खनन का असर दिखता है, DMF का लाभ क्यों नहीं?”—पौड़ी गढ़वाल की चुप्पी
पौड़ी गढ़वाल में नदी-आधारित खनन कोई नई बात नहीं है। कोटद्वार और यमकेश्वर बेल्ट में रेत-बजरी का दोहन स्थानीय अर्थव्यवस्था का हिस्सा है—लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही स्पष्ट है: नदी तंत्र पर दबाव, सड़क क्षति, और गांवों पर प्रत्यक्ष असर। सवाल यह है कि इन प्रभावों की भरपाई के लिए बने District Mineral Foundation (DMF) का लाभ आखिर दिखता क्यों नहीं?
कानून स्पष्ट है। के तहत DMF एक वैधानिक ट्रस्ट है—जिसका उद्देश्य खनन-प्रभावित समुदायों का पुनर्वास और कल्याण है। राष्ट्रीय दिशानिर्देश यह भी तय करते हैं कि कम से कम 60% खर्च स्वास्थ्य, पेयजल, शिक्षा और पर्यावरण जैसे प्राथमिक क्षेत्रों में हो। सिद्धांत साफ है: “जो नुकसान झेले, उसे प्राथमिक लाभ मिले।”
पर पौड़ी में वास्तविकता उलटी दिखती है। सार्वजनिक डोमेन में DMF के वर्षवार संग्रह, सेक्टर-वाइज व्यय, या ग्राम पंचायत-वार लाभ का ठोस डेटा उपलब्ध नहीं है। यह “डेटा का अभाव” महज तकनीकी कमी नहीं, बल्कि जवाबदेही का प्रश्न है। जब फंड का स्रोत सार्वजनिक है—तो उसका उपयोग भी सार्वजनिक होना चाहिए।
दूसरा मुद्दा संरचनात्मक है। DMF का संचालन जिला प्रशासन के अधीन है, जहां निर्णय अक्सर टॉप-डाउन तरीके से होते हैं। ग्राम सभा की भागीदारी—जो इस तंत्र का मूल उद्देश्य थी—व्यवहार में सीमित दिखाई देती है। परिणामतः, प्राथमिकताएँ भी बदल जाती हैं: दिखने वाले अवसंरचना कार्यों को बढ़त मिलती है, जबकि स्वास्थ्य, जल-सुरक्षा और पर्यावरण पुनर्स्थापन पीछे छूट जाते हैं।
तीसरा, अवैध खनन की चुनौती DMF की प्रभावशीलता को सीधे प्रभावित करती है। जहां रॉयल्टी नहीं, वहां DMF योगदान भी नहीं—लेकिन पर्यावरणीय और सामाजिक नुकसान पूरा का पूरा स्थानीय समुदाय झेलता है। यह असंतुलन “पब्लिक ट्रस्ट” की उस बुनियादी धारणा को कमजोर करता है, जिसके अनुसार प्राकृतिक संसाधन जनता के हैं और राज्य केवल ट्रस्टी है।
पौड़ी के संदर्भ में सबसे सटीक वर्णन यही है—“Invisible Fund Syndrome”। फंड मौजूद है, पर उसका असर दृश्य नहीं। खनन का प्रभाव प्रत्यक्ष है, लेकिन पुनर्वास का तंत्र अस्पष्ट। इस स्थिति को बदलने के लिए तीन कदम अनिवार्य हैं: (1) वर्षवार और ग्राम-वार DMF डेटा का अनिवार्य प्रकाशन, (2) ग्राम सभा आधारित प्राथमिकता निर्धारण और सोशल ऑडिट, (3) अवैध खनन पर सख्त प्रवर्तन और उससे जुड़े आर्थिक नुकसान का सार्वजनिक आकलन।
आखिरकार, प्रश्न किसी एक जिले का नहीं है—यह शासन की विश्वसनीयता का प्रश्न है। जब संसाधन “जनता के” हैं, तो उनका लाभ भी “जनता तक” दिखना चाहिए। पौड़ी में यह कड़ी अभी टूटी हुई है—और इसे जोड़ना प्रशासनिक विकल्प नहीं, कानूनी दायित्व है।
