🪙 कभी हर घर में सोना था, आज हर घर में कर्ज़ है — क्यों?✍️ संपादकीय लेखकभी भारत के गाँवों और शहरों के घरों में सोने की खनक थी।न ज़्यादा कमाने की होड़, न ज़्यादा दिखाने की चाह।हर घर में थोड़ी ज़मीन, कुछ मवेशी, कुछ अनाज और थोड़ा-बहुत सोना — यही असली संपत्ति थी।पर आज हर घर में EMI है, लोन है, कर्ज़ है।हर सुबह अख़बार के साथ “ब्याज दरों” की चिंता भी आती है।सवाल उठता है — आख़िर ऐसा हुआ क्यों?—🏠 पहले आत्मनिर्भरता थी, अब उपभोगवाद हैभारत का समाज आत्मनिर्भर था।हर परिवार खेती करता, अनाज बोता, तेल पेरता, कपड़ा बुनता था।आज हर चीज़ बाज़ार से आती है — दूध से लेकर घर तक।यह बदलाव सिर्फ़ आर्थिक नहीं, मानसिक भी है।हमने “ज़रूरत” को “इच्छा” और फिर “दिखावे” में बदल दिया।—💸 बचत की जगह कर्ज़ ने ले लीजहाँ पहले लोग गहनों और अनाज में बचत करते थे,अब हर चीज़ EMI पर खरीदी जाती है —मोबाइल से लेकर मकान तक।हर महीने की कमाई पहले से ही “भविष्य के ब्याज” में गिरवी रख दी जाती है।बचत की संस्कृति मिट गई, और कर्ज़ की संस्कृति आ गई।—🧠 संयुक्त परिवार बिखरे, आर्थिक सुरक्षा भी टूटीसंयुक्त परिवारों में खर्च और संकट दोनों साझा होते थे।अब हर व्यक्ति अकेला कमाता है, अकेला संघर्ष करता है।सुरक्षा का जो सामाजिक तंत्र था, वह टूट चुका है।नतीजा — व्यक्ति आर्थिक रूप से अस्थिर और मानसिक रूप से असंतुलित हो गया।—🏭 उत्पादन की जगह उपभोग ने लीपहले लोग “बनाते” थे, अब “खरीदते” हैं।हमारी मेहनत दूसरों के उत्पाद बेचने में लग रही है।विदेशी कंपनियाँ हमारे घरों की खिड़कियों से घुस आई हैं —और हमारी आत्मा धीरे-धीरे बाहर निकल रही है।—🌾 संतोष खो गया, दौड़ शुरू हो गईपहले समाज में ‘संतोष’ एक मूल्य था।आज ‘प्रतिस्पर्धा’ नया धर्म है।सोना, ज़मीन और मूल्य — सब एक-एक कर गिरवी रख दिए गए हैंदिखावे की चमक और आधुनिकता के नाम पर।—💡 निष्कर्ष:> जब जीवन सरल था, घरों में सोना था।जब जीवन जटिल हुआ, घरों में कर्ज़ आ गया।सवाल अब भी वही है —क्या हम फिर से संतुलन, आत्मनिर्भरता और संतोष की ओर लौट सकते हैं?-
