सुरक्षित रखते हैं। सुरक्षा प्रणालियां उपकरणों, नेटवर्क और डेटा को फिजिकल व डिजिटल खतरों से सुरक्षित रखती हैं।
राउटर और हाई-स्पीड स्विच सहित नेटवर्किंग उपकरण, सेंटर के भीतर और बाहर डेटा के आदान-प्रदान को संभव बनाते हैं। फाइबर-ऑप्टिक कनेक्शन डेटा सेंटर और बाहरी नेटवर्क के बीच हाई-स्पीड कम्युनिकेशन की सुविधा प्रदान करते हैं।
आखिर में, मैनेजमेंट सॉफ्टवेयर प्रणालियों की मॉनिटरिंग करता है और कंप्यूटिंग रिसोर्स के इस्तेमाल को बेहतर बनाने में मदद करता है। वर्चुअलाइज़ेशन एक ही फ़िजिकल सर्वर पर कई वर्चुअल मशीनों को चलाने की सुविधा प्रदान करता हैं, जिससे रिसोर्स का इस्तेमाल बेहतर होता है। कल्पना कीजिए कि एक बड़े घर को कई अलग-अलग अपार्टमेंट में बांट दिया जाए। वर्चुअलाइज़ेशन एक फ़िजिकल कंप्यूटर को उसके भीतर कई वर्चुअल “मिनी-कंप्यूटर” चलाने की सुविधा देता है, जिससे रिसोर्स का बेहतरीन उपयोग होता है। ऑटोमेशन टूल वर्कलोड को मैनेज करते हैं, रख-रखाव में मदद करते हैं और परिचालन से जुड़ी समस्याओं की पहचान करने में सहायता करते हैं।
क्लिक से रिस्पॉन्स तक: डेटा सेंटर आपकी रिक्वेस्ट को कैसे पूरा करता है

हर डिजिटल रिक्वेस्ट एक सिंपल एक्शन (क्लिक करने या कमांड देने पर कंप्यूटर द्वारा प्रोसेस करने की प्रक्रिया) से शुरू होती है, जैसे कोई ऐप खोलना, बैंक बैलेंस देखना या कोई डॉक्यूमेंट देखना। तुरंत मिलने वाले जवाब के पीछे, रिक्वेस्ट एक नेटवर्क के माध्यम से डेटा सेंटर तक पहुंचती है, जहां कई प्रणालियां मिलकर इसे सुरक्षित और कुशलतापूर्वक संसाधित करती हैं।
सिक्योरिटी लेयर सबसे पहले रिक्वेस्ट की जांच करती है और सिस्टम को साइबर खतरों से बचाती है। इसके बाद, लोड बैलेंसर रिक्वेस्ट को उपलब्ध सर्वर पर भेजता है, जिससे वर्कलोड को कुशलतापूर्वक बांटने में मदद मिलती है।
एप्लिकेशन सर्वर रिक्वेस्ट को संसाधित (प्रोसेस) करता है और निर्धारित करता है कि किस जानकारी या सर्विस की ज़रूरत है। यदि आवश्यक हो, तो यह अन्य एप्लिकेशन या सर्विस के साथ कम्युनिकेट करने के लिए एप्लिकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस (एपीआई) का उपयोग करता है।
इसके बाद डेटाबेस सर्वर आवश्यक जानकारी निकालता है और उसे वापस एप्लिकेशन सर्वर पर भेजता है। एक बार संसाधित होने के बाद, जानकारी नेटवर्क से वापस होकर उपयोगकर्ता (यूज़र) के डिवाइस तक पहुंचती है।
इस पूरी प्रक्रिया में केवल 1-2 सेकंड लग सकते हैं, जिससे तेज और निर्बाध डिजिटल सेवाएं मिल पाती हैं। यह इंटरकनेक्टेड चेन— कनेक्ट → रिसीव → नेटवर्क → प्रोसेस → स्टोर → सिक्योर → रिस्पॉन्ड— क्लाउड सेवाओं, ई-गवर्नेंस प्लेटफॉर्म और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) एप्लिकेशन को विश्वसनीय रूप से और बड़े पैमाने पर जानकारी प्रदान करने की सुविधा देती है। यह दर्शाता है कि आधुनिक डेटा सेंटर केवल संगृहीत सुविधाएं ही नहीं हैं, बल्कि वे डिजिटल बुनियादी ढांचा हैं जो रोजमर्रा की ऑनलाइन सेवाओं को संभव बनाते हैं।
| सरल शब्दों में: पर्दे के पीछे काम करने वाली टीमनेटवर्क = कॉरिडोर और इंटरकॉम, आंतरिक मार्ग जो पूरी टीम को आपस में जोड़ते हैं, ताकि वे तुरंत एक-दूसरे तक जानकारी पहुंचा सकें। लेयर = गार्ड, सुरक्षा के लिए एंट्री पर आपकी रिक्वेस्ट की जांच करता है। बैलेंसर = ट्रैफ़िक पुलिस की तरह, यह आने वाले डिजिटल ट्रैफ़िक को संभालता है ताकि किसी एक सर्वर पर ज़्यादा बोझ न पड़े।एप्लिकेशन सर्वर = शेफ की तरह, आपका ऑर्डर लेता है और यह तय करता है कि कौन सी जानकारी या रेसिपी आवश्यक है।एपीआई = वेटर, संदेशवाहक (मैसेंजर) के रूप में कार्य करता है।डेटाबेस सर्वर = एक डिजिटल वॉलेट, जहां जानकारी सुरक्षित रखी जाती है और आवश्यकता पड़ने पर पुनर्प्राप्त की जाती है। |
भारत में डेटा सेंटर


भारत में डेटा-सेंटर का विकास ई-गवर्नेंस और डिजिटल सेवाओं के तेजी से विस्तार के साथ-साथ हुआ है। ऑनलाइन सेवाओं के लिए नागरिकों की बढ़ती अपेक्षाओं के कारण मजबूत डेटा-सेंटर से जुड़े बुनियादी ढांचे की मांग बढ़ रही है। राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (एनआईसी) ने देश भर में अत्याधुनिक राष्ट्रीय डेटा-सेंटर स्थापित किए हैं। इनमें दिल्ली, पुणे, हैदराबाद और भुवनेश्वर में एनआईसी मुख्यालय की फैसिलिटीज शामिल हैं। एनआईसी ने विभिन्न राज्यों की राजधानियों में 37 छोटे डेटा सेंटर भी स्थापित किए हैं। ये सेंटर विभिन्न स्तरों पर सरकारी संस्थानों को विश्वसनीय डिजिटल सेवाएं प्रदान करते हैं। ये चौबीसों घंटे संचालन, सिस्टम मैनेजमेंट और कुशल ऑन-साइट कर्मचारियों को सहयोग प्रदान करते हैं।
भारत की तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था सुरक्षित और विश्वसनीय डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर की मांग को और अधिक सुदृढ़ कर रही है। वर्ष 2020 में डेटा सेंटर की स्थापित विद्युत क्षमता लगभग 375 मेगावाट थी। अगस्त 2026 तक यह बढ़कर 1.57 गीगावाट हो गई है। वर्ष 2030 तक क्षमता के लगभग 8 गीगावाट तक बढ़ने का अनुमान है। भारत के डेटा सेंटर क्षेत्र में पहले से ही लगभग 70 अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश हो रहा है और इसके अलावा 90 अरब अमेरिकी डॉलर के प्रोजेक्ट्स की घोषणा की गई है, जो विस्तार के बड़े पैमाने और निवेशकों के दृढ़ विश्वास को दिखाता है।
डेटा सेंटरों के लिए अनुकूल नीतिगत माहौल बनाना
सरकार ने लक्षित नीतियों और आर्थिक कदमों के माध्यम से डेटा सेंटर इकोसिस्टम को मजबूत बनाया है। केंद्रीय बजट 2022-23 में, डेटा सेंटरों को बुनियादी ढांचे की सामंजस्यपूर्ण सूची में शामिल किया गया। इससे डेटा सेंटरों को बुनियादी ढांचे का दर्जा मिला और डिजिटल बुनियादी ढांचे के लिए ऋण मिलना आसान हो गया। इस कदम ने भारत की डेटा सेंटर क्षमता के निवेश और विस्तार को भी समर्थन दिया।
| सरल शब्दों में बुनियादी ढांचे का दर्जाडेटा सेंटरों को ‘बुनियादी ढांचे का दर्जा’ मिलने से उन्हें राष्ट्रीय राजमार्गों, हवाई अड्डों और बिजली ग्रिडों की तरह माना जाता है, जिससे उन्हें आसान और किफायती दीर्घकालिक ऋण मिल पाते हैं। |
केंद्रीय बजट 2026–27 में पात्र विदेशी क्लाउड सेवा प्रदाताओं के लिए 2047 तक टैक्स हॉलिडे की भी सुविधा दी गई है। यह प्रोत्साहन भारत स्थित डेटा सेंटर बुनियादी ढांचे का उपयोग करने वाले वैश्विक परिचालनों पर लागू होता है। यह अधिसूचित विदेशी कंपनियों के लिए कर वर्ष 2026–27 से 2046–47 तक लागू है। ये उपाय डेटा सेंटर और क्लाउड बुनियादी ढांचे के लिए भारत के निवेश माहौल को बेहतर बनाते हैं।
| डेटा सेंटर के विकास को बढ़ावा देने वाली संबद्ध पारिस्थितिकी तंत्र योजनाएंकेंद्रीय मंत्रिमंडल ने 15 जुलाई 2026 को इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (आईएसएम) के अंतर्गत 1,27,500 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ सेमीकॉन इंडिया कार्यक्रम के दूसरे चरण (सेमीकॉन 2.0) को स्वीकृति प्रदान की। इसका उद्देश्य देश में एक विश्वसनीय और सुदृढ़ सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम का समग्र विकास करना है।इंडियाएआई मिशन को देश में एक व्यापक एआई इकोसिस्टम बनाने के लिए 10,371.92 करोड़ रुपये के कुल बजट परिव्यय के साथ स्वीकृति दी गई। इस मिशन के तहत विकसित किया जा रहा एआई इकोसिस्टम भारत में डेटा सेंटर के विकास का एक मुख्य कारक है।इलेक्ट्रॉनिक्स घटक विनिर्माण योजना (ईसीएमएस) को भी अधिक वित्तीय सहायता मिली है। इसका आवंटन 22,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 40,000 करोड़ रुपये हो गया है।भारत सरकार ने आईटी हार्डवेयर के लिए पीएलआई स्कीम 2.0 भी शुरू की है, ताकि आईटी हार्डवेयर (जैसे सर्वर) के लिए एक मजबूत घरेलू विनिर्माण इकोसिस्टम बनाया जा सके, अधिक निवेश आकर्षित किए जा सकें, आयात पर निर्भरता कम की जा सके और भारत को एक विश्वसनीय वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला केंद्र बनाया जा सके। |
डेटा सेंटर क्षेत्र के लिए ऊर्जा और जल नियोजन
डेटा सेंटर की क्षमता तेजी से बढ़ रही है, जिससे ऊर्जा और संसाधन दक्षता का महत्व लगातार बढ़ रहा है। डेटा सेंटरों को निरंतर संचालन के लिए निश्चित तौर पर बिजली और कुशल शीतलन प्रणालियों की आवश्यकता होती है। विद्युत मंत्रालय के केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) के अनुसार, 2031-32 तक मांग 17 गीगावाट तक पहुंच सकती है। चूंकि यह क्षेत्र विस्तार कर रहा है, सरकार भी इस क्षेत्र के सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए स्वच्छ ऊर्जा और संसाधनों के कुशल उपयोग को प्रोत्साहित कर रही है।
नवीकरणीय ऊर्जा और स्वच्छ ऊर्जा
सरकार कई प्रमुख पहलों के माध्यम से नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा दे रही है। इनमें ग्रीन एनर्जी ओपन एक्सेस रूल्स, ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर स्कीम और राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन शामिल हैं। राष्ट्रीय उच्च दक्षता सौर पीवी मॉड्यूल कार्यक्रम और सौर पार्क योजना स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देते हैं। ये उपाय अधिक ऊर्जा की खपत वाले डिजिटल बुनियादी ढांचे के लिए स्वच्छ और निश्चित तौर पर विद्युत की उपलब्धता बढ़ाते हैं।
शांति अधिनियम और स्वच्छ ऊर्जा
भारत में बदलाव के लिए परमाणु ऊर्जा के सतत दोहन और विकास (शांति) अधिनियम, 2025 स्वच्छ ऊर्जा के इकोसिस्टम को सुदृढ़ करता है। यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा सेंटरों सहित उभरते हुए क्षेत्रों के लिए निश्चित रूप से परमाणु ऊर्जा का समर्थन करता है। यह फ़्रेमवर्क भविष्य में स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर और माइक्रो न्यूक्लियर रिएक्टर लगाने में भी मदद करता है।
डेटा सेंटरों के लिए बीआईएस मानक
भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) ने डेटा सेंटर की दक्षता के लिए मानक विकसित किए हैं। इसकी तकनीकी समिति एलआईटीडी 31 क्लाउड कंप्यूटिंग, सूचना प्रौद्योगिकी और डेटा सेंटरों को कवर करती है। बीआईएस ने पावर यूसेज इफेक्टिवनेस (पीयूई) और कार्बन यूसेज इफेक्टिवनेस (सीयूई) से संबंधित मानक प्रकाशित किए हैं। इन मानकों में शीतलन दक्षता अनुपात (सीईआर) और वॉटर यूसेज इफेक्टिवनेस (डब्ल्यूयूई) का भी उल्लेख हैं।
| सरल शब्दों मेंपीयूई और डब्ल्यूयूई– ग्रीन माइलेज रेटिंग की तरह काम करते हैं, जो यह मापते हैं कि कोई सेंटर बिजली और पानी का उपयोग कितनी दक्षता से करता है।सीयूई यह मापता है कि एक डेटा सेंटर के कंप्यूटरों द्वारा उपयोग की जाने वाली बिजली पर कितना कार्बन प्रदूषण उत्पन्न होता है। सीईआर यह मापता है कि कूलिंग सिस्टम (जैसे पंखे, ठंडे पानी की पाइप या लिक्विड कूलेंट) बिजली की खपत के सापेक्ष कितनी दक्षता से गर्मी को बाहर निकालते हैं। |
ऊर्जा और जल दक्षता मानक
ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (बीईई) ने ऊर्जा संरक्षण भवन संहिता (ईसीबीसी) 2017 को अधिसूचित किया है। इसने ऊर्जा संरक्षण और सतत भवन संहिता (ईसीएसबीसी) 2024 को भी अधिसूचित किया है। ये संहिताएं इमारतों के लिए ऊर्जा दक्षता और जल संरक्षण के मानदंड निर्धारित करती हैं। इनमें डेटा सेंटर के बुनियादी ढांचे से संबंधित प्रावधान भी शामिल हैं।
उन्नत शीतलन और जल प्रबंधन
डेटा सेंटर की जल आवश्यकताएं अपनाई गई शीतलन तकनीकों पर निर्भर करती हैं। औद्योगिक उद्देश्यों सहित भूजल निष्कर्षण को जल शक्ति मंत्रालय द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के तहत विनियमित किया जाता है। एआई संबंधी बुनियादी ढांचा डेटा सेंटरों में उन्नत शीतलन तकनीकों को अपनाए जाने को बढ़ावा दे रहा है। इनमें डायरेक्ट-टू-चिप लिक्विड कूलिंग, एडियाबैटिक कूलिंग और इमर्शन कूलिंग शामिल हैं। क्लोज्ड-लूप लिक्विड कूलिंग सिस्टम भी संसाधन-कुशल समाधानों के रूप में उभर रहे हैं।
आगे की राह
भारत के डेटा सेंटर का विकास एक सुदृढ़ और संप्रभु डिजिटल बुनियादी ढांचे की दिशा में निरंतर नीतिगत यात्रा को दर्शाता है। यह डेटा संप्रभुता, डिजिटल विश्वास, आर्थिक प्रतिस्पर्धात्मकता और तकनीकी आत्मनिर्भरता के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण होता जा रहा है। क्लाउड और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस संबंधी बुनियादी ढांचे का विस्तार नवाचार और आर्थिक विकास के नए अवसर पैदा कर रहा है। हालांकि, इस विकास के लिए डेटा, प्रौद्योगिकी, ऊर्जा और डिजिटल बुनियादी ढांचे के उत्तरदायी शासन की भी आवश्यकता है। एक प्रौद्योगिकी शासन दृष्टिकोण नवाचार के साथ-साथ सुरक्षा, स्थिरता, जवाबदेही और जनहित के बीच संतुलन बनाने में मदद कर सकता है। इसके लिए कड़े मानक, सुदृढ़ साइबर सुरक्षा, जिम्मेदारीपूर्ण डेटा कार्यप्रणाली और संसाधनों के कुशल उपयोग की आवश्यकता है। इसके अलावा कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर, ऊर्जा और महत्वपूर्ण डिजिटल बुनियादी ढांचे में घरेलू क्षमताओं को बढ़ाने की भी आवश्यकता है। जैसे-जैसे भारत 2047 तक विकसित भारत की दिशा में आगे बढ़ रहा है, डेटा सेंटर डिजिटल अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार बन सकते हैं।
