प्रशांत महासागर में हो रहे बदलावों ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान El Niño की ओर खींचा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के Oceansat-3 उपग्रह से मिले आंकड़ों में भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्री जैविक उत्पादकता और सतही हवाओं में ऐसे बदलाव दिखाई दिए हैं, जो विकसित हो रहे El Niño की ओर संकेत करते हैं।

यह महज समुद्र की सतह पर होने वाला बदलाव नहीं है। इसका असर हजारों किलोमीटर दूर भारत के मानसून और हमारी अर्थव्यवस्था तक पहुंच सकता है।

लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें डरने से ज्यादा तैयार होने की जरूरत है।

El Niño कोई ऐसा स्विच नहीं है जिसे दबाते ही भारत में सूखा पड़ जाए। भारत के मानसून पर समुद्र और वायुमंडल की कई प्रणालियां एक साथ प्रभाव डालती हैं। इसलिए किसी एक संकेत के आधार पर भविष्य की भयावह तस्वीर खींचना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं होगा। फिर भी इतिहास बताता है कि मजबूत El Niño की स्थिति में भारतीय मानसून के सामने जोखिम बढ़ सकता है।
और यही वह बिंदु है जहां ISRO की चेतावनी हमारे लिए महत्वपूर्ण बन जाती है।

मौसम की खबर नहीं, अर्थव्यवस्था की खबर
भारत में मानसून केवल बारिश का नाम नहीं है। यह खेती, पेयजल, जलविद्युत, ग्रामीण रोजगार, खाद्य महंगाई और करोड़ों लोगों की आजीविका से जुड़ा हुआ है।
यदि मानसून कमजोर या असमान रहता है तो इसका असर खेत से लेकर बाजार तक दिखाई दे सकता है। सिंचाई पर निर्भरता बढ़ेगी, जलाशयों पर दबाव बढ़ेगा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है और कुछ खाद्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि का जोखिम पैदा हो सकता है।
इसलिए El Niño को केवल मौसम विभाग की समस्या मानना बड़ी भूल होगी। यह कृषि मंत्रालय, जल संसाधन मंत्रालय, ऊर्जा क्षेत्र, राज्य सरकारों और स्थानीय प्रशासन के लिए भी चेतावनी है।
उत्तराखंड के लिए संदेश और भी गंभीर
हिमालयी राज्यों के लिए जलवायु परिवर्तन का अर्थ केवल कम बारिश या ज्यादा गर्मी नहीं है। यहां मौसम में बदलाव का असर ग्लेशियरों, बर्फबारी, जलस्रोतों, जंगलों, खेती और आपदा जोखिम पर एक साथ पड़ सकता है।
उत्तराखंड जैसे राज्य में एक तरफ अत्यधिक वर्षा और अचानक बाढ़ की घटनाएं चिंता पैदा करती हैं, तो दूसरी तरफ पारंपरिक जलस्रोतों का सूखना और अनियमित वर्षा ग्रामीण जीवन को प्रभावित कर रही है।
इसलिए हमें एक ऐसी जल नीति चाहिए जो केवल आपदा आने के बाद राहत बांटने तक सीमित न हो।
अब सवाल—सरकार क्या करे?
यदि El Niño मजबूत होने के संकेत मिल रहे हैं तो केंद्र और राज्य सरकारों को अभी से कुछ कदम उठाने चाहिए।
पहला—जल संरक्षण को आपदा प्रबंधन का हिस्सा बनाया जाए।
दूसरा—कम पानी वाली और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल फसलों को प्रोत्साहन दिया जाए।
तीसरा—गांवों के पारंपरिक नौले, धारे, तालाब और जलस्रोत पुनर्जीवित किए जाएं।
चौथा—किसानों को मौसम आधारित सलाह और समय पर चेतावनी उपलब्ध कराई जाए।
पांचवां—शहरी क्षेत्रों में भूजल दोहन और वर्षाजल की बर्बादी पर प्रभावी नियंत्रण हो।
और सबसे महत्वपूर्ण—जलवायु पूर्वानुमान को गांव तक पहुंचाया जाए।
सैटेलाइट अंतरिक्ष से खतरे के संकेत पकड़ सकता है, लेकिन उस सूचना का वास्तविक लाभ तभी होगा जब वह खेत, गांव और घर तक पहुंचे।
डर नहीं, डेटा चाहिए
आज सोशल मीडिया पर “Super El Niño”, “भारत में भयंकर सूखा” और “महासंकट आने वाला है” जैसे शीर्षक तेजी से फैल सकते हैं। लेकिन वैज्ञानिक पत्रकारिता का काम भय पैदा करना नहीं, बल्कि खतरे को समझाना है।
ISRO के आंकड़े हमारे लिए एक early warning signal हैं—अंतिम भविष्यवाणी नहीं।
भारत के पास दुनिया की अग्रणी अंतरिक्ष और मौसम विज्ञान क्षमताएं हैं। चुनौती अब यह है कि इन क्षमताओं को नीति और स्थानीय तैयारी से जोड़ा जाए।
क्योंकि जलवायु संकट का सबसे बड़ा नुकसान अक्सर उस देश को नहीं होता जिसके पास चेतावनी नहीं थी, बल्कि उस देश को होता है जिसने चेतावनी मिलने के बाद भी तैयारी नहीं की।
ISRO ने अंतरिक्ष से संकेत दे दिया है। अब सवाल यह है कि जमीन पर भारत कितनी जल्दी तैयारी करता है।
