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हिंदी के कथाकार हिमांशु जोशी अब हमारे बीच नहीं रहे. उनके निधन के साथ ही पहाड़ के लेखकों की बेहद स्थापित पीढ़ी में से एक और नाम कम हो गया.Image result for pics of uttarakhand writer himanshu joshi

हिंदी के मशहूर कथाकार हिमांशु जोशी का निधन हो गया. उनके निधन के साथ ही पहाड़ के लेखकों की बेहद स्थापित पीढ़ी में से एक और नाम कम हो गया. हिमांशु, मानव संवेदनाओं के लेखक थे. उनके उपन्यास और कहानियां, कहानी होते हुए भी सच लगती हैं.  त्याग, तपश्चर्या, विस्थापन, परिवार, करुणा, संघर्ष, शोषण, स्नेह, वासना, तिरस्कार के कई रंगों से रंगी उनकी रचनाएं केवल कल्पना पटल पर नहीं यथार्थ का चित्रण भी थीं.

वह साल 1956 था, हममें से बहुतेरों का जन्म तक नहीं हुआ था, जब हिंदी पत्रकारिता में उत्तराखंड के  अल्मोड़ा जिले के स्यूड़ा गांव में  4 मई, 1935 को जन्मे 21 साल के हिमांशु जोशी ने हिंदी पत्रकारिता जगत में कदम रखा था. आज के खांटी पत्रकारों से अलग इस युवा पर लेखक बनने का भूत सवार था. आलम यह था कि गांधी जी की हत्या पर महज 13- 14 साल की उम्र में इन्होंने अपनी पहली कविता लिखी और फिर सालों साल तक यह क्रम चलता ही रहा.

एक से बढ़कर एक दिग्गज लेखक, संपादक, कवि, पत्रकारों वाले उस दौर में इस लड़के ने अपनी राह चुनी. हर विषय पर लिखा. खूब लिखा. उपन्यास, कहानी संग्रह, कविता संग्रह, यात्रा-वृत्तांत, नाटक, बाल साहित्य, साक्षात्कार, जीवनी, रेडियो नाटक, संस्मरण सब लिखे और वह भी पत्रकारिता करते हुए.

प्रेम, प्रकृति, अंचल और संवेदना की डगर पकड़ इस युवा ने वह इतिहास रचा जिसे किताबों की गिनती से आंका नहीं जा सकता.  कहना गलत नहीं कि हिमांशु जोशी हिंदी के लब्ध-प्रतिष्ठित कथाकार थे.

देश की कई नामी गिरामी पत्र-पत्रिकाओं के अलावा जोशी ने दूरदर्शन व आकाशवाणी के लिए भी काम किया. हिंदी फिल्मों के लिए भी लिखा. उनकी लिखी रचनाओं में 17 कहानी-संग्रह, 8 उपन्यास, 2 यात्रा-वृतांत, 3 काव्य-संग्रह, संस्मरण आदि कुल मिलाकर उनकी करीब 32 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं.

इनमें उपन्यास- अरण्य (1965), महासागर (1971), छाया मत छूना मन (1974), कगार की आग (1975), समय साक्षी है (1976), तुम्हारे लिए (1978), सु-राज (1980); कहानी संग्रह- अन्तत: तथा अन्य कहानियां (1965), अथचक्र (1975), मनुष्य-चिह्न तथा अन्य कहानियां (1976), जलते हुए डैने तथा अन्य कहानियां (1980), तपस्या तथा अन्य कहानियां (1992), आंचलिक कहानियां (1993) गंधर्व-गाथा (1994), श्रेष्ठ प्रेम कहानियां (1995), चर्चित कहानियां (2000), दस कहानियां (2001), नंगे पांवों के निशान (2002), हिमांशु जोशी की चुनी हुई कहानियां (2004), प्रतिनिधि लोकप्रिय कहानियां (2004), इस बार फिर बर्फ़ गिरी तो (2005), सागर तट के शहर (2005), इकहत्तर कहानियां (2006), अगला यथार्थ (2006), चुनी हुई कहानियां (2009), पाषाण-गाथा (2010) प्रमुख हैं.

प्रकाशित कविता संग्रह- नील नदी का वृक्ष (2008), एक आंख की कविता और अग्नि-सम्भव; वैचारिक संस्मरण हैं- संकलन-उत्तर-पर्व (1995), आठवां सर्ग (1997); साक्षात्कार की किताब मेरा साक्षात्कार नाम से 2003 में छपी, तो यात्रा वृत्तांत- यात्राएं (1997), नार्वे: सूरज चमके आधी रात (1989) में छपा.

जोशी द्वारा लिखी जीवनी तथा खोज परक किताब ‘अमर शहीद अशफाक उल्ला खां (1999) तथा ‘यातना-शिविर में (अंडमान की अनकही कहानी) साल 2001 में छपी. रेडियो नाटक सु-राज तथा अन्य एकांकी (2001), कागज की आग तथा अन्य एकांकी (2003), समय की शिला पर (2004); बाल साहित्य- अग्नि संतान (उपन्यास, 1975), विश्व की श्रेष्ठ लोककथाएं (14 भाषाओं में, 1979), तीन तारे (बाल उपन्यास, 1985), बचपन की याद रही कहानियां (1985), भारतरत्न: पं. गोविन्द बल्लभ पंत (जीवनी, 1989), काला पानी (14 भाषाओं में, 1990), हिम का हाथी (कहानी संग्रह, 1995), अमर कैदी (2002), सुबह के सूरज (2007) उल्लेखनीय हैं.

जोशी की ‘छाया मत छूना मन’, ‘मनुष्य चिह्न’, ‘श्रेष्ठ आंचलिक कहानियां’ तथा ‘गंधर्व-गाथा’ को उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, के पुरस्कार; ‘हिमांशु जोशी की कहानियां’ तथा ‘भारत रत्न: पं. गोबिन्दबल्लभ पंत’ को हिन्दी अकादमी, दिल्ली का सम्मान; ‘तीन तारे’ को राजभाषा विभाग, बिहार द्वारा पुरस्कृत किया जा चुका है. इसके अलावा वह पत्रकारिता के लिए केन्द्रीय हिन्दी संस्थान द्वारा ‘स्व. गणेश शंकर विद्यार्थी’ पुरस्कार से सम्मानित किए गए थे.

एक अनुमान के मुताबिक लगभग 35 शोधार्थियों ने हिमांशु जोशी के साहित्य पर शोध कर डाक्ट्रेट की उपाधि प्राप्त की. अनेक उपन्यासों, कहानियों के अनुवाद अधिकतर भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी, नेपाली, बर्मी, चीनी, जापानी, इटैलियन, बल्गेरियाई, कोरियाई, नार्वेजियन, स्लाव, चैक आदि भाषाओं में भी हुए.

इसके अलावा उपन्यास ‘सु-राज’ पर फिल्म बनी, तो ‘तुम्हारे लिए’ को आधार बना कर दूरदर्शन ने धारावाहिक बनाया. ‘तर्पण’, ‘सूरज की ओर’ आदि पर टीवी फिल्में बनीं. जोशी ने शरत चन्द्र के उपन्यास ‘चरित्रहीन’ पर आधारित रेडियो धारावाहिक का निर्देशन किया और अनेक सरकारी, अर्द्धसरकारी समितियों में हिन्दी सलाहकार रहे. वह नार्वे से प्रकाशित पत्रिका ‘शांतिदूत’ के विशेष सलाहकार व हिन्दी अकादमी, दिल्ली की पत्रिका ‘इन्द्रप्रस्थ भारती’ के सम्पादन मंडल के सदस्य भी थे. कलम के इस चितेरे ने भरपूर जीवन जीया.


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By udaen

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