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🌱 डिजिटल पोर्टल या हरित शासन का नया भ्रम? — MoEFCC-GEP पर जन-पक्षीय दृष्टि

भारत में पर्यावरणीय मंजूरियों और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग को लेकर वर्षों से जनता, सरकार और कॉरपोरेट हितों के बीच टकराव रहा है। ऐसे समय में Ministry of Environment, Forest and Climate Change द्वारा शुरू किया गया GEP डिजिटल पोर्टल एक ओर आधुनिक प्रशासन का संकेत देता है, तो दूसरी ओर यह सवाल भी उठाता है कि क्या यह पहल वास्तव में पर्यावरणीय न्याय को मजबूत करेगी या केवल प्रक्रियात्मक सुधार तक सीमित रह जाएगी।

📊 पारदर्शिता की उम्मीद, केंद्रीकरण का खतरा

सरकार का दावा है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म से

  • पर्यावरणीय स्वीकृतियों की प्रक्रिया तेज होगी
  • डेटा आधारित निर्णय-प्रक्रिया विकसित होगी
  • भ्रष्टाचार और देरी कम होगी

लेकिन जमीनी सच्चाई यह भी है कि डिजिटल सिस्टम अक्सर केंद्रीकृत नियंत्रण को मजबूत करते हैं, जिससे
👉 स्थानीय समुदायों की भूमिका सीमित हो सकती है
👉 जनसुनवाई और सामाजिक प्रभाव आकलन केवल औपचारिकता बन सकते हैं

पर्यावरणीय शासन का मूल सिद्धांत लोक भागीदारी है, न कि केवल ऑनलाइन फाइल-मूवमेंट।

⚖️ विकास बनाम विस्थापन का सवाल

देश में बड़ी परियोजनाओं को लेकर अक्सर यह देखा गया है कि

  • उद्योग और अवसंरचना को “राष्ट्रीय हित” का दर्जा देकर
  • स्थानीय पर्यावरणीय चिंताओं को दूसरे पायदान पर रख दिया जाता है

यदि GEP पोर्टल का उपयोग केवल क्लीयरेंस को तेज करने के औजार के रूप में हुआ, तो यह
🌍 पर्यावरण संरक्षण की बजाय
🏗️ तेज औद्योगिक विस्तार का माध्यम भी बन सकता है।

🌄 उत्तराखंड का संदर्भ : डिजिटल डेटा से जनसंघर्ष तक

पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील राज्य Uttarakhand में

  • जलविद्युत परियोजनाएं
  • चारधाम सड़क विस्तार
  • खनन और पर्यटन आधारित निर्माण

पहले ही भूस्खलन, जल संकट और पारिस्थितिक असंतुलन के सवाल पैदा कर चुके हैं।

ऐसे में यदि GEP जैसे प्लेटफॉर्म पर
📌 परियोजनाओं का वास्तविक पर्यावरणीय डेटा
📌 विशेषज्ञ रिपोर्ट
📌 जनसुनवाई की कार्यवाही

सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं होती, तो डिजिटल शासन केवल तकनीकी आवरण में प्रशासनिक अपारदर्शिता बनकर रह जाएगा।

🧭 असली चुनौती : तकनीक नहीं, राजनीतिक इच्छाशक्ति

पर्यावरणीय संकट का समाधान केवल पोर्टल, ऐप या डैशबोर्ड से नहीं होगा।
जरूरी है —

  • निर्णय प्रक्रिया में स्थानीय निकायों और ग्राम सभाओं की भागीदारी
  • स्वतंत्र वैज्ञानिक मूल्यांकन
  • न्यायिक निगरानी और संवैधानिक उत्तरदायित्व

अन्यथा “ग्रीन गवर्नेंस” की अवधारणा
👉 नीतिगत नारेबाज़ी बनकर रह जाएगी।

✍️ निष्कर्ष

MoEFCC-GEP पोर्टल एक अवसर है —
लेकिन यह अवसर तभी सार्थक होगा जब डिजिटल प्लेटफॉर्म
📢 जनता की निगरानी का माध्यम बने
⚖️ पर्यावरणीय न्याय का उपकरण बने
🌱 और विकास की दिशा को सतत और उत्तरदायी बनाए।

यदि ऐसा नहीं हुआ, तो यह पहल
हरित प्रशासन के नाम पर संसाधनों के तेज दोहन की नई संरचना भी बन सकती है।



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By udaen

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