लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 800+ करने की चर्चा, और साथ ही Women’s Reservation Act, 2023 के लागू होने के बाद तस्वीर और जटिल हो गई है। अब संसद और विधानसभाओं में 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी—यह प्रतिनिधित्व के लिहाज से ऐतिहासिक कदम है।
लेकिन इसके साथ एक बड़ा आर्थिक और नीतिगत प्रश्न भी खड़ा होता है।
अनुमानों के अनुसार, सांसदों और विधायकों की संख्या बढ़ने से लगभग ₹11,000 करोड़ का अतिरिक्त बोझ सार्वजनिक खजाने पर पड़ेगा। यह पैसा अंततः आएगा कहाँ से?
सीधा उत्तर है—करदाता।
इनकम टैक्स, GST या सरकारी उधारी—हर रास्ता जनता की जेब तक ही जाता है।
परिसीमन का तर्क स्पष्ट है—1971 के बाद से जनसंख्या बढ़ी है और वर्तमान प्रतिनिधित्व असंतुलित हो चुका है। वहीं, महिला आरक्षण कानून का उद्देश्य ऐतिहासिक लैंगिक असमानता को सुधारना है। दोनों ही कदम सिद्धांततः लोकतंत्र को अधिक समावेशी बनाने की दिशा में हैं।
लेकिन यहीं सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—
क्या यह विस्तार लोकतंत्र की गुणवत्ता भी बढ़ाएगा, या सिर्फ उसका आकार?
आज की स्थिति में—
▪ संसद में बहस सीमित होती जा रही है
▪ विधेयक जल्दबाजी में पारित हो रहे हैं
▪ समितियों की भूमिका कमजोर पड़ी है
▪ जवाबदेही का ढांचा अस्पष्ट है
ऐसे में, यदि सीटें बढ़ती हैं और आरक्षण लागू होता है, तो यह “प्रतिनिधित्व का विस्तार” तो होगा, लेकिन “प्रभावी लोकतंत्र” तभी बनेगा जब संस्थागत सुधार भी साथ चलें।
संघीय संतुलन का प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जनसंख्या आधारित परिसीमन से बड़े राज्यों का प्रभाव बढ़ेगा, जबकि छोटे और जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्य—जैसे —अपनी हिस्सेदारी खो सकते हैं।
इस पूरे परिदृश्य में असली सवाल केवल खर्च का नहीं है।
सवाल यह है कि—
जिस जनता से पैसा लिया जा रहा है, उसे बदले में क्या मिल रहा है?
अगर—
▪ महिलाओं की वास्तविक राजनीतिक भागीदारी बढ़ती है
▪ नीति-निर्माण अधिक समावेशी और प्रभावी होता है
▪ संसद की कार्यक्षमता और जवाबदेही मजबूत होती है
तो यह खर्च एक लोकतांत्रिक निवेश है।
लेकिन अगर यह केवल संख्या और संरचना का विस्तार बनकर रह गया, तो यह करदाता पर अतिरिक्त बोझ ही साबित होगा।
नारी शक्ति का प्रतिनिधित्व और लोकतंत्र की गुणवत्ता—दोनों साथ बढ़ें, तभी यह बदलाव सार्थक होगा।
