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संपादकीय: मुफ्त सुविधाएँ बनाम जन-अधिकार: वीआईपी संस्कृति पर सवाल

क्या मुफ्त बिजली और मुफ्त इलाज केवल मुख्यमंत्री और मंत्रियों के लिए हैं? यह प्रश्न सतही तौर पर भले ही एक राजनीतिक टिप्पणी लगे, लेकिन इसके भीतर लोकतंत्र की मूल भावना—समानता और जवाबदेही—का गहरा सवाल छिपा है।

भारत में जनप्रतिनिधियों को मिलने वाली सुविधाएँ—मुफ्त बिजली, आवास, इलाज—को “पद से जुड़ी आवश्यकताएँ” बताया जाता है। तर्क यह दिया जाता है कि शासन चलाने वाले व्यक्तियों को आर्थिक चिंताओं से मुक्त रखकर उन्हें अधिक कुशल बनाया जा सकता है। परंतु यही तर्क तब कमजोर पड़ जाता है, जब आम नागरिक—जो करदाता भी है—उन्हीं बुनियादी सेवाओं के लिए संघर्ष करता है।

संविधान के नीति-निदेशक तत्व राज्य को यह निर्देश देते हैं कि वह सभी नागरिकों के लिए स्वास्थ्य, जीवन स्तर और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करे। इसी सोच के तहत आयुष्मान भारत योजना जैसी पहलें सामने आईं, जिनका उद्देश्य गरीबों को मुफ्त या सस्ती स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराना है। कई राज्यों में सीमित स्तर पर मुफ्त या सब्सिडी वाली बिजली भी दी जाती है। फिर भी वास्तविकता यह है कि इन योजनाओं की पहुंच, गुणवत्ता और स्थायित्व अक्सर सवालों के घेरे में रहते हैं।

यहाँ मूल बहस “मुफ्त” बनाम “भुगतान” की नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं की है। यदि राज्य अपने उच्च पदों पर बैठे लोगों के लिए व्यापक सुविधाएँ सुनिश्चित कर सकता है, तो वही राज्य आम नागरिकों के लिए न्यूनतम गरिमा के साथ जीवन जीने की गारंटी क्यों नहीं दे पाता? क्या स्वास्थ्य और ऊर्जा जैसी बुनियादी जरूरतें अधिकार नहीं होनी चाहिए?

विरोधी तर्क यह है कि असीमित मुफ्त योजनाएँ राज्य की वित्तीय सेहत को कमजोर कर सकती हैं और “फ्रीबी संस्कृति” को बढ़ावा देती हैं। यह चिंता निराधार नहीं है। लेकिन इसका समाधान यह नहीं कि कल्याणकारी योजनाओं को ही संदेह के घेरे में डाल दिया जाए, बल्कि यह है कि लक्षित, पारदर्शी और टिकाऊ नीतियाँ बनाई जाएँ—जहाँ जरूरतमंद को प्राथमिकता मिले और संसाधनों का दुरुपयोग रोका जाए।

दरअसल, असली समस्या दोहरी व्यवस्था (dual system) की है—एक तरफ वीआईपी वर्ग के लिए लगभग असीमित सुविधाएँ, और दूसरी तरफ आम नागरिक के लिए सीमित और अक्सर अपूर्ण सेवाएँ। यह असंतुलन लोकतांत्रिक नैतिकता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

समाधान स्पष्ट है:

राज्य को यह सुनिश्चित करना होगा कि बुनियादी सेवाएँ—जैसे स्वास्थ्य और बिजली—को न्यूनतम अधिकार के रूप में देखा जाए, न कि चुनावी वादों या विशेषाधिकार के रूप में। साथ ही, जनप्रतिनिधियों को मिलने वाली सुविधाओं में भी पारदर्शिता और तर्कसंगत सीमा तय करनी होगी।

अंततः, लोकतंत्र की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिक के साथ कैसा व्यवहार करता है। यदि सत्ता और जनता के बीच सुविधाओं की खाई लगातार बढ़ती रही, तो यह केवल आर्थिक असमानता नहीं, बल्कि विश्वास का संकट भी पैदा करेगी।


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By udaen

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