उत्तराखंड/कोटद्वार, 14 अगस्त।
“ये जरूरी नहीं कि अब जब दुनिया से जाएं तो अच्छे व्यक्ति की तौर पर जाएं, पर ये जरूरी है कि जब आप दुनिया छोड़ें तो एक अच्छे समाज से अलविदा कहें।” — यह विचार जर्मन नाटककार, कवि और नाट्य विचारक बर्टोल्ट ब्रेख्त की मानवीय दृष्टि और सामाजिक चेतना को बखूबी बयान करता है।
आज 14 अगस्त उनकी 69वीं पुण्यतिथि है। 10 फरवरी 1898 को जर्मनी में जन्मे ब्रेख्त का देहांत 14 अगस्त 1956 को हुआ। उन्होंने रंगमंच को मात्र मनोरंजन नहीं, बल्कि सवाल उठाने और बदलाव लाने का साधन बनाया। उनका एपिक थिएटर दर्शकों को भावनाओं में डुबोने के बजाय, एक सोचने-विचारने वाला मंच देता था—जहां दर्शक नाटक खत्म होते ही असल दुनिया में लौटकर बदलाव की कोशिश करें।
सत्ता, युद्ध और शोषण पर सीधी चोट
ब्रेख्त के नाटक — द गुड पर्सन ऑफ शेजवान, लाइफ ऑफ गैलीलियो, द थ्री पेन्नी ओपेरा, मदर करेज एंड हर चिल्ड्रेन, द कॉकेसियन चॉक सर्कल, एक्सेप्शन एंड द रूल — सत्ता, युद्ध, शोषण और नैतिक पतन जैसे मुद्दों को लेकर आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। उनकी रचनाएं हमें बताती हैं कि कला की सबसे बड़ी जिम्मेदारी यथार्थ को उजागर करना है, चाहे वह सत्ता के लिए असुविधाजनक ही क्यों न हो।
आज के भारत में ब्रेख्त की गूंज
भारत में जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सामाजिक असमानता और सत्ता के केंद्रीकरण जैसे मुद्दे बार-बार चर्चा में हैं, तब ब्रेख्त की सीख और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। उनके नाटक यह सवाल पूछते हैं — “क्या हम सिर्फ तमाशा देखने आए हैं या तमाशा बदलने भी तैयार हैं?”
कला का धर्म — मनुष्य को मनुष्य बनाए रखना
ब्रेख्त मानते थे कि कलाकार का काम केवल सुंदर दृश्य रचना नहीं, बल्कि मनुष्य को उसकी मनुष्यता से जोड़ना है। आज, जब कला और मीडिया का एक बड़ा हिस्सा व्यावसायिक दबाव में है, उनके विचार हमें याद दिलाते हैं कि सच्ची रचनात्मकता वह है जो अन्याय और असत्य के खिलाफ खड़ी हो।
आज उनकी पुण्यतिथि पर, भारत और दुनिया भर में रंगकर्मी, लेखक और विचारक उन्हें याद कर रहे हैं — न केवल एक महान नाटककार के रूप में, बल्कि एक ऐसे चेतनाशील कलाकार के रूप में, जिसने रंगमंच को समाज बदलने का हथियार बनाया।
