सुंदरलाल बहुगुणा: विकास के नाम पर विनाश के विरुद्ध चेतना
आज सुंदरलाल बहुगुणा की जयंती है—एक ऐसा नाम जो व्यक्ति नहीं, बल्कि विचारधारा बन चुका है। उन्होंने हमें सिखाया कि विकास यदि प्रकृति-विरोधी है, तो वह प्रगति नहीं, विनाश है। हिमालय की नाज़ुक पारिस्थितिकी, वनों की रक्षा और जल-संरक्षण को उन्होंने आंदोलन का नहीं, जन-चेतना का विषय बनाया।
चिपको आंदोलन को वैश्विक पहचान दिलाने में उनकी भूमिका निर्णायक रही। गांवों की महिलाओं से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक, बहुगुणा की आवाज़ ने यह स्पष्ट किया कि पेड़ केवल लकड़ी नहीं, जीवन हैं। उनके लेखन और नेतृत्व ने 1974 में वन संरक्षण कानून की दिशा तय की और पहाड़ों में अंधाधुंध कटान पर रोक का रास्ता खोला।
टिहरी बांध के विरोध में 45 दिनों की भूख हड़ताल उनके नैतिक साहस का प्रतीक थी—जहाँ सत्ता को पर्यावरणीय समीक्षा के लिए विवश होना पड़ा। बहुगुणा का गांधीवाद उपदेश नहीं, अभ्यास था; सत्य, अहिंसा और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का अभ्यास।
आज, जब जलवायु संकट हमारे दरवाज़े पर है, बहुगुणा की चेतावनी पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। उनकी जयंती केवल स्मरण का दिन नहीं, संकल्प का अवसर है—कि विकास की हर योजना प्रकृति के साथ संतुलन में हो।
क्योंकि प्रकृति बचेगी, तभी भविष्य बचेगा।
