वीपीएफ खत्म होगा, तो क्या छोटे निर्माताओं का फिल्म रिलीज करना सच में सस्ता होगा?
छोटे और मझोले बजट की फिल्मों के इंडी निर्माताओं के लिए बड़ी खबर है। देश की प्रमुख मल्टीप्लेक्स चेन पीवीआर आईनॉक्स ने भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग यानी सीसीआई के सामने प्रस्ताव रखा है कि वह फिल्म निर्माताओं से वर्चुअल प्रिंट फीस यानी VPF पूरी तरह खत्म कर देगा।
पहली नजर में यह फैसला फिल्म निर्माताओं के लिए राहत जैसा दिखाई देता है। लेकिन कहानी इतनी सीधी नहीं है।
क्योंकि VPF केवल एक सामान्य शुल्क नहीं था। यह पिछले करीब दो दशकों से फिल्म निर्माताओं और सिनेमाघर संचालकों के बीच चल रही एक बड़ी आर्थिक बहस का हिस्सा रहा है।
सवाल यह है कि VPF आखिर था क्या? यह विवादित क्यों हुआ? और अगर VPF खत्म हो रहा है, तो क्या किसी निर्माता के लिए फिल्म रिलीज करना वास्तव में सस्ता हो जाएगा?
आइए समझते हैं।
VPF क्या था?
एक समय फिल्में रीलों के रूप में सिनेमाघरों तक पहुंचती थीं। 20-25 साल पहले तक रेलवे स्टेशनों पर फिल्मों के गोल-गोल प्रिंट डिब्बे दिखाई देना आम बात थी।
हर प्रिंट तैयार करने, उसे एक शहर से दूसरे शहर भेजने और फिर सुरक्षित रखने में काफी खर्च आता था।
फिर आया डिजिटल सिनेमा का दौर।
फिल्मों की रीलों की जगह डिजिटल फाइलों ने ले लीं। इसके लिए सिनेमाघरों में डिजिटल प्रोजेक्टर और उससे जुड़ा तकनीकी ढांचा लगाया गया।
यह बदलाव सिनेमाघरों के लिए बड़ा निवेश था।
इसी निवेश की लागत की भरपाई के लिए कई बाजारों में Virtual Print Fee यानी VPF जैसी व्यवस्था सामने आई।
सरल भाषा में समझें तो निर्माता से कहा गया—
अब आपको हर सिनेमाघर के लिए महंगी फिल्म रील तैयार करने और भेजने की जरूरत नहीं है। इसके बदले डिजिटल सिनेमा सिस्टम के इस्तेमाल की फीस दीजिए।
भारत में यह व्यवस्था करीब 2007 के आसपास शुरू हुई।
उस समय निर्माताओं का VPF देना पूरी तरह असामान्य नहीं था। डिजिटल प्रोजेक्टर और संबंधित तकनीक में सिनेमाघरों ने निवेश किया था और निर्माताओं ने उस बदलाव की लागत साझा करने को स्वीकार किया।
विवाद शुरू कहां से हुआ?
समस्या तब शुरू हुई जब डिजिटल परिवर्तन लगभग पूरा हो गया, लेकिन VPF जारी रहा।
निर्माताओं का तर्क था कि VPF मूलतः डिजिटल ट्रांजिशन की लागत की भरपाई के लिए था। अगर भारत में सिनेमाघरों का डिजिटलीकरण 2014 तक काफी हद तक पूरा हो गया था और हॉलीवुड स्टूडियोज के साथ VPF व्यवस्था करीब 2018 में समाप्त हो गई, तो भारतीय निर्माताओं से यह शुल्क आगे क्यों लिया जाता रहा?
यही वह बिंदु है जहां सवाल केवल फीस का नहीं, बल्कि व्यवस्था की निष्पक्षता का बन गया।
फिल्म निर्माताओं के संगठन ने इस मामले को भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग के सामने उठाया।
30 सितंबर 2025 के आदेश में सीसीआई ने पीवीआर आईनॉक्स के खिलाफ प्रथम दृष्टया जांच का मामला बनता हुआ माना।
आयोग के सामने यह सवाल भी था कि क्या बड़े और छोटे निर्माताओं के साथ VPF को लेकर अलग-अलग व्यवहार की संभावना है? और क्या ऐसी व्यवस्था छोटे निर्माताओं के लिए अपनी फिल्म को सिनेमाघरों तक पहुंचाने में बाधा बन सकती है?
छोटे निर्माता के लिए VPF कितना बड़ा बोझ था?
कागज पर किसी एक स्क्रीन के लिए शुल्क बहुत बड़ा दिखाई नहीं दे सकता।
लेकिन सोचिए—
एक छोटी फिल्म 100, 200 या 500 स्क्रीन पर रिलीज होती है।
हर स्क्रीन पर शुल्क अलग से जुड़ता है और फिर शो की संख्या तथा रिलीज के पैमाने के साथ लागत बढ़ती जाती है।
यानी एक-एक छोटी फीस मिलकर निर्माता के लिए बड़ी रिलीज कॉस्ट बन सकती है।
और छोटे बजट की फिल्म के लिए यही फर्क कई बार यह तय कर सकता है कि फिल्म ज्यादा स्क्रीन पर रिलीज होगी या कम।
अब पीवीआर आईनॉक्स ने क्या प्रस्ताव दिया है?
यहीं से कहानी में नया मोड़ आता है।
लंबी कानूनी लड़ाई के बजाय पीवीआर आईनॉक्स ने सीसीआई के सामने Commitment के जरिए विवाद समाप्त करने का प्रस्ताव रखा है।
प्रस्ताव स्वीकार होने पर VPF खत्म हो जाएगा।
साथ ही फिल्म रिलीज से पहले लिया जाने वाला अग्रिम भुगतान भी समाप्त करने का प्रस्ताव है।
लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण बात है—
VPF खत्म होने का मतलब यह नहीं है कि निर्माता को सिनेमाघर में फिल्म दिखाने की लागत नहीं देनी होगी।
VPF की जगह एक नई व्यवस्था प्रस्तावित की गई है।
विकल्प नंबर 1: Exhibition Service Charge
प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार सामान्य स्क्रीन के लिए ₹450 प्रति शो और प्रीमियम स्क्रीन के लिए ₹600 प्रति शो का Exhibition Service Charge होगा।
एक स्क्रीन पर फिल्म के कुल 60 शो पूरे होने के बाद यह शुल्क घटकर क्रमशः ₹250 और ₹350 प्रति शो हो जाएगा।
लेकिन राहत की एक महत्वपूर्ण बात है—
यह पैसा फिल्म रिलीज से पहले नहीं देना होगा।
रकम हर सप्ताह होने वाली बॉक्स ऑफिस कमाई में निर्माता या वितरक के हिस्से से काटी जाएगी।
विकल्प नंबर 2: Revenue Share
निर्माता या वितरक निश्चित शुल्क देने के बजाय राजस्व हिस्सेदारी का मॉडल भी चुन सकता है।
इस स्थिति में प्रस्ताव के अनुसार निर्माता/वितरक के मौजूदा बॉक्स ऑफिस हिस्से में अधिकतम 7.5 प्रतिशत तक की कमी हो सकती है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी फिल्म में निर्माता या वितरक का हिस्सा 50 प्रतिशत है, तो 7.5 प्रतिशत की कमी के बाद वह 42.5 प्रतिशत रह सकता है।
यानी सवाल यह नहीं है कि फीस खत्म होगी या नहीं।
सवाल यह है कि—
फीस का स्वरूप बदलकर उसका बोझ निर्माता पर कितना रहेगा?
असली सवाल यहीं है
VPF खत्म होना निश्चित रूप से छोटे निर्माताओं के लिए एक सकारात्मक बदलाव हो सकता है, खासकर इसलिए क्योंकि रिलीज से पहले बड़ी रकम जमा करने की जरूरत कम हो सकती है।
लेकिन इसका अंतिम आर्थिक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि निर्माता कौन-सा मॉडल चुनता है और उसकी फिल्म कितने स्क्रीन तथा कितने शो में चलती है।
एक तरफ निश्चित VPF से राहत मिल सकती है।
दूसरी तरफ प्रति-शो शुल्क या बॉक्स ऑफिस हिस्सेदारी में कमी से नई लागत पैदा हो सकती है।
इसलिए इसे सिर्फ “VPF खत्म = फिल्म रिलीज सस्ती” के रूप में देखना सही नहीं होगा।
असल सवाल है—
क्या नई व्यवस्था छोटे निर्माताओं की कुल रिलीज लागत वास्तव में कम करेगी?
और उससे भी बड़ा सवाल—
क्या इससे छोटे बजट की फिल्मों को बड़े बजट की फिल्मों के मुकाबले स्क्रीन हासिल करने में ज्यादा समान अवसर मिलेगा?
यही इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।
सीसीआई ने प्रस्ताव पर फिल्म उद्योग और आम लोगों से टिप्पणियां, आपत्तियां और सुझाव मांगे हैं। इसके लिए 1 अक्टूबर 2026 अंतिम तारीख निर्धारित की गई है।
अब देखना यह है कि VPF का अंत वास्तव में छोटे निर्माताओं के लिए राहत का नया रास्ता बनता है या सिर्फ फीस वसूलने के तरीके का बदलाव साबित होता है।
क्योंकि सिनेमा में फिल्म बनाना ही मुश्किल नहीं है—उसे दर्शक तक पहुंचाना उससे भी बड़ी चुनौती है।
