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एक भारत, श्रेष्ठ भारत की अवधारणा को मूर्त रूप प्रदान करने वाले भव्य सांस्कृतिक महोत्सव काशी–तमिल संगमम् 4.0 के अंतर्गत आज वाराणसी के ऐतिहासिक दशाश्वमेध घाट पर “वणक्कम काशी चित्रकला प्रतियोगिता” का उत्साहपूर्ण आयोजन सम्पन्न हुआ।

कार्यक्रम का उद्देश्य उत्तर और दक्षिण भारत अर्थात काशी और तमिल संस्कृति के प्राचीन, आध्यात्मिक एवं ऐतिहासिक संबंधों को रचनात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से समाज के सामने प्रस्तुत करना है। इस प्रतियोगिता का मुख्य विषय- “काशी और तमिलनाडु की समृद्ध संस्कृतियों का उत्सव” प्रतिभागियों को उन साझा मूल्यों को उजागर करने का सृजनात्मक अवसर प्रदान करता है, जिसने सदियों से दोनों क्षेत्रों को एक सूत्र में बांध रखा है।

काशी–तमिल संगमम देश की विविधता में निहित एकता की उस विरासत को पुनर्पुष्ट करता है, जो भाषा, साहित्य, संगीत, स्थापत्य, भक्ति परंपरा एवं दर्शन को एक सांस्कृतिक धारा में प्रवाहित करती है। तमिलनाडु के तीर्थस्थलों और काशी के बैकुंठ स्वरूप को जोड़ती भगवान शिव की उपासना इस महोत्सव का केंद्रीय भाव है, जो कला के माध्यम से आज के कार्यक्रम में प्रत्यक्ष हुआ।

चित्रकला प्रतियोगिता में बनारस सहित विभिन्न संस्थानों के छात्रों और प्रतिभागियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। प्रतिभागियों ने रंगों, रेखाओं और कल्पना की उड़ान के द्वारा काशी के घाटों, नटराज की आकृति, काशी विश्वनाथ मंदिर, मेनाक्षी अम्मन मंदिर, भरतनाट्यम, बुनकरी, द्रविड़ स्थापत्य और बनारसी परंपराओं को अद्भुत रूप में चित्रित किया।

कार्यक्रम का सफल समन्वय डॉ. महेश सिंह (सह-प्रोफेसर, दृश्य कला संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) और डॉ. सुनील पटेल (सहायक प्रोफेसर, दृश्य कला संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) द्वारा किया गया। दोनों समन्वयकों ने इस पहल को काशी–तमिल सांस्कृतिक संगम को समझने का सशक्त माध्यम बताया।

कार्यक्रम में उपस्थित दर्शकों और पर्यटकों ने कला की इस अनूठी प्रस्तुति का हर्ष और हृदय से स्वागत किया। प्रतियोगिता के परिणाम आगामी दिवस में घोषित किए जाएंगे और विजेताओं को सम्मानित किया जाएगा।

विश्वविद्यालय प्रशासन का विश्वास है कि इस प्रकार की सृजनात्मक गतिविधियाँ युवा पीढ़ी को सांस्कृतिक जड़ों के प्रति सजग और गर्वशील बनाती हैं, साथ ही काशी–तमिल संगमम 4.0 के उद्देश्यों को व्यापक समाज तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।


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By udaen

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