संपादकीय
राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के सामने नेतृत्व की पहली परीक्षा: क्या बालेन शाह बनेंगे प्रधानमंत्री?
नेपाल के हालिया प्रतिनिधि सभा चुनाव ने देश की राजनीति में बड़ा बदलाव दर्ज किया है। पत्रकार से राजनेता बने की पार्टी (राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी) को पूर्ण बहुमत मिलने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि देश का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा।
पूरे चुनाव अभियान के दौरान युवा नेता को भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत किया गया। इंजीनियर और रैपर के रूप में लोकप्रियता हासिल करने वाले बालेन शाह ने युवाओं के बीच एक अलग पहचान बनाई और पारंपरिक राजनीति से असंतुष्ट मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित किया। यही कारण रहा कि चुनाव में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को अभूतपूर्व समर्थन मिला।
हालांकि चुनाव परिणाम आने के बाद पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। पार्टी के कई वरिष्ठ नेता बालेन शाह को अपना नेता मानने के बजाय पार्टी संस्थापक को ही प्रधानमंत्री बनाने की वकालत कर रहे हैं। उनका तर्क है कि पार्टी को खड़ा करने और राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने में रवि लामिछाने की सबसे बड़ी भूमिका रही है।
यह स्थिति इसलिए भी रोचक है क्योंकि पिछले चुनाव में जब राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के केवल लगभग 20 सांसद ही संसद में पहुंचे थे, तब भी रवि लामिछाने उपप्रधानमंत्री बनने में सफल रहे थे। ऐसे में अब जब पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला है, तो यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या पार्टी प्रमुख स्वयं प्रधानमंत्री पद से पीछे हटकर किसी और को यह जिम्मेदारी सौंपेंगे।
दूसरी ओर, बालेन शाह के समर्थकों का मानना है कि चुनाव के दौरान जनता के सामने उन्हें ही प्रधानमंत्री के चेहरे के रूप में प्रस्तुत किया गया था। यदि अब पार्टी इस वादे से पीछे हटती है तो इससे जनता के विश्वास पर असर पड़ सकता है। इसलिए कई राजनीतिक विश्लेषक इसे केवल सत्ता का समीकरण नहीं बल्कि विश्वसनीयता की परीक्षा भी मान रहे हैं।
यह भी संभावना जताई जा रही है कि पार्टी शुरुआती दौर में बालेन शाह को प्रधानमंत्री बनाकर बाद में नेतृत्व परिवर्तन की रणनीति अपना सकती है। हालांकि ऐसी किसी भी रणनीति से पार्टी के भीतर असंतोष और राजनीतिक अस्थिरता पैदा होने का खतरा भी बना रहेगा।
नेपाल की जनता ने इस चुनाव में जिस तरह नई राजनीति पर भरोसा जताया है, वह केवल सत्ता परिवर्तन की अपेक्षा नहीं बल्कि राजनीतिक संस्कृति में बदलाव की उम्मीद भी है। ऐसे में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह आंतरिक नेतृत्व विवाद से ऊपर उठकर स्थिर और पारदर्शी शासन दे सके।
अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या अपने चुनावी अभियान में किए गए वादे के अनुरूप को प्रधानमंत्री बनाएगी, या फिर पार्टी प्रमुख स्वयं इस पद की कमान संभालेंगे।
जो भी फैसला होगा, वह केवल सरकार के गठन का नहीं बल्कि नेपाल की नई राजनीति की दिशा तय करने वाला निर्णय साबित हो सकता है।
