कोटद्वार के औद्योगिक क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं से लेकर निवेश और स्वरोजगार तक चुनौतियां बरकरार
औद्योगिक विकास की चर्चा उत्तराखंड में नई नहीं है। निवेश सम्मेलन, रोजगार मेले, स्वरोजगार योजनाएं और उद्यमियों की समस्याओं के समाधान के लिए बैठकें लगातार होती हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि इन प्रयासों का लाभ धरातल पर कितना पहुंच रहा है? कोटद्वार के औद्योगिक आस्थान सिताबपुर और सिडकुल ग्रोथ सेंटर सिगड्डी को लेकर हुई जिला उद्योग मित्र समिति की बैठक ने एक बार फिर औद्योगिक विकास की संभावनाओं के साथ-साथ बुनियादी सुविधाओं की चुनौतियों को भी सामने रखा है।
मुख्य विकास अधिकारी अशोक जोशी की अध्यक्षता में हुई बैठक में खाली भूखंडों के आवंटन, नई औद्योगिक इकाइयों की स्थापना, निवेश प्रस्तावों, लंबित अनुमतियों, निर्यात और स्वरोजगार योजनाओं की समीक्षा की गई। मशरूम उत्पादन, फर्नीचर निर्माण, स्टील अलमारी निर्माण और ऑटोमोबाइल वर्कशॉप जैसे प्रस्ताव बताते हैं कि स्थानीय स्तर पर उद्यमिता की संभावनाएं मौजूद हैं। लेकिन इन संभावनाओं को वास्तविक रोजगार में बदलने के लिए केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं है।
जब औद्योगिक क्षेत्र में जल निकासी और शौचालय जैसी सुविधाएं ही प्राथमिकता बनें, तो विकास के दावों की समीक्षा जरूरी है। सिताबपुर में नालियों की मरम्मत, जल निकासी व्यवस्था और शौचालय निर्माण की आवश्यकता इस बात का संकेत है कि औद्योगिक आधारभूत सुविधाओं पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। सिगड्डी में सड़क मरम्मत, प्रवेश द्वार और नाम-पट्टिका सुधार जैसे कार्य भी औद्योगिक विकास की बुनियादी जरूरतों की याद दिलाते हैं।
औद्योगिक क्षेत्र केवल जमीन और भवनों का समूह नहीं होता। वहां सड़क, बिजली, पानी, स्वच्छता, जल निकासी, कचरा प्रबंधन और सुरक्षित आवागमन जैसी सुविधाएं उद्योगों की उत्पादकता और निवेश के भरोसे से सीधे जुड़ी होती हैं। यदि उद्यमियों को इन बुनियादी जरूरतों के लिए बार-बार विभागों के चक्कर लगाने पड़ें, तो निवेश आकर्षित करने के प्रयास कमजोर पड़ सकते हैं।
दूसरी महत्वपूर्ण चुनौती निवेश प्रस्तावों और विभागीय अनुमतियों के निस्तारण की है। एकल खिड़की व्यवस्था का उद्देश्य उद्यमियों को अलग-अलग कार्यालयों के चक्कर से बचाना और स्वीकृतियों की प्रक्रिया को सरल बनाना है। लेकिन यदि प्रस्ताव लंबे समय तक लंबित रहें, तो यह व्यवस्था अपने मूल उद्देश्य से दूर हो जाती है। जरूरी है कि प्रत्येक लंबित प्रकरण के लिए जिम्मेदार विभाग, समयसीमा और निस्तारण की स्थिति तय हो। निवेशकों को केवल आश्वासन नहीं, बल्कि स्पष्ट प्रक्रिया और समयबद्ध निर्णय मिलने चाहिए।
कोटद्वार और आसपास के पर्वतीय क्षेत्रों के संदर्भ में औद्योगिक विकास का महत्व और भी बढ़ जाता है। रोजगार के सीमित अवसरों के कारण बड़ी संख्या में युवा मैदानी शहरों की ओर रुख करते हैं। यदि स्थानीय स्तर पर खाद्य प्रसंस्करण, मशरूम उत्पादन, कृषि आधारित उद्योग, फर्नीचर निर्माण, पर्यटन, डेयरी और वन आधारित वैध उत्पादों से जुड़े उद्यम विकसित किए जाएं, तो स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है। इससे किसानों, स्वयं सहायता समूहों, कारीगरों और युवाओं को अपनी आजीविका के नए विकल्प मिलेंगे।
निर्यात को बढ़ावा देने के लिए बायर-सेलर मीट, निर्यात सहायता केंद्र और उत्पाद सूची तैयार करने की पहल उपयोगी हो सकती है। लेकिन स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने के लिए गुणवत्ता, पैकेजिंग, प्रमाणन, परिवहन, भंडारण और विपणन की व्यवस्था भी मजबूत करनी होगी। स्वयं सहायता समूहों और किसान उत्पादक संगठनों को केवल बैठकों में शामिल करना पर्याप्त नहीं होगा; उन्हें बाजार से जोड़ना और नियमित आय सुनिश्चित करना भी जरूरी है।
मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना, होमस्टे, खाद्य प्रसंस्करण, कृषि-पशुपालन और सौर ऊर्जा आधारित योजनाओं की सफलता का आकलन भी केवल स्वीकृत आवेदनों या वितरित ऋण के आधार पर नहीं होना चाहिए। यह देखना अधिक महत्वपूर्ण है कि कितने उद्यम वास्तव में शुरू हुए, कितने लंबे समय तक संचालित रहे, कितने लोगों को स्थायी रोजगार मिला और कितने लाभार्थी कर्ज चुकाने के साथ अपनी आय बढ़ा पाए। बैंक ऋण संबंधी अड़चनों का समयबद्ध समाधान इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।
सरकार को यह भी समझना होगा कि स्वरोजगार का अर्थ केवल किसी व्यक्ति को ऋण उपलब्ध करा देना नहीं है। उद्यमी को प्रशिक्षण, तकनीकी सहयोग, बाजार, कच्चा माल, कार्यशील पूंजी और विभागीय मार्गदर्शन की भी आवश्यकता होती है। इन सभी पहलुओं को एक साथ मजबूत किए बिना स्वरोजगार योजनाएं स्थायी आर्थिक बदलाव नहीं ला सकतीं।
जिला उद्योग मित्र समिति की बैठक में अधिकारियों ने बुनियादी सुविधाओं से जुड़े कार्यों को प्राथमिकता देने और लंबित मामलों के शीघ्र निस्तारण के निर्देश दिए हैं। अब इन निर्देशों की वास्तविक परीक्षा उनके क्रियान्वयन में होगी। अगली बैठक में यह स्पष्ट होना चाहिए कि कितने कार्य पूरे हुए, कितने निवेश प्रस्तावों को मंजूरी मिली, कितने उद्यम शुरू हुए और कितने युवाओं को वास्तविक रोजगार मिला।
कोटद्वार के औद्योगिक विकास को केवल सरकारी बैठकों और निवेश प्रस्तावों की संख्या से नहीं मापा जा सकता। उसकी असली कसौटी है—चलते हुए उद्योग, बढ़ती स्थानीय आय, रोजगार पाते युवा और पलायन की मजबूरी से मुक्त होते परिवार।
उत्तराखंड को घोषणाओं से आगे बढ़कर परिणामों पर आधारित औद्योगिक नीति की जरूरत है। उद्योग मित्र समिति तभी सार्थक होगी, जब वह उद्योगों की समस्याओं की सूची तैयार करने के बजाय उनके समाधान की निगरानी करे। बैठक का उद्देश्य बैठक करना नहीं, रोजगार पैदा करना होना चाहिए।
