देहरादून/धराली।
उत्तराखंड—एक ऐसा राज्य, जिसकी पहचान बर्फ से ढकी चोटियां, हरे-भरे जंगल और नदियों की कल-कल से होती है। लेकिन इन खूबसूरत नजारों के पीछे, पिछले कुछ वर्षों में एक अलग ही तस्वीर उभर रही है—प्राकृतिक आपदाओं का लगातार बढ़ता कहर और राजनीतिक विपदा का गहराता साया।
धराली, गंगोत्री घाटी का एक छोटा-सा कस्बा, हाल ही में आई भारी बारिश और भूस्खलन से हिल गया। घर ढह गए, खेत बह गए, और सैकड़ों लोग बेघर हो गए। सड़कें टूटीं, पुल बह गए, बिजली-पानी ठप हो गया। यह सिर्फ धराली की कहानी नहीं—उत्तरकाशी, चमोली, पिथौरागढ़ और नैनीताल तक, लगभग हर जिले में प्रकृति का कहर किसी न किसी रूप में बरपा है।
आपदा के बीच चुनावी उत्सव या अवसरवाद?
ऐसे समय में जब प्रशासन और नेताओं का ध्यान राहत-बचाव पर होना चाहिए था, वहीं दूसरी तरफ त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव का शोर पूरे राज्य में गूंज रहा था।
गांव-गांव में विकास के मुद्दे पीछे छूट गए और धनबल-बाहुबल का प्रदर्शन खुलकर होने लगा।
ऑडी और लग्ज़री एसयूवी में घूमते प्रत्याशी
मतदाताओं को लुभाने के लिए शराब और पैसा
हथियारों की नुमाइश और धमकियां
और, चौंकाने वाली बात—दो-दो वोटर कार्ड रखने वाले लोग, जो अलग-अलग जगह वोट डालते और चुनाव भी लड़ते पाए गए।
नुकसान किसका, अवसर किसका?
नुकसान:
सबसे बड़ा नुकसान आम जनता का है।
धराली जैसे आपदा-ग्रस्त इलाकों में लोगों के पास राहत सामग्री, चिकित्सा सुविधा और पुनर्वास की योजना तक नहीं पहुंच पाई, लेकिन चुनावी रैलियों के लिए ईंधन, गाड़ियां और पैसा बेहिसाब बहाया गया। ग्रामीणों की मुश्किलें दोगुनी हो गईं—एक तरफ आपदा से जूझना, दूसरी तरफ चुनावी तनाव और हिंसा का सामना करना।
अवसर:
संकट की घड़ी में असली फायदा वही उठा रहे हैं जो ताकत, पैसा और नेटवर्क रखते हैं।
कुछ नेता और रसूखदार, राहत कार्य को अपने राजनीतिक प्रचार का माध्यम बना रहे हैं। मदद का बंटवारा निष्पक्षता से नहीं, बल्कि वोट के आधार पर हो रहा है। इस तरह आपदा राहत भी राजनीतिक सौदेबाजी का हिस्सा बन गई है।
उत्तराखंड की सामाजिक बुनियाद पर असर
उत्तराखंड की ताकत हमेशा इसकी सामुदायिक एकजुटता रही है। आपदा आने पर गांव के लोग एक-दूसरे के लिए खड़े हो जाते थे। लेकिन चुनावी राजनीति ने इस भरोसे में दरार डाल दी है।
अब गांव बंट रहे हैं—जाति, गुट, और राजनीतिक वफादारी के आधार पर।
पंचायत चुनाव में जीते हुए प्रतिनिधि कई बार अपने समर्थकों को प्राथमिकता देते हैं, जिससे सामूहिक हित की जगह व्यक्तिगत लाभ को बढ़ावा मिलता है।
हथियार और धनबल का असर बढ़ने से युवा पीढ़ी में राजनीतिक अवसरवाद का जहर फैल रहा है।
दोहरी मार का खतरा
प्राकृतिक आपदा का असर भौतिक है—घर, खेत, सड़क, पुल नष्ट हो जाते हैं।
लेकिन राजनीतिक विपदा का असर अदृश्य और दीर्घकालिक है—यह संस्थाओं में भरोसा, सामाजिक एकजुटता और लोकतांत्रिक मूल्य को नष्ट कर देता है।
जब यह दोनों एक साथ हों, तो यह राज्य की सामाजिक नींव को हिलाने के लिए काफी है।
कानूनी और नैतिक मोर्चा
उत्तराखंड पंचायती राज अधिनियम, 2016 स्पष्ट कहता है कि एक व्यक्ति एक से अधिक मतदाता सूची में दर्ज नहीं हो सकता और ऐसे लोग चुनाव लड़ने के योग्य नहीं हैं।
चुनाव आयोग की आचार संहिता के तहत, हथियारों की नुमाइश, मतदाताओं को लुभाने के लिए शराब-पैसा बांटना, और धमकाना गंभीर आपराधिक अपराध है।
लेकिन धरातल पर कानून की पकड़ ढीली और राजनीतिक संरक्षण मजबूत दिख रहा है।
अब आगे क्या?
अगर यह पैटर्न जारी रहा तो उत्तराखंड सिर्फ एक आपदा-प्रवण राज्य नहीं रहेगा, बल्कि लोकतांत्रिक-संवेदनशील आपदा क्षेत्र बन जाएगा, जहां प्राकृतिक और राजनीतिक दोनों तरह की आपदाएं मिलकर लोगों का भविष्य तय करेंगी।
इसके लिए ज़रूरी है:
- आपदा प्रबंधन और पंचायत चुनाव की तारीखों में समन्वय, ताकि राहत कार्य और चुनावी गतिविधियां टकराएं नहीं।
- दोहरा वोटर कार्ड, धनबल और बाहुबल पर सख़्त कार्रवाई, चाहे दोषी कितना भी रसूखदार क्यों न हो।
- ग्रामीण नेतृत्व का पुनर्निर्माण—ऐसे नेताओं को बढ़ावा देना जो संकट में साथ खड़े हों, न कि अवसरवाद में डूब जाएं।
