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डी-5 की खौफनाक कहानी का आरोपी सुरेंद्र कोली फांसी पर मिला—लेकिन यह अदालत का फैसला नहीं, एक ऐसी मौत है जिसने निठारी के अनुत्तरित सवाल फिर जिंदा कर दिए हैं।

हरिद्वार के भूपतवाला में चाय की छोटी-सी दुकान चलाने वाले सुरेंद्र कोली का शव शुक्रवार को फांसी पर लटका मिला। पुलिस ने प्रथमदृष्टया इसे आत्महत्या माना है। घटनास्थल से आत्महत्या संबंधी कोई नोट मिलने की बात सामने नहीं आई है और मौत की परिस्थितियों की जांच जारी है।

लेकिन मरने वाला कोई सामान्य व्यक्ति नहीं था।

यह वही सुरेंद्र कोली था, जिसका नाम करीब दो दशक पहले नोएडा के निठारी कांड से जुड़ा और जिसके बाद देश ने डी-5 कोठी की भयावह कहानी सुनी थी। 2006 में निठारी में बच्चों और महिलाओं के लापता होने तथा मानव अवशेष मिलने के बाद कोली और उसके नियोक्ता मोनिंदर सिंह पंढेर पर गंभीर आपराधिक आरोप लगे। कोली को कई मामलों में दोषी ठहराया गया और उसे कई बार मृत्युदंड तक सुनाया गया।

लेकिन न्याय की अंतिम सीढ़ी पर कहानी बदल गई।

2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कोली और पंढेर को जुड़े मामलों में बरी किया। इसके बाद 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने भी संबंधित अपीलों को खारिज किया और नवंबर 2025 में अंतिम लंबित मामले में कोली की दोषसिद्धि भी रद्द कर दी। सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के बाद निठारी से जुड़े सभी 13 मामलों में कोली के खिलाफ दोषसिद्धि कायम नहीं रही।

यहीं से सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है—

अगर सुरेंद्र कोली दोषी नहीं था, तो फिर निठारी के उन मासूम बच्चों और अन्य पीड़ितों की मौत के लिए जिम्मेदार कौन था?

और अगर जांच एजेंसियों ने वर्षों तक कोली को ही अपराधों का केंद्र माना, तो अदालतों में वही मामला टिक क्यों नहीं पाया?

यह सवाल केवल सुरेंद्र कोली की निर्दोषता या दोषसिद्धि का नहीं है। यह उस जांच व्यवस्था का सवाल है, जिसने देश को भयावह अपराधों की तस्वीर तो दिखाई, लेकिन उन अपराधों के पीछे की पूरी सच्चाई अदालत के सामने निर्णायक रूप से स्थापित नहीं कर सकी।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतिम फैसले में पहले की दोषसिद्धि को बनाए रखना उचित नहीं माना। यानी आपराधिक न्याय व्यवस्था में संदेह का लाभ आरोपी को मिला और अभियोजन अपने आरोपों को उस स्तर तक साबित नहीं कर सका, जो कानूनन आवश्यक है।

लेकिन पीड़ित परिवारों के लिए कहानी इतनी सरल नहीं है।

उनके बच्चे लौटकर नहीं आए। उनके परिवारों ने वर्षों तक पुलिस थानों, जांच एजेंसियों और अदालतों के चक्कर लगाए। लगभग दो दशक बाद एक आरोपी कानून की नजर में दोषमुक्त होकर जेल से बाहर आया—और अब उसकी भी मौत हो गई।

इस मौत के बाद निठारी का सबसे बड़ा सवाल और भी गहरा हो गया है।

क्या न्याय केवल किसी आरोपी को सजा देने का नाम है, या असली अपराधी तक पहुंचना भी न्याय का अनिवार्य हिस्सा है?

कानून किसी व्यक्ति को तब तक दोषी नहीं मानता जब तक अपराध प्रमाणित न हो जाए। यही सभ्य न्याय व्यवस्था की बुनियाद है। लेकिन दूसरी तरफ पीड़ित परिवारों को यह जानने का अधिकार भी है कि उनके बच्चों के साथ आखिर हुआ क्या था और उसके लिए जिम्मेदार कौन था।

इसलिए सुरेंद्र कोली की मौत को किसी अंतिम ‘दैवी न्याय’ के रूप में घोषित करना जल्दबाजी होगी। पुलिस जांच और पोस्टमार्टम के निष्कर्ष सामने आने चाहिए।

फिर भी विडंबना बेहद कड़वी है।

जिस व्यक्ति को कभी अदालतों ने मृत्युदंड दिया था, जिसकी फांसी कई बार टली, वही व्यक्ति वर्षों बाद अदालत से बरी होकर आजाद जिंदगी जीने की कोशिश कर रहा था—और आखिरकार हरिद्वार की एक छोटी-सी चाय की दुकान में फांसी पर मिला।

अदालत ने उसे सजा नहीं दी।

लेकिन उसकी मौत ने निठारी के उस पुराने सवाल को फिर फांसी पर लटका दिया है—

आखिर उन बच्चों का असली कातिल कौन था?

निठारी कांड की सबसे बड़ी त्रासदी शायद यही है कि इतने वर्षों बाद भी पीड़ित परिवारों के पास मौतों की कहानी है, अदालतों के पास फैसले हैं, जांच एजेंसियों के पास अपनी रिपोर्टें हैं—लेकिन उस भयावह सच का वह अंतिम उत्तर आज भी अधूरा दिखाई देता है, जिसकी तलाश में देश ने करीब दो दशक बिताए।

इंसाफ केवल सजा मिलने से पूरा नहीं होता।
इंसाफ तब पूरा होता है, जब सच सामने आए।


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By udaen

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