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संपादकीय

“105 सीटों का उत्तराखंड: क्या यह ‘पर्वतीय न्याय’ की दिशा में जरूरी कदम है?”

लेख:

उत्तराखंड की राजनीति लंबे समय से एक असंतुलन का शिकार रही है—जनसंख्या और भूगोल के बीच का असंतुलन। जहां एक ओर हरिद्वार और उधमसिंह नगर जैसे मैदानी जिले राजनीतिक शक्ति के केंद्र बन गए हैं, वहीं पिथौरागढ़, चमोली और उत्तरकाशी जैसे सीमांत जिले प्रतिनिधित्व की कमी से जूझ रहे हैं।

70 विधानसभा सीटों का वर्तमान ढांचा उस समय का प्रतिबिंब है जब राज्य की जरूरतें और चुनौतियाँ अलग थीं। आज, जब पलायन, आपदा और सीमांत सुरक्षा जैसे मुद्दे सामने हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या वर्तमान प्रतिनिधित्व पर्याप्त है?

105 सीटों का प्रस्ताव केवल संख्या बढ़ाने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह “समानता” से आगे बढ़कर “न्यायसंगत प्रतिनिधित्व” की मांग है। पर्वतीय क्षेत्रों में एक विधायक का क्षेत्र कई बार इतना विशाल और दुर्गम होता है कि प्रभावी जनप्रतिनिधित्व लगभग असंभव हो जाता है।

हालांकि, यह कदम राजनीतिक रूप से आसान नहीं होगा। इससे सत्ता संतुलन बदलेगा, नए क्षेत्रीय समीकरण बनेंगे और संभवतः “पहाड़ बनाम मैदान” की बहस तेज होगी। लेकिन लोकतंत्र का मूल सिद्धांत केवल संख्या नहीं, बल्कि हर नागरिक की आवाज को समान महत्व देना है।

2026 के बाद होने वाला परिसीमन उत्तराखंड के लिए एक ऐतिहासिक अवसर होगा। यह तय करेगा कि राज्य अपनी भौगोलिक वास्तविकताओं को स्वीकार करता है या केवल जनसंख्या के आंकड़ों तक सीमित रहता है।

उत्तराखंड के भविष्य के लिए यह बहस अब टालने योग्य नहीं है।


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By udaen

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