उत्तराखंड में जँहा पलायन के संक्रमण से गुजर रहा है, और खेती बागवानी जँहा संकट में है, वहीं कुछ लोग संक्रमण को अपने प्रयासों से रोकने में कामयाब भी हुए हैं। 
अनूप पटवाल मूल रूप से थैलीसैण के ग्राम पनाउ के निवास है। अपना कुछ समय उन्होंने दिल्ली शहर में दिया, लेकिन हमेशा दिल और दिमाग से वो गांव में थे, इसी जनून ने उनको फिर गाँव की और आने के लिए प्रेरित किया।
अनूप पटवाल जब गाँव लौटे तो उन्होंने कुणजोली ब्लॉक बीरोंखाल में बागवानी करनी की सोची। पटवाल जी ने बताया कि जब मैंने यह निर्णय लिया कि इस जगह पर मुझे बागवानी करनी है, तब मैंने केवल रिस्क लिया, अगर सफल हुआ तो ठीक नही तो फिर कुछ और काम करूंगा। जिस स्थान पर उन्होंने बागवानी शुरू करी वँहा पर एक वीरान मकान था, जिसके अंदर भालू अपने बच्चों को जन्म देता था। लेकिन मैंने ठान लिया कि अब तो आगे बढ़ना ही है। बहुत से लोगो ने हतोसहित भी किया तो प्रोत्साहित भी किया। लोगो ने वही उदाहरण दिया कि बंदर लंगूर और अन्य जंगली जानवर इनको नुकसान पहुंचाएगें। तब मैंने उन लोगो को जबाब दिया कि अगर हमें कुछ नया करना है तो नया भी सोचना पड़ेगा, उनकी रक्षा के लिए मैंने खेत मे ही चारपायी डाल दी और उनको बचाया। किसी मल्टी नेशनल कम्पनी में जब हम रात भर किसी दूसरे के लिये जाग सकते है, तो क्या अपने लिए नही जाग सकते।
