दलेर मेहंदी प्रकरण ने खोली उत्तराखंड की सांस्कृतिक प्राथमिकताओं और सार्वजनिक खर्च की बहस
संपादकीय | 21 अक्टूबर 2026 | www.udaen.info
उत्तराखंड की पहचान उसके लोकगीतों, लोकदेवताओं, पारंपरिक वाद्ययंत्रों और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से है। लेकिन जब इसी देवभूमि के एक प्रमुख धार्मिक मेले में किसी बाहरी कलाकार की प्रस्तुति पर लाखों रुपये खर्च होने और कार्यक्रम की गुणवत्ता पर सवाल उठने लगें, तो यह बहस केवल एक गायक तक सीमित नहीं रह जाती। सवाल यह भी बनता है कि राज्य की सांस्कृतिक प्राथमिकताएँ क्या हैं और अपने कलाकारों को कितने अवसर मिल रहे हैं?

नरेंद्रनगर क्षेत्र के सिद्धपीठ माँ कुंजापुरी पर्यटन एवं विकास मेले में पंजाबी गायक दलेर मेहंदी की प्रस्तुति को लेकर उठा विवाद इसी बहस को सामने लाया है।
19 अक्टूबर को सामने आए घटनाक्रम के बाद कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल ने समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में कहा कि दलेर मेहंदी को कार्यक्रम के लिए ₹35 लाख देने की पेशकश की गई थी। मंत्री ने प्रस्तुति के दौरान उनके गायन पर भी सवाल उठाए। इस बयान को 20 अक्टूबर को हिंदुस्तान टाइम्स सहित कई समाचार माध्यमों ने प्रकाशित किया।

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। मंत्री का बयान ₹35 लाख की फीस के दावे का आधार है, लेकिन उपलब्ध समाचार रिपोर्टों से वास्तविक भुगतान की पुष्टि नहीं होती। इसी तरह कुछ रिपोर्टों में लगभग ₹40 लाख की फीस का उल्लेख है, मगर आयोजन की कुल लागत और कलाकार को किए गए वास्तविक भुगतान का आधिकारिक विवरण सामने आना अभी बाकी है।
यही वह बिंदु है जहाँ इस प्रकरण को व्यक्तिगत विवाद से आगे ले जाकर सार्वजनिक जवाबदेही के प्रश्न के रूप में देखना चाहिए।
₹35 लाख की फीस: भुगतान किसने किया, हिसाब कौन देगा?
यदि मंत्री के बयान के अनुसार कलाकार की फीस ₹35 लाख निर्धारित की गई थी, तो जनता को यह जानने का अधिकार है कि आयोजन का बजट कितना था, भुगतान किस संस्था ने किया और अनुबंध में किन शर्तों का उल्लेख था।
क्या ₹35 लाख केवल कलाकार की फीस थी? क्या यात्रा, होटल, तकनीकी व्यवस्था और अन्य खर्च अलग से किए गए? क्या अनुबंध में लाइव गायन की कोई शर्त थी? क्या कार्यक्रम के बाद भुगतान की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है?
इन सवालों के उत्तर आयोजन समिति, जिला प्रशासन और संबंधित विभागों के अभिलेखों से ही मिल सकते हैं।
सार्वजनिक धन खर्च हुआ है तो खर्च का विवरण भी सार्वजनिक होना चाहिए। यदि आयोजन निजी धन से हुआ, तो उस स्थिति को भी स्पष्ट किया जाना चाहिए।
मुद्दा केवल यह नहीं कि कलाकार कितना महँगा था। असली सवाल यह है कि खर्च के अनुपात में आयोजन ने जनता और स्थानीय संस्कृति को क्या दिया।
उत्तराखंड के पास कलाकारों की कमी नहीं
गढ़वाल, कुमाऊँ और जौनसार की लोकसंस्कृति में ऐसी विविधता है, जिसे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। पद्मश्री प्रीतम भरतवाण, नरेंद्र सिंह नेगी, बसंती बिष्ट, किशन महिपाल, गजेंद्र राणा, मीना राणा और अनिल बिष्ट जैसे कलाकारों ने उत्तराखंड के लोकसंगीत को नई पहचान दी है।
इन कलाकारों के गीतों में पहाड़ का जीवन, लोकदेवताओं की परंपराएँ, सामाजिक संबंध, प्रकृति और आम जनमानस की भावनाएँ अभिव्यक्त होती हैं।
इनके साथ स्थानीय वादकों, संगीतकारों, तकनीशियनों और सांस्कृतिक दलों को भी रोजगार मिलता है। छोटे आयोजनों से लेकर बड़े महोत्सवों तक स्थानीय प्रतिभाओं को नियमित अवसर देना राज्य की सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकता है।
यह तर्क नहीं दिया जा रहा कि दूसरे राज्यों के कलाकारों को उत्तराखंड में आमंत्रित नहीं किया जाना चाहिए। देश की विविध सांस्कृतिक परंपराओं का आदान-प्रदान स्वागतयोग्य है।
लेकिन यदि राज्य सरकार पर्यटन, स्थानीय रोजगार और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को अपनी प्राथमिकता बताती है, तो उसके आयोजनों में स्थानीय कलाकारों की भागीदारी भी स्पष्ट रूप से दिखाई देनी चाहिए।
क्या 70 प्रतिशत स्थानीय कलाकारों को प्राथमिकता देने का नियम है?
इस विवाद के बीच यह दावा भी चर्चा में है कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक नीति में सरकारी मेलों के लिए कम-से-कम 70 प्रतिशत स्थानीय कलाकारों को प्राथमिकता देने का प्रावधान है।
इस दावे की जाँच आवश्यक है।
उत्तराखंड पर्यटन विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध पर्यटन नीति 2023 तथा उसके परिचालन दिशा-निर्देशों को देखने पर स्थानीय संस्कृति और पर्यटन को प्रोत्साहित करने की व्यापक नीति सामने आती है। हालाँकि, उपलब्ध दस्तावेजों में सरकारी मेलों के लिए अनिवार्य रूप से 70 प्रतिशत स्थानीय कलाकारों की भागीदारी का स्पष्ट प्रावधान सत्यापित नहीं हो पाया है।
इसलिए बिना संबंधित शासनादेश या नियमावली की पुष्टि किए यह कहना उचित नहीं होगा कि कुंजापुरी मेले में 70 प्रतिशत स्थानीय कलाकारों के नियम का उल्लंघन हुआ है।
लेकिन सरकार से यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि क्या पर्यटन विभाग, संस्कृति विभाग या जिला प्रशासन ने अपने आयोजनों में स्थानीय कलाकारों को प्राथमिकता देने के लिए कोई अलग दिशा-निर्देश जारी किए हैं?
यदि ऐसा कोई आदेश है, तो उसकी प्रति सार्वजनिक की जानी चाहिए। यदि ऐसा कोई स्पष्ट नियम नहीं है, तो राज्य सरकार को स्थानीय कलाकारों के लिए पारदर्शी और मापने योग्य व्यवस्था बनाने पर विचार करना चाहिए।
धार्मिक मेले की गरिमा और सांस्कृतिक कार्यक्रम
माँ कुंजापुरी का मेला धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा आयोजन है। नवरात्र के दौरान यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं के लिए देवी के दर्शन का विशेष महत्त्व है।
ऐसे आयोजन में संगीत और मनोरंजन का स्थान हो सकता है, लेकिन कार्यक्रम का चयन आयोजन की प्रकृति, स्थानीय परंपराओं और दर्शकों की अपेक्षाओं को ध्यान में रखकर होना चाहिए।
दलेर मेहंदी की प्रस्तुति पर विवाद के बाद मंत्री ने सार्वजनिक रूप से नाराजगी जताई। समाचार रिपोर्टों में प्रस्तुति के दौरान लाइव गायन और रिकॉर्डेड ट्रैक के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठने का उल्लेख है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और कलाकार की स्थिति के बारे में संबंधित पक्षों का पूरा विवरण सामने आना आवश्यक है।
आयोजन की गुणवत्ता का मूल्यांकन किसी कलाकार की भाषा या उसके राज्य के आधार पर नहीं, बल्कि अनुबंध, प्रस्तुति, दर्शकों की अपेक्षाओं और आयोजन की जवाबदेही के आधार पर होना चाहिए।
लाखों के आयोजन और पहाड़ की बुनियादी जरूरतें
उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में रोजगार, स्वास्थ्य सुविधाओं और पलायन की समस्या लगातार सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा रही है। ऐसे में बड़े आयोजनों पर खर्च को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
हालाँकि, मेले की राशि को सीधे स्वास्थ्य केंद्रों या अन्य योजनाओं में खर्च किया जा सकता था, ऐसा निष्कर्ष बजट की जानकारी के बिना नहीं निकाला जा सकता। प्रत्येक सरकारी खर्च निर्धारित वित्तीय मदों और नियमों के अधीन होता है।
फिर भी यह पूछना पूरी तरह उचित है कि सांस्कृतिक आयोजनों से स्थानीय अर्थव्यवस्था को कितना लाभ मिला, कितने स्थानीय कलाकारों को पारिश्रमिक मिला और स्थानीय उत्पादों तथा छोटे कारोबारियों को कितने अवसर मिले।
यदि किसी आयोजन पर लाखों रुपये खर्च होते हैं, तो उसके आर्थिक और सांस्कृतिक लाभ का आकलन भी होना चाहिए।
सरकार के सामने पाँच जरूरी सवाल
- दलेर मेहंदी की प्रस्तुति के लिए ₹35 लाख की फीस किस संस्था ने स्वीकृत की और वास्तविक भुगतान कितना हुआ?
- कलाकार की फीस के अतिरिक्त यात्रा, आवास और अन्य व्यवस्थाओं पर कितना खर्च किया गया?
- कुंजापुरी मेले में उत्तराखंड के स्थानीय कलाकारों और सांस्कृतिक दलों को कितने कार्यक्रम दिए गए तथा उन पर कितना बजट खर्च हुआ?
- क्या पर्यटन विभाग, संस्कृति विभाग या जिला प्रशासन के किसी शासनादेश में स्थानीय कलाकारों की निर्धारित भागीदारी का प्रावधान है? यदि हाँ, तो उसकी प्रति सार्वजनिक की जाए।
- क्या आयोजन समिति कार्यक्रम के खर्च, कलाकार चयन और अनुबंध की शर्तों की समीक्षा कर रिपोर्ट सार्वजनिक करेगी?
इन सवालों के उत्तर आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि सरकारी दस्तावेजों और पारदर्शी जाँच से मिलने चाहिए।
अब जवाबदेही तय करने का समय
मंत्री की मंच से की गई नाराजगी ने इस कार्यक्रम को चर्चा में ला दिया। लेकिन किसी भी सार्वजनिक आयोजन की जिम्मेदारी केवल मंच पर दिखाई देने वाले कलाकार की नहीं होती। कलाकार चुनने, अनुबंध करने, बजट स्वीकृत करने और कार्यक्रम की निगरानी करने वालों की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण होती है।
यदि अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन या किसी स्तर पर वित्तीय अनियमितता सामने आती है, तो नियमानुसार जाँच और कार्रवाई होनी चाहिए।
साथ ही, सरकार को अपने सांस्कृतिक आयोजनों के लिए ऐसे दिशा-निर्देश तैयार करने चाहिए, जिनमें स्थानीय कलाकारों को उचित अवसर, पारिश्रमिक और बड़े मंचों पर प्रतिनिधित्व मिले।
उत्तराखंड को अपनी सांस्कृतिक विरासत को केवल पर्यटन के प्रचार का माध्यम नहीं, बल्कि स्थानीय रोजगार और आर्थिक विकास का आधार भी बनाना होगा।
सवाल दलेर मेहंदी को बुलाने का नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने का है कि उत्तराखंड के अपने कलाकारों को भी सम्मान, अवसर और उचित पारिश्रमिक मिले।
देवभूमि की संस्कृति तभी जीवंत रहेगी, जब उसके लोक कलाकार केवल परंपरा के संरक्षक नहीं, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था के सक्रिय भागीदार भी बनेंगे।
