पर्यटन, निवेश और जीडीपी की चमक के बीच रोजगार, पलायन और ग्रामीण क्रय शक्ति की असली परीक्षा
संपादकीय | www.udaen.info
किसी राज्य की अर्थव्यवस्था मजबूत होने का अर्थ केवल यह नहीं है कि उसका सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) बढ़ रहा है, पर्यटन के रिकॉर्ड बन रहे हैं या निवेश के बड़े-बड़े प्रस्ताव आ रहे हैं। आर्थिक विकास की वास्तविक सफलता तब दिखाई देती है, जब आम परिवार की आमदनी बढ़े, युवाओं को अपने क्षेत्र में रोजगार मिले, छोटे कारोबारों की बिक्री बढ़े और गांवों में आजीविका के स्थायी साधन विकसित हों। उत्तराखंड के संदर्भ में आर्थिक विकास का मूल्यांकन करते समय इन सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
आर्थिक मंदी से मुकाबले और अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने के सिद्धांतों पर रॉबर्ट ई. हॉल और माइकल वुडफोर्ड जैसे अर्थशास्त्रियों का शोध एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रदान करता है। व्यापक आर्थिक नीतियों को समझने में यह विचार उपयोगी है कि परिवारों की खर्च करने की क्षमता, कारोबारियों के निवेश संबंधी फैसले और भविष्य को लेकर उनकी अपेक्षाएं अर्थव्यवस्था की दिशा को प्रभावित करती हैं। यही दृष्टिकोण उत्तराखंड की विकास नीतियों पर भी लागू होना चाहिए।
सवाल यह है कि राज्य में पर्यटन, निर्माण, होटल व्यवसाय और निवेश गतिविधियों के विस्तार का लाभ कितने स्थानीय परिवारों तक पहुंच रहा है? क्या विकास की रफ्तार के साथ स्थानीय रोजगार और ग्रामीण आय भी बढ़ रही है? या फिर आर्थिक गतिविधियों के विस्तार के बावजूद पहाड़ के अनेक गांव रोजगार और आजीविका की तलाश में खाली होते जा रहे हैं?
पर्यटन के रिकॉर्ड से आगे रोजगार का हिसाब भी जरूरी
उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था में पर्यटन की महत्वपूर्ण भूमिका है। चारधाम यात्रा, धार्मिक पर्यटन, प्राकृतिक सौंदर्य और साहसिक पर्यटन राज्य में आर्थिक गतिविधियों के बड़े आधार हैं। पर्यटकों की संख्या बढ़ने से होटल, परिवहन, भोजन, स्थानीय व्यापार और अन्य सेवाओं को अवसर मिलते हैं।
लेकिन पर्यटकों की संख्या और स्थानीय लोगों की वास्तविक आय एक ही बात नहीं है।
यह जानना भी जरूरी है कि पर्यटन से होने वाली कमाई का कितना हिस्सा स्थानीय व्यवसायियों, टैक्सी चालकों, छोटे दुकानदारों, हस्तशिल्प निर्माताओं, महिला स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण उद्यमियों तक पहुंच रहा है। क्या स्थानीय युवाओं को स्थायी रोजगार मिल रहा है? क्या पर्यटन से होने वाली आय सालभर परिवारों का सहारा बनती है या अधिकांश रोजगार कुछ महीनों तक ही सीमित रहते हैं?
यदि पर्यटन बढ़े, लेकिन स्थानीय उत्पादों की बिक्री और रोजगार में अपेक्षित वृद्धि न हो, तो विकास का लाभ व्यापक बनाने की जरूरत बनी रहेगी।
इसलिए पर्यटन नीति का लक्ष्य केवल पर्यटकों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था में उनकी भागीदारी और आय बढ़ाना भी होना चाहिए।
पलायन: पहाड़ की अर्थव्यवस्था का सबसे कठिन सवाल
उत्तराखंड की आर्थिक चुनौतियों में पलायन का प्रश्न विशेष महत्व रखता है। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बेहतर आजीविका की तलाश में लोगों का गांवों से शहरों की ओर जाना केवल जनसंख्या का स्थानांतरण नहीं है। यह स्थानीय अर्थव्यवस्था की संभावनाओं, सुविधाओं और अवसरों से भी जुड़ा हुआ है।
जब किसी गांव से युवा बाहर जाता है, तो उसके साथ स्थानीय श्रम, उद्यमिता और भविष्य में निवेश करने की संभावना भी प्रभावित हो सकती है। खेती की जमीन खाली रह सकती है, पारंपरिक व्यवसाय कमजोर पड़ सकते हैं और गांव की बाजार व्यवस्था सिकुड़ सकती है।
इस समस्या का समाधान केवल पलायन के आंकड़े जुटाने या गांव लौटने की अपील करने से नहीं होगा। जरूरत ऐसे आर्थिक अवसर पैदा करने की है, जिनके कारण युवाओं को अपने क्षेत्र में रहना या लौटना व्यवहारिक रूप से लाभकारी लगे।
स्थानीय कृषि उत्पादों का प्रसंस्करण, फल एवं सब्जी आधारित उद्योग, जड़ी-बूटी उत्पादन, पशुपालन, मधुमक्खी पालन, ग्रामीण पर्यटन और डिजिटल सेवाएं रोजगार के अवसर बढ़ाने में योगदान दे सकती हैं। लेकिन इन क्षेत्रों में सफलता के लिए प्रशिक्षण के साथ पूंजी, तकनीक, परिवहन, भंडारण, विपणन और बाजार तक पहुंच सुनिश्चित करना आवश्यक है।
पहाड़ में रोजगार पैदा करने की नीति तभी सफल होगी, जब स्थानीय संसाधन स्थानीय लोगों की नियमित आमदनी का आधार बनेंगे।
छोटे उद्यमों को मजबूत किए बिना आर्थिक विकास अधूरा
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में अनेक स्थानीय उत्पाद मौजूद हैं, लेकिन कच्चे माल के रूप में उनकी बिक्री और तैयार उत्पाद के रूप में बाजार में पहुंचने के बीच बड़ा अंतर है।
मंडुवा, झंगोरा, पहाड़ी दालें, माल्टा, नींबू, बुरांश और अन्य स्थानीय उत्पादों को प्रसंस्करण, पैकेजिंग, गुणवत्ता नियंत्रण तथा प्रभावी विपणन के माध्यम से अधिक मूल्यवान बनाया जा सकता है। इससे किसानों को बेहतर कीमत मिलने के साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार भी पैदा हो सकता है।
लेकिन किसी छोटे उद्यमी के लिए केवल योजना की घोषणा पर्याप्त नहीं है। उसे समय पर ऋण, मशीनरी, तकनीकी सहायता, बिजली-पानी, खाद्य सुरक्षा संबंधी अनुपालन, उत्पादों के परीक्षण और बाजार तक पहुंच की जरूरत होती है।
यदि सरकारी योजनाओं की प्रक्रिया जटिल हो, वित्तीय सहायता समय पर न मिले या उत्पाद तैयार होने के बाद बिक्री का भरोसेमंद माध्यम उपलब्ध न हो, तो उद्यमिता का सपना अधूरा रह सकता है।
इसलिए राज्य की औद्योगिक और स्वरोजगार नीतियों का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि कितने उद्यम वास्तव में शुरू हुए, कितने लंबे समय तक टिके रहे, कितने रोजगार पैदा हुए और उद्यमियों की आय में कितना बदलाव आया।
घोषित निवेश, स्वीकृत परियोजना और जमीन पर चल रहे उद्योग के बीच अंतर को भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए।
आम आदमी की क्रय शक्ति क्यों है महत्वपूर्ण?
आर्थिक मंदी का एक प्रमुख खतरा यह है कि कमजोर मांग से कारोबार प्रभावित होते हैं और कारोबारों की कमजोरी रोजगार तथा आय पर दबाव डालती है। उत्तराखंड में भी छोटे दुकानदारों, स्थानीय सेवा प्रदाताओं और ग्रामीण कारोबारों की स्थिति समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि लोगों के पास खर्च करने के लिए कितनी वास्तविक आय उपलब्ध है।
यदि परिवारों की आमदनी सीमित हो और आवश्यक वस्तुओं, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा परिवहन पर खर्च बढ़ता जाए, तो उनकी गैर-जरूरी वस्तुओं और सेवाओं पर खर्च करने की क्षमता घट सकती है। इसका असर स्थानीय बाजार पर पड़ सकता है।
इसलिए आर्थिक विकास की चर्चा में केवल राज्य की जीडीपी या निवेश के आंकड़े पर्याप्त नहीं हैं। वास्तविक मजदूरी, रोजगार की गुणवत्ता, घरेलू खपत, ग्रामीण आय और छोटे कारोबारों की स्थिति के आंकड़े भी सामने आने चाहिए।
सरकार को यह समझना होगा कि बाजार में मांग मजबूत करने के लिए लोगों के पास खर्च करने योग्य आय और भविष्य को लेकर भरोसा होना आवश्यक है।
विकास का उत्तराखंड मॉडल कैसा हो?
उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां मैदानी राज्यों से अलग हैं। यहां दुर्गम गांव, सीमित कृषि भूमि, परिवहन की कठिनाइयां और कई क्षेत्रों में बाजार तक पहुंच की समस्या स्थानीय उद्यमों की लागत बढ़ाती है। इसलिए राज्य के लिए ऐसा विकास मॉडल जरूरी है, जो पर्वतीय परिस्थितियों और स्थानीय संसाधनों को ध्यान में रखे।
पहला, पर्यटन से होने वाली आय का अधिक हिस्सा स्थानीय लोगों तक पहुंचाने के लिए ग्राम स्तर पर पर्यटन उद्यमों, स्थानीय गाइड, होमस्टे, हस्तशिल्प और स्थानीय खाद्य उत्पादों को मजबूत किया जाए।
दूसरा, कृषि और बागवानी को केवल उत्पादन तक सीमित न रखकर प्रसंस्करण, पैकेजिंग, भंडारण और विपणन से जोड़ा जाए।
तीसरा, युवाओं को केवल सरकारी नौकरियों की तैयारी तक सीमित रखने के बजाय तकनीकी प्रशिक्षण, स्थानीय उद्यमिता और स्वरोजगार के लिए व्यावहारिक सहायता दी जाए।
चौथा, महिला स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण उत्पादक संगठनों को बाजार, डिजिटल बिक्री और वित्तीय सहायता से जोड़ा जाए।
पांचवां, सरकारी योजनाओं की सफलता का आकलन खर्च की गई धनराशि और लाभार्थियों की संख्या के साथ वास्तविक रोजगार, आय में वृद्धि तथा उद्यमों के टिके रहने के आधार पर किया जाए।
छठा, राज्य के पर्वतीय और मैदानी क्षेत्रों के आर्थिक अंतर को समझते हुए क्षेत्रवार रोजगार, आय, निवेश और पलायन के आंकड़ों का नियमित विश्लेषण किया जाए।
उत्तराखंड को अपनी आर्थिक प्राथमिकताएं तय करनी होंगी
उत्तराखंड में विकास की संभावनाओं की कमी नहीं है। पर्यटन, जैव विविधता, कृषि, बागवानी, स्थानीय खाद्य उत्पादों और ग्रामीण उद्यमिता के माध्यम से रोजगार तथा आय के नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं। लेकिन इन संभावनाओं को वास्तविक समृद्धि में बदलने के लिए योजनाओं और जमीन पर दिखाई देने वाले परिणामों के बीच की दूरी कम करनी होगी।
रॉबर्ट ई. हॉल और माइकल वुडफोर्ड के आर्थिक शोध से जुड़ा व्यापक सबक यह है कि अर्थव्यवस्था को समझने के लिए लोगों के फैसलों, उनकी अपेक्षाओं और खर्च करने की क्षमता को महत्व देना जरूरी है। उत्तराखंड में इस दृष्टिकोण का अर्थ है कि विकास का मूल्यांकन केवल पर्यटन, निवेश या जीडीपी की वृद्धि से नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों की आर्थिक स्थिति में आए बदलाव से भी किया जाए।
राज्य के सामने वास्तविक चुनौती केवल अधिक आर्थिक गतिविधियां पैदा करना नहीं, बल्कि ऐसी गतिविधियां विकसित करना है जो स्थानीय रोजगार, स्थायी आजीविका और ग्रामीण समृद्धि का आधार बनें।
यदि पर्यटन बढ़ने के बावजूद स्थानीय युवाओं को रोजगार के लिए बाहर जाना पड़े, यदि गांवों में प्राकृतिक संसाधन हों लेकिन उनसे स्थानीय आय न पैदा हो और यदि निवेश के बड़े दावों के बीच छोटे उद्यमी बाजार तथा पूंजी के लिए संघर्ष करें, तो विकास की रणनीति पर पुनर्विचार आवश्यक है।
उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था को ऐसा स्वरूप देना होगा जिसमें गांव केवल आबादी के केंद्र नहीं, बल्कि उत्पादन, उद्यमिता और रोजगार के केंद्र बनें। पलायन रोकने का स्थायी रास्ता भी यही है कि पहाड़ में रहकर सम्मानजनक आय अर्जित करना संभव और लाभकारी बनाया जाए।
विकास का असली पैमाना यह नहीं कि राज्य की अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी हुई, बल्कि यह भी है कि उत्तराखंड के आम नागरिक का जीवन कितना सुरक्षित, आत्मनिर्भर और समृद्ध हुआ।
