संपादकीय
निर्भीक पत्रकारिता की मशाल: नरेंद्र उनियाल और उनके साथियों की स्मृति


12 मार्च का दिन उत्तराखंड की जनपक्षधर पत्रकारिता और लोकतांत्रिक संघर्षों की स्मृतियों को जीवित करने वाला दिन है। यह दिन लोकतंत्र सेनानी, प्रख्यात पत्रकार और उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी स्वर्गीय नरेंद्र उनियाल की 75वीं जयंती का है। इस अवसर पर उन्हें स्मरण करना केवल एक व्यक्तित्व को श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उस निर्भीक और निष्पक्ष पत्रकारिता की परंपरा को भी याद करना है, जिसने कठिन परिस्थितियों में भी सच की आवाज़ को जीवित रखा।
नरेंद्र उनियाल उन पत्रकारों में थे जिनके लिए पत्रकारिता केवल खबर लिखने का माध्यम नहीं थी, बल्कि समाज के संघर्षों और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का दायित्व थी। उनके संपादन में प्रकाशित समाचार पत्र धधकता पहाड़ अपने समय में जनपक्षधर और निर्भीक पत्रकारिता का प्रतीक बन गया था। पहाड़ के सामाजिक-आर्थिक सवाल, आम लोगों की पीड़ा और क्षेत्रीय असमानताओं के मुद्दे इस अखबार के माध्यम से प्रभावी ढंग से सामने आते थे।
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में भारतीय आपातकाल का दौर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए सबसे कठिन समय माना जाता है। उस समय अनेक पत्रकारों और लोकतंत्र समर्थकों को जेल में डाला गया। नरेंद्र उनियाल भी उन साहसी व्यक्तित्वों में थे जिन्होंने 19 महीने तक जेल की यातनाएँ सहकर लोकतंत्र और स्वतंत्र पत्रकारिता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का परिचय दिया।
लेकिन किसी भी आंदोलन या पत्रकारिता की परंपरा केवल एक व्यक्ति से नहीं बनती। उस दौर में उनके साथ अनेक ऐसे साथी पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और आंदोलनकारी भी थे, जिन्होंने सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों में भी सच को सामने लाने का साहस किया। वे लोग केवल खबर लिखने वाले नहीं थे, बल्कि समाज की चेतना को जगाने वाले प्रहरी थे।
आज जब मीडिया का स्वरूप तेजी से बदल रहा है और खबरों के साथ बाजार और राजनीतिक प्रभाव की चर्चा भी बढ़ रही है, तब नरेंद्र उनियाल और उनके साथियों की पत्रकारिता हमें यह याद दिलाती है कि पत्रकारिता का मूल धर्म सत्ता से सवाल करना और समाज की आवाज़ बनना है।
आज उनके भाई, वरिष्ठ संपादक पत्रकार नागेंद्र उनियाल जी, उनकी प्रेरणा से कोटद्वार और देहरादून से प्रकाशित दैनिक अखबार “जयंत” के माध्यम से उसी निर्भीक और जनपक्षधर पत्रकारिता की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
उनकी 75वीं जयंती पर स्वर्गीय नरेंद्र उनियाल को शत-शत नमन और कोटि-कोटि वंदन। साथ ही उन सभी साथियों और पत्रकारों को भी श्रद्धांजलि, जिन्होंने अपने साहस और प्रतिबद्धता से जनपक्षधर पत्रकारिता की उस परंपरा को मजबूत किया, जो आज भी समाज को दिशा देने की क्षमता रखती है।
