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उत्तराखंड में “जॉबलेस ग्रोथ”: विकास के आंकड़े, रोजगार की कमी

उत्तराखंड में “जॉबलेस ग्रोथ” कोई सैद्धांतिक अवधारणा नहीं, बल्कि ज़मीनी हकीकत है। राज्य में सड़कें, पर्यटन, होटल, धार्मिक कॉरिडोर और शहरी ढांचा तेजी से बढ़ा है, लेकिन इसके समानांतर स्थायी और स्थानीय रोजगार नहीं बना।


🔎 1. “जॉबलेस ग्रोथ” का स्थानीय अर्थ

आर्थिक गतिविधि बढ़ती है, लेकिन:

  • रोजगार सीमित रहते हैं
  • या अस्थायी/कम वेतन वाले होते हैं
  • या बाहरी श्रमिकों द्वारा भरे जाते हैं

👉 उत्तराखंड में विकास का मॉडल यही है:
“इन्फ्रास्ट्रक्चर बढ़ा, रोजगार नहीं”


🏗️ 2. निर्माण आधारित विकास: अस्थायी रोजगार

चारधाम सड़क परियोजना, टनल, होटल, रियल एस्टेट:

  • निर्माण के दौरान रोजगार मिलता है
  • लेकिन प्रोजेक्ट खत्म होते ही रोजगार भी खत्म

👉 यह “काम” है, करियर नहीं

और:

  • ठेकेदार बाहरी मजदूर लाते हैं
  • स्थानीय युवाओं को सीमित अवसर मिलते हैं

🏨 3. पर्यटन: अवसर या भ्रम?

पर्यटन को राज्य की रीढ़ बताया जाता है।

लेकिन वास्तविकता:

  • ज्यादातर काम सीजनल (3–6 महीने)
  • कम वेतन, बिना सामाजिक सुरक्षा
  • उच्च स्तरीय होटल/रिसॉर्ट में स्किल्ड जॉब्स बाहरी लोगों को

👉 नतीजा:
स्थानीय युवा या तो छोटे-मोटे काम करते हैं या राज्य छोड़ देते हैं।


🌾 4. कृषि और पारंपरिक अर्थव्यवस्था का पतन

  • पहाड़ी कृषि पहले ही सीमित थी
  • अब पानी की कमी, जंगली जानवर, बाजार की अनुपलब्धता से और कमजोर

👉 परिणाम:

  • खेती छोड़ना
  • गांव खाली होना (पलायन)

यह सीधे-सीधे “जॉबलेस ग्रोथ” का सामाजिक रूप है।


🎓 5. शिक्षा बनाम रोजगार का असंतुलन

  • राज्य में पढ़े-लिखे युवाओं की संख्या बढ़ी
  • लेकिन:
    • उद्योग नहीं
    • निजी क्षेत्र सीमित
    • सरकारी नौकरियां बहुत कम

👉 इससे: “एजुकेटेड अनएम्प्लॉयमेंट” बढ़ रहा है


🏛️ 6. नीति की संरचनात्मक विफलता

(i) सेक्टर पर अत्यधिक निर्भरता

  • पर्यटन और सरकारी नौकरी
  • विविधीकरण का अभाव

(ii) स्थानीय स्किल प्लानिंग की कमी

  • जो काम उपलब्ध हैं, उसके अनुसार प्रशिक्षण नहीं
  • IT, एग्री-प्रोसेसिंग, लोकल इंडस्ट्री पर फोकस कमजोर

(iii) विकेंद्रीकरण की कमी

  • निर्णय ऊपर से
  • स्थानीय जरूरतें अनदेखी

⚠️ 7. “विकास” का भ्रम कैसे बनता है

सरकार दिखाती है:

  • सड़कें
  • तीर्थ कॉरिडोर
  • होटल निवेश

लेकिन नहीं दिखता:

  • बेरोजगार युवा
  • खाली गांव
  • अस्थायी मजदूरी

👉 यह एक नैरेटिव-ड्रिवन डेवलपमेंट मॉडल है
जहां “दिखने वाला विकास” > “रोजगार सृजन”


📉 8. सामाजिक और राजनीतिक परिणाम

यदि यही मॉडल जारी रहा तो:

  • पलायन स्थायी हो जाएगा
  • पहाड़ों में जनसंख्या संतुलन बिगड़ेगा
  • स्थानीय संस्कृति और अर्थव्यवस्था कमजोर होगी
  • राजनीतिक असंतोष बढ़ेगा

🧭 9. समाधान: क्या बदले बिना स्थिति नहीं बदलेगी

1. पर्यटन का पुनर्गठन

  • होमस्टे, लोकल गाइड, लोकल सप्लाई चेन
  • बड़े कॉरपोरेट मॉडल की सीमा तय

2. लोकल अर्थव्यवस्था पर फोकस

  • हर्बल, ऑर्गेनिक, मिलेट्स
  • वैल्यू एडिशन (प्रोसेसिंग, ब्रांडिंग)

3. माइक्रो-इंडस्ट्री और क्लस्टर मॉडल

  • जिला स्तर पर छोटे उद्योग
  • हस्तशिल्प, फूड प्रोसेसिंग

4. स्किल और रोजगार का सीधा लिंक

  • ट्रेनिंग वही जो बाजार मांगता है
  • लोकल सेक्टर आधारित स्किलिंग

5. विकेंद्रीकृत नीति निर्माण

  • ग्राम और ब्लॉक स्तर पर आर्थिक योजना

निष्कर्ष

उत्तराखंड में “जॉबलेस ग्रोथ” केवल आर्थिक समस्या नहीं है—
यह नीतिगत प्राथमिकताओं की विफलता है।

👉 जब विकास का मॉडल
स्थानीय लोगों को केंद्र में नहीं रखता,
तो वह विकास नहीं,
असंतुलन और पलायन पैदा करता है।


अंतिम प्रश्न

क्या उत्तराखंड में विकास का उद्देश्य
लोगों को रोजगार देना है
या केवल
इन्फ्रास्ट्रक्चर दिखाना?

इसी सवाल का जवाब तय करेगा कि
आने वाले वर्षों में उत्तराखंड
बस एक पर्यटन स्थल रहेगा या एक जीवित समाज।


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By udaen

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