संपादकीय |
अंकिता हत्या कांड केवल एक जघन्य अपराध नहीं, बल्कि उत्तराखंड की राजनीतिक नैतिकता, शासन-शैली और न्याय व्यवस्था की अग्निपरीक्षा बन चुका है। दोषियों को सजा, फिर CBI जांच की संस्तुति—इन फैसलों के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पुष्कर सिंह धामी अब योगी आदित्यनाथ की तरह सख़्त और प्रतीकात्मक “लॉ-एंड-ऑर्डर” राजनीति की राह पर चल पड़े हैं?
सख़्ती बनाम संस्थागत न्याय
योगी मॉडल को आम तौर पर त्वरित और दृश्यमान कार्रवाई—कड़ी भाषा, सख़्त प्रशासन, और अपराध पर “ज़ीरो टॉलरेंस”—से जोड़ा जाता है। उत्तर प्रदेश में यह मॉडल सत्ता की राजनीतिक पहचान भी बना। इसके विपरीत, उत्तराखंड की परंपरा अपेक्षाकृत संस्थागत प्रक्रिया, शांत प्रशासन और न्यायिक मार्ग पर टिके रहने की रही है।
धामी सरकार के फैसले—पहले SIT, फिर CBI की संस्तुति—यह संकेत देते हैं कि सरकार जनाक्रोश को अनदेखा नहीं कर सकती, लेकिन साथ ही वह यह भी दिखाना चाहती है कि अंतिम शब्द संविधान और न्याय प्रक्रिया का होगा, न कि भीड़ या टीवी डिबेट का।
क्या यह ‘योगीकरण’ है?
यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि धामी ने योगी मॉडल को हूबहू अपना लिया है। समानता वहाँ दिखती है जहाँ राज्य प्रमुख स्वयं आगे आकर सख़्त संदेश देते हैं—“कोई दोषी बख्शा नहीं जाएगा।” फर्क वहाँ है जहाँ उत्तराखंड ने अब भी जांच एजेंसियों और अदालतों को केंद्र में रखा है, न कि प्रशासनिक दंडात्मक प्रदर्शन को।
राजनीति की अनिवार्यता
यह मामला अब केवल कानून-व्यवस्था नहीं रहा। भारतीय जनता पार्टी के लिए यह छवि और विश्वास का प्रश्न है, जबकि कांग्रेस इसे सत्ता की जवाबदेही का मुद्दा बनाकर भुनाना चाहती है। चुनावी राजनीति में ऐसे मामलों का प्रतीकात्मक अर्थ बढ़ जाता है—और सरकारें संदेश देने के लिए बड़े फैसले लेती हैं।
निष्कर्ष
धामी सरकार का रास्ता फिलहाल योगी मॉडल की नकल नहीं, बल्कि राजनीतिक दबाव में संस्थागत सख़्ती का प्रयास दिखता है। असली कसौटी आगे है—क्या जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और निर्भीक होगी? क्या वीआईपी प्रभाव से ऊपर उठकर सच सामने आएगा?
यदि उत्तराखंड यह साबित कर पाता है कि न्याय राजनीति से नहीं, प्रक्रिया से चलता है, तो यह धामी की अपनी राह होगी—न योगी की परछाईं, न किसी और की नकल।
