लेखक: दिनेश पाल सिंह गुसाईं
उत्तराखंड की स्थापना के समय हर पहाड़ी नागरिक के मन में एक सपना था — कि अब हमारी भी सुनी जाएगी। दिल्ली-लखनऊ के कोनों में दबी हमारी आवाजें देहरादून की सत्ता से टकराकर लौटेंगी नहीं, बल्कि समाधान बनेंगी। लेकिन आज, जब हम आज़ादी के 78 साल और राज्य गठन के 25 साल बाद पीछे मुड़कर देखते हैं, तो हमें हमारे सपनों का मखौल उड़ता दिखता है।
सड़क नहीं, तो सब कुछ अधूरा
कोटद्वार तहसील से मात्र 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित मुंडला, कटल , काटल, स्यालिंगा, भुनार,मटियाल जैसे गांव आज भी सड़क जैसी बुनियादी सुविधा से वंचित हैं। गाँवों के बीच दूरियां कम हैं, लेकिन उन पर चलने वाली उम्मीदें लंबी और थकी हुई हैं।
गाँव के लोगों को आज भी खेती के उत्पाद बाज़ार तक पहुँचाने के लिए खच्चरों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिसके लिए प्रति ट्रिप 400 रुपये लगते हैं। कई बार उपज की कीमत से ज्यादा, उसे ढोने का खर्च हो जाता है। इसका मतलब है कि मेहनत के बावजूद किसानों के हाथ खाली ही रहते हैं।
सिर्फ टाइगर के पंजे और सरकार की चुप्पी
यहाँ की सड़क योजना के लिए ₹1.39 करोड़ स्वीकृत हो चुके हैं, लेकिन वन्यजीव विभाग (Wildlife Department) ने अब तक NOC नहीं दी। वजह? जंगल में बाघ के पंजों के निशान मिले थे।
अब सवाल यह है कि क्या इंसानों की ज़रूरतें सिर्फ इसलिए अनदेखी कर दी जाएंगी क्योंकि वहाँ कभी एक बाघ गुज़रा था?
वनों की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन क्या मनुष्यों के जीवन की अनदेखी कर दी जाए? क्या एक बाघ का निशान ७ गाँवों की पीढ़ियों के भविष्य से बड़ा है?
न विकास, न विवाह
इस क्षेत्र में सड़क न होने की वजह से किसी भी परिवार के युवकों की शादी नहीं हो पा रही। वधु पक्ष साफ मना कर देता है: “ऐसे गाँव में रिश्ता नहीं करेंगे जहाँ सड़क तक नहीं जाती।”
वहीं दूसरी ओर, युवक की उम्र बढ़ती जा रही है, लेकिन विवाह की कोई उम्मीद नहीं। इससे सामाजिक संतुलन भी प्रभावित हो रहा है।
शिक्षा और स्वास्थ्य से वंचित पीढ़ीयाँ
इन गांवों के बच्चों को उच्च शिक्षा की ओर जाने का रास्ता उसी दिन बंद हो जाता है, जिस दिन गाँव से बाहर स्कूल या कॉलेज तक पैदल चलने की मजबूरी समझ में आती है।
दूसरी ओर, बीमार पड़ने पर अस्पताल तक पहुँचाने के लिए भी खच्चर या खाट ही विकल्प है।
जब आवाजें भी थक जाती हैं
2014 में गाँव वालों ने जलसे, धरने, प्रदर्शन किए — महीनों तक कोटद्वार तहसील में बैठे रहे, लेकिन सत्ता के कान पर जूं तक नहीं रेंगी।
जनप्रतिनिधि चुनाव के समय वादों के साथ आते हैं, और नतीजों के बाद सड़कें भूल जाते हैं।
मानवाधिकार आयोग को ज्ञापन दिए गए, सामाजिक संगठनों ने रिपोर्ट बनाई, लेकिन इन ग्रामीणों का जीवन आज भी “आदिवासी वाला” जैसा है — स्वतंत्र भारत में असंविधानिक उपेक्षा की जीती-जागती तस्वीर।
निष्कर्ष: सवाल सिर्फ सड़क का नहीं है, सवाल सम्मान का है
सड़क सिर्फ कंक्रीट नहीं होती। यह शिक्षा की ओर जाता रास्ता है, इलाज की ओर जाता रास्ता है, बाजार तक पहुँचने वाला जरिया है, बेटियों की डोली उठाने वाला जरिया है।
जिस दिन सरकारें ये समझेंगी कि सड़क का मतलब सिर्फ विकास नहीं, बल्कि मानवाधिकार है, उस दिन उत्तराखंड के हजारों छूटे हुए गाँव जुड़ सकेंगे।
आज ज़रूरत है कि हम आवाज़ उठाएँ — सिर्फ मुंडला नहीं, बल्कि उत्तराखंड के हर उस गाँव के लिए जहाँ आज भी ‘छोटा राज्य’ बस एक प्रतीक है, जीवन नहीं।
