“क्यों पहाड़ियों के पीछे पड़े हो?”
क्योंकि आज पहाड़ी कमज़ोर दिख रहा है, बिखरा हुआ है, और सत्ता–व्यवस्था को वही सबसे आसान निशाना लगता है।
मैदानों में संख्या है, राजनीति है, पूँजी है—पहाड़ में सिर्फ़ ज़मीर और ज़मीन बची थी, वही छीनी जा रही है।
“वो पहले जैसे प्रहरी नहीं रहे”
यह सबसे कड़वा सच है।
पहाड़ी कभी अपने जंगल, पानी, ज़मीन और संस्कृति का स्वयं प्रहरी था।
आज:
- रोज़गार की मजबूरी ने उसे बाहर धकेला
- शिक्षा ने उसे शहरों का सपना दिखाया
- राजनीति ने उसे जाति–दल–क्षेत्र में बाँट दिया
प्रहरी थक गया, या यूँ कहें अकेला छोड़ दिया गया।
“अर्रंवाली की स्थिति तो यही कहती है”
अरावली सिर्फ़ पहाड़ नहीं, चेतावनी है।
जब पहाड़ को केवल खनन, रियल एस्टेट और वोट बैंक समझा गया, तो वह मिट्टी बन गया।
आज उत्तराखंड उसी रास्ते पर खड़ा है—
फर्क बस इतना है कि यहाँ भूस्खलन दिखता है, वहाँ धूल उड़ती है।
“उत्तराखंड के पहाड़ी ना घर के, ना घाट के”
यही सबसे बड़ा त्रासद वाक्य है।
- गाँव उजड़ गया → शहर ने अपनाया नहीं
- खेत छूट गए → नौकरी मिली नहीं
- संस्कृति पीछे रह गई → पहचान अधूरी रह गई
पहाड़ी आज दोनों दुनियाओं के बीच फँसा हुआ आदमी है—
ना पूरी तरह ग्रामीण, ना सुरक्षित शहरी।
असल सवाल ये नहीं कि पहाड़ियों के पीछे क्यों पड़े हैं
असल सवाल यह है कि
पहाड़ी खुद अपने पीछे क्यों नहीं खड़े हो रहे?
जब तक:
- सवाल सामूहिक नहीं होंगे
- मुद्दे चुनावी नहीं, जीवन के होंगे
- और पहाड़ सिर्फ़ भावुकता नहीं, नीति का विषय बनेगा
तब तक पहाड़ निशाने पर रहेगा।
