🕯️ “जब विश्वास अंधा हो जाता है — उत्तराखंड में अंधविश्वास का सच”
🌿 लेख
उत्तराखंड की वादियाँ देवभूमि कहलाती हैं, पर इन्हीं घाटियों में कभी-कभी अंधविश्वास के अंधेरे भी छिपे मिलते हैं।
कहीं कोई तांत्रिक “देवी उतरने” का दावा करता है, तो कहीं किसी महिला को “डायन” कहकर समाज से अलग कर दिया जाता है।
सवाल यह है — 21वीं सदी में भी यह सब क्यों?
दरअसल, जब स्वास्थ्य सेवाएँ कमजोर हों, शिक्षा अधूरी हो और न्याय दूर लगे —
तब भय, बीमारी और दुर्भाग्य का कारण “जादू-टोना” में खोज लिया जाता है।
और यही वह क्षण होता है जब विश्वास, अंधविश्वास में बदल जाता है।
ग्रामीण समाज में महिलाएँ सबसे अधिक प्रभावित होती हैं।
जिनके पास जमीन नहीं, जिनकी आवाज़ कमजोर है — वे ही “डायन, जोगिन या कलंकित ” घोषित कर दी जाती हैं।
कई बार यह आरोप किसी की ज़मीन या प्रतिष्ठा हड़पने का हथियार बन जाता है।
उत्तराखंड सरकार ने हाल के वर्षों में फर्जी बाबाओं पर शिकंजा कसने की पहल की है,
लेकिन यह तभी पर्याप्त होगी जब शिक्षा और विज्ञान लोगों की आस्था के साथ-साथ चलें।
“देवभूमि” का अर्थ तभी पूरा होगा जब भक्ति के साथ विवेक भी जुड़ा हो।
अंधविश्वास कोई धर्म नहीं — यह भय की उपज है।
और भय को मिटाने का एक ही उपाय है — ज्ञान, संवेदना और सत्य का प्रकाश।
