Spread the love

संपादकीय: उत्तराखंड को ‘एजेंट’ नहीं, जवाबदेह समाज और जन-नेतृत्व की जरूरत

उत्तराखंड आज एक चौराहे पर खड़ा है। एक तरफ विकास के दावे हैं, दूसरी तरफ खाली होते गांव, बढ़ता पलायन, और पर्यावरणीय संकट की गहराती परतें। ऐसे में यह सवाल प्रासंगिक हो जाता है कि क्या राज्य को परिवर्तन के लिए “राजनीतिक एजेंट” चाहिए या “सामाजिक एंजेल्स”?

यह बहस आकर्षक जरूर है, लेकिन समाधान इसके बीच छिपा है।

राजनीति किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की रीढ़ होती है। कानून, नीतियां, बजट और योजनाएं—सब इसी ढांचे से संचालित होते हैं। यदि राजनीति को पूरी तरह खारिज कर दिया जाए, तो परिवर्तन की कोई संस्थागत राह नहीं बचती। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब यही राजनीति जनसेवा के बजाय सत्ता-प्रबंधन का माध्यम बन जाती है। जब जनप्रतिनिधि जनता की आवाज़ के बजाय सत्ता के “एजेंट” की तरह काम करने लगते हैं, तब नीतियां ज़मीन से कट जाती हैं।

उत्तराखंड में यह disconnect साफ दिखता है। पहाड़ों से लगातार हो रहा पलायन, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, और पर्यावरणीय संतुलन से समझौता—ये सब संकेत हैं कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में स्थानीय जरूरतों की अनदेखी हो रही है।

दूसरी ओर, समाज के भीतर भी एक सशक्त धारा मौजूद है—RTI कार्यकर्ता, पर्यावरण प्रेमी, सामाजिक संगठनों और स्थानीय पत्रकारों की। ये वही लोग हैं जो व्यवस्था से सवाल करते हैं, भ्रष्टाचार को उजागर करते हैं और जनहित के मुद्दों को सामने लाते हैं। इन्हें “सामाजिक एंजेल्स” कहा जा सकता है, क्योंकि ये बिना किसी औपचारिक सत्ता के भी बदलाव की दिशा तय करते हैं।

लेकिन इनकी भी अपनी सीमाएं हैं। ये दबाव बना सकते हैं, दिशा दिखा सकते हैं, लेकिन नीतियां लागू नहीं कर सकते। यही वह बिंदु है जहां समाज और राजनीति के बीच पुल की जरूरत महसूस होती है।

उत्तराखंड को न तो केवल “एंजेल्स” के भरोसे छोड़ा जा सकता है और न ही “एजेंट्स” के हवाले किया जा सकता है। असली आवश्यकता है एक ऐसे मॉडल की, जहां सामाजिक चेतना और राजनीतिक जिम्मेदारी साथ-साथ चलें।

जब सामाजिक सरोकारों से जुड़े लोग राजनीति में आएंगे, और जब राजनीति समाज के प्रति जवाबदेह होगी, तभी एक संतुलित और स्थायी विकास संभव होगा। ग्राम सभाओं को सशक्त करना, स्थानीय नेतृत्व को बढ़ावा देना और पारदर्शिता को संस्थागत रूप देना—ये कुछ ऐसे कदम हैं जो इस दिशा में निर्णायक साबित हो सकते हैं।

अंततः, उत्तराखंड को “मसीहाओं” की नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकों और जिम्मेदार नेतृत्व की जरूरत है।
क्योंकि बदलाव न तो केवल सत्ता से आता है और न ही केवल समाज से—वह दोनों के बीच संवाद और साझेदारी से जन्म लेता है।


Spread the love

By udaen

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *