शीर्षक: उच्च शिक्षा में व्यावहारिकता की ओर कदम: ‘प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस’ पहल से बदलेगा अकादमिक परिदृश्य
भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली में एक महत्वपूर्ण संरचनात्मक बदलाव करते हुए (UGC) ने ‘प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस’ (Professor of Practice) की पहल को लागू किया है। यह कदम पारंपरिक अकादमिक योग्यताओं की बाध्यता को कम कर, अनुभव-आधारित शिक्षण को बढ़ावा देने की दिशा में एक अहम प्रयास माना जा रहा है।
क्या है ‘प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस’ पहल?
इस पहल के तहत अब विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर बनने के लिए पीएचडी या नेट जैसी पारंपरिक योग्यताओं की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई है। इसके स्थान पर कम से कम 15 वर्षों का व्यावसायिक अनुभव रखने वाले विशेषज्ञों को इस पद पर नियुक्त किया जा सकता है। इसका उद्देश्य कक्षा में सैद्धांतिक ज्ञान के साथ-साथ व्यावहारिक अनुभव का समावेश करना है।
किन क्षेत्रों के विशेषज्ञ होंगे शामिल?
इस योजना के तहत विभिन्न क्षेत्रों के अनुभवी पेशेवरों को शिक्षण में शामिल किया जा सकता है, जैसे—
- पत्रकार और मीडिया विशेषज्ञ
- लोक कलाकार और सांस्कृतिक हस्तियां
- उद्योग जगत के प्रतिनिधि
- सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी
- विज्ञान और तकनीकी विशेषज्ञ
ये विशेषज्ञ छात्रों को न केवल विषय की वास्तविक समझ देंगे, बल्कि उन्हें रोजगार, इंटर्नशिप और स्किल डेवलपमेंट से भी जोड़ेंगे।
नियुक्ति प्रक्रिया और अवधि
‘प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस’ की नियुक्ति आमतौर पर एक वर्ष के लिए की जाती है, जिसे प्रदर्शन के आधार पर आगे बढ़ाया जा सकता है। यह लचीला ढांचा विश्वविद्यालयों को समयानुकूल विशेषज्ञों को जोड़ने का अवसर देता है।
व्यावहारिक उदाहरण
इसी पहल के अंतर्गत , मेरठ ने प्रसिद्ध लोक गायिका को ‘प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस’ नियुक्त किया है। यह कदम छात्रों को लोक कला, संस्कृति और भारतीय परंपराओं की गहराई से समझ विकसित करने में सहायक होगा।
नीतिगत महत्व और संभावित प्रभाव
यह पहल नई शिक्षा नीति (NEP) 2020 के उस दृष्टिकोण को आगे बढ़ाती है, जिसमें शिक्षा को बहु-विषयक, कौशल-आधारित और रोजगारोन्मुख बनाने पर जोर दिया गया है।
- उद्योग और अकादमिक जगत के बीच की खाई कम होगी
- छात्रों को वास्तविक कार्य-परिस्थितियों की समझ मिलेगी
- नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा मिलेगा
हालांकि, इस मॉडल के साथ गुणवत्ता नियंत्रण, चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता और पारंपरिक शिक्षकों के साथ संतुलन बनाए रखने जैसी चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं।
‘प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस’ पहल भारतीय उच्च शिक्षा को अधिक प्रासंगिक, व्यावहारिक और समावेशी बनाने की दिशा में एक निर्णायक कदम है। यदि इसे प्रभावी ढंग से लागू किया गया, तो यह न केवल छात्रों के कौशल विकास को सुदृढ़ करेगा, बल्कि शिक्षा को वास्तविक दुनिया की जरूरतों के साथ बेहतर तरीके से जोड़ सकेगा।
