संपादकीय
शादियों का बढ़ता दिखावा: कोटद्वार से उठता एक सामाजिक सवाल
उत्तराखंड के तराई–भाबर क्षेत्र, विशेषकर कोटद्वार में, पिछले कुछ वर्षों में शादियों का स्वरूप तेजी से बदलता दिखाई दे रहा है। कभी सादगी, सामुदायिक सहयोग और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ होने वाले विवाह समारोह अब दिखावे, प्रतिस्पर्धा और अत्यधिक खर्च के प्रतीक बनते जा रहे हैं। हाल के समय में कोटद्वार की कई शादियों में जिस तरह का वैभव और प्रदर्शन देखने को मिला है, वह केवल एक सामाजिक आयोजन नहीं बल्कि एक नई मानसिकता का संकेत भी है।
इन आयोजनों में महंगे बैंक्वेट, सैकड़ों व्यंजनों वाले भव्य भोज, सजावट और मनोरंजन पर लाखों-करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। लेकिन इस भव्यता के पीछे एक कड़वा सच भी छिपा है—भोजन और अन्य संसाधनों की भारी बर्बादी। विवाह समारोहों के बाद बड़ी मात्रा में खाना कूड़ेदानों में जाता हुआ देखा जा सकता है, जबकि समाज का एक बड़ा वर्ग आज भी भोजन जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहा है।
कोटद्वार जैसे शहर, जो लंबे समय से पहाड़ और मैदान के सामाजिक-सांस्कृतिक संगम के रूप में विकसित हुए हैं, वहां यह प्रवृत्ति और भी स्पष्ट दिखाई देती है। यहां बड़ी संख्या में बाहर से आए आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग के लोग बस चुके हैं। उनके द्वारा आयोजित भव्य शादियां धीरे-धीरे एक सामाजिक मानक बनती जा रही हैं। इसका असर यह है कि स्थानीय मध्यमवर्गीय और सामान्य परिवार भी उसी स्तर की शादियां करने के सामाजिक दबाव में आ जाते हैं। परिणामस्वरूप कई परिवार अपनी आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च करते हैं, कर्ज लेते हैं और बाद में आर्थिक तनाव व मानसिक दबाव का सामना करते हैं।
यह केवल आर्थिक असमानता का मामला नहीं है, बल्कि संसाधनों के असंतुलित उपयोग का भी प्रश्न है। प्रकृति ने भोजन और अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर सभी मनुष्यों को समान अधिकार दिया है। लेकिन जब समाज का एक छोटा संपन्न वर्ग इन संसाधनों का अत्यधिक उपभोग और प्रदर्शन करता है, तो वह अनजाने में ही उन संसाधनों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करता है। इस प्रक्रिया में समाज का कमजोर और साधारण वर्ग अपने हिस्से के अवसरों और अधिकारों से दूर होता चला जाता है।
विवाह समारोहों में भोजन की बर्बादी इस असंतुलन का सबसे प्रत्यक्ष उदाहरण है। जहां एक ओर लाखों लोगों को पर्याप्त भोजन उपलब्ध नहीं हो पाता, वहीं दूसरी ओर शादियों में बड़ी मात्रा में भोजन बिना उपयोग के नष्ट हो जाता है। यह केवल आर्थिक या नैतिक प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता का भी मुद्दा है।
उत्तराखंड की पारंपरिक संस्कृति सादगी, सामूहिक सहयोग और प्रकृति के प्रति सम्मान पर आधारित रही है। पहाड़ के गांवों में विवाह केवल दो परिवारों का नहीं, बल्कि पूरे समाज का उत्सव हुआ करता था। वहां दिखावे से अधिक महत्व रिश्तों, सहयोग और सामुदायिक सहभागिता को दिया जाता था। लेकिन बदलती उपभोक्तावादी संस्कृति और सामाजिक प्रतिस्पर्धा ने इस मूल भावना को कमजोर करना शुरू कर दिया है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज इस प्रवृत्ति पर गंभीरता से विचार करे। विवाह जैसे सामाजिक आयोजनों को प्रतिष्ठा की प्रतिस्पर्धा बनाने के बजाय उन्हें सामाजिक जिम्मेदारी और संतुलन के साथ आयोजित किया जाना चाहिए। सीमित और सादगीपूर्ण आयोजन, भोजन की बर्बादी को रोकने के प्रयास और सामाजिक जागरूकता इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
कोटद्वार की चमकदार शादियों के बीच यह सवाल अब उठने लगा है कि क्या हम उत्सव मना रहे हैं या संसाधनों की असमानता और सामाजिक दबाव को बढ़ा रहे हैं? यदि समय रहते समाज ने इस पर आत्ममंथन नहीं किया, तो यह दिखावे की संस्कृति आने वाले समय में आर्थिक बोझ, सामाजिक असमानता और नैतिक संकट को और गहरा कर सकती है।
