद्र खंडूरी का जन्म 1 अक्टूबर 1934 को देहरादून में हुआ था। भारतीय सेना में लंबे समय तक सेवा देने के बाद उन्होंने सार्वजनिक जीवन में कदम रखा। सेना में अपने अनुशासन और प्रशासनिक क्षमता के कारण वे “जनरल साहब” के नाम से लोकप्रिय हुए। राजनीति में आने के बाद उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता के रूप में पहचान बनाई और गढ़वाल संसदीय क्षेत्र का कई बार प्रतिनिधित्व किया।
केंद्र सरकार में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री रहते हुए उन्होंने देश की अधोसंरचना विकास योजनाओं को नई गति दी। विशेष रूप से “गोल्डन क्वाड्रिलेटरल परियोजना” को आगे बढ़ाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है, जिसने देश के चार प्रमुख महानगरों को आधुनिक राजमार्ग नेटवर्क से जोड़ा।
उत्तराखंड राज्य गठन के बाद वे भाजपा के पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री बने। वर्ष 2007 से 2009 और फिर 2011 से 2012 तक उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया। अपने कार्यकाल में वे कठोर प्रशासन, भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख और पारदर्शी शासन शैली के लिए चर्चित रहे। राजनीतिक मतभेदों के बावजूद उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी और सादगी को लेकर विरोधी दलों में भी सम्मान का भाव दिखाई देता था।
उत्तराखंड की राजनीति में “खंडूरी है जरूरी” जैसा लोकप्रिय नारा उनकी जनस्वीकृति का प्रतीक बना। सोशल मीडिया और जनस्मृतियों में आज भी बड़ी संख्या में लोग उन्हें राज्य के सबसे ईमानदार और अनुशासित मुख्यमंत्रियों में गिनते हैं।
19 मई 2026 को देहरादून के एक निजी अस्पताल में लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया। वे 91 वर्ष के थे। उनके निधन की खबर के साथ ही उत्तराखंड ही नहीं, राष्ट्रीय राजनीति में भी शोक की लहर दौड़ गई। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सहित विभिन्न दलों के नेताओं ने इसे राज्य और देश की अपूरणीय क्षति बताया।
उनकी अंतिम यात्रा केवल एक राजनेता की विदाई नहीं थी, बल्कि उत्तराखंड के उस दौर के अवसान का प्रतीक भी थी, जिसमें राजनीति में सादगी, जवाबदेही और व्यक्तिगत ईमानदारी को सर्वोच्च मूल्य माना जाता था। देहरादून में उनके पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। सेना, राजनीति और समाज के विभिन्न वर्गों ने उन्हें नम आंखों से श्रद्धांजलि दी।
खंडूड़ी बंधुओं द्वारा व्यापार और शिक्षा सेवा से शुरू हुई यह विरासत भुवन चंद्र खंडूरी तक आते-आते राष्ट्रसेवा और राजनीतिक आदर्शवाद की मिसाल बन गई। यह गाथा केवल एक परिवार का इतिहास नहीं, बल्कि उत्तराखंड के सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक विकास की जीवंत यात्रा भी है।
