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यह प्रवृत्ति केवल बड़े नेताओं तक सीमित नहीं रही। उत्तराखंड के कई क्षेत्रों—खासतौर पर और आसपास के इलाकों—में नीचे स्तर के कार्यकर्ताओं के व्यवहार में भी यही पैटर्न देखने को मिलता है।

स्थानीय स्तर पर बड़ी संख्या में ऐसे कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने वर्षों तक कांग्रेस के संगठन में रहकर पहचान बनाई, बूथ स्तर पर काम किया, चुनावी नेटवर्क खड़ा किया, और फिर राजनीतिक हवा बदलते ही दूसरे दलों में शामिल हो गए। दिलचस्प यह है कि पार्टी बदलने के बाद वही कार्यकर्ता सबसे मुखर आलोचक बन जाते हैं—जैसे वे कभी उस व्यवस्था का हिस्सा रहे ही न हों।

यह केवल वैचारिक असहमति का मामला नहीं लगता, बल्कि सत्ता के समीकरणों के साथ खुद को पुनर्स्थापित करने की रणनीति अधिक प्रतीत होती है।
स्थानीय राजनीति में यह और भी स्पष्ट दिखता है—जहां टिकट, पद या स्थानीय प्रभाव की संभावना के आधार पर निष्ठाएं तेजी से बदलती हैं।

इसका प्रभाव सिर्फ दलों पर नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक ढांचे पर पड़ता है:

  • संगठनात्मक स्थिरता कमजोर होती है – जब कार्यकर्ता अस्थायी निष्ठा के साथ काम करते हैं, तो दीर्घकालिक संगठन निर्माण प्रभावित होता है।
  • विचारधारा गौण हो जाती है – स्थानीय स्तर पर राजनीति “कौन सत्ता में है” तक सिमट जाती है।
  • जनता का भरोसा कम होता है – जब वही चेहरे अलग-अलग दलों में जाकर अलग-अलग बातें करते हैं, तो विश्वसनीयता पर सवाल उठता है।

यह भी सच है कि राजनीतिक दलों की आंतरिक संरचनाओं में कमियां, अवसरों की कमी और गुटबाजी ऐसे बदलावों को बढ़ावा देती हैं। लेकिन यह तर्क उस स्थिति को पूरी तरह न्यायोचित नहीं ठहराता, जहां व्यक्ति हर बार खुद को “सही” और पूर्व संगठन को “पूरी तरह गलत” बताने लगता है।

उत्तराखंड जैसे छोटे और सामाजिक रूप से जुड़े राज्य में राजनीतिक स्मृति बहुत तेज होती है।
कोटद्वार से लेकर कुमाऊं और गढ़वाल के अन्य हिस्सों तक, लोग यह देखते और याद रखते हैं कि कौन कब, किस परिस्थिति में, और किस लाभ के लिए अपनी राजनीतिक निष्ठा बदलता है।

अंततः, यह केवल कांग्रेस या किसी एक दल का प्रश्न नहीं है—यह उस व्यापक राजनीतिक संस्कृति का संकेत है, जहां अवसरवाद धीरे-धीरे संस्थागत व्यवहार बनता जा रहा है।

और यही वह बिंदु है, जहां लोकतंत्र का वास्तविक परीक्षण शुरू होता है—नेताओं से ज्यादा, कार्यकर्ताओं के स्तर पर।



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By udaen

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