जन्म और मृत्यु का पंजीकरण सरकार के लिए आंकड़ा भर नहीं है। जन्म प्रमाणपत्र व्यक्ति की पहचान, शिक्षा, पासपोर्ट, सरकारी सेवाओं और अनेक अधिकारों से जुड़ता है, जबकि मृत्यु प्रमाणपत्र परिवार के कानूनी और सामाजिक कामों में जरूरी दस्तावेज बन जाता है। केंद्र सरकार के अनुसार 2023 के संशोधन के बाद जन्म प्रमाणपत्र को कई महत्वपूर्ण सेवाओं में जन्मतिथि और जन्मस्थान के प्रमाण के रूप में इस्तेमाल करने का प्रावधान किया गया है।

लेकिन सवाल यह है कि जिस व्यवस्था को डिजिटल और पारदर्शी बनाया जा रहा है, उसकी पहुंच पहाड़ के उस गांव तक कितनी है जहां इंटरनेट कमजोर है, अस्पताल दूर है और परिवार को तहसील या जिला मुख्यालय तक पहुंचने में पूरा दिन लग जाता है?

उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है।
कई दूरस्थ गांवों में अस्पताल या पंजीकरण केंद्र तक पहुंचना ही चुनौती है। बुजुर्गों, अकेले रहने वाले परिवारों, गरीब ग्रामीणों और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए दस्तावेज जुटाना, कार्यालयों के चक्कर लगाना और विलंबित पंजीकरण की प्रक्रिया पूरी करना आसान नहीं होता।
सरकार का उद्देश्य फर्जी या गलत पंजीकरण रोकना और जन्म-मृत्यु के आंकड़ों को विश्वसनीय बनाना है। यह उद्देश्य महत्वपूर्ण है। लेकिन इसके साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि नियमों की कठोरता के कारण वास्तविक नागरिक अपने ही जन्म या परिवार के सदस्य की मृत्यु का प्रमाण हासिल करने से वंचित न रह जाए।
पहाड़ के लिए पांच जरूरी सवाल
पहला—दूरस्थ गांव में सेवा कौन देगा?
क्या पंचायत स्तर पर सहायता केंद्र या मोबाइल पंजीकरण व्यवस्था पर्याप्त होगी?
दूसरा—विलंबित पंजीकरण में गरीब परिवार की मदद कौन करेगा?
यदि मामला तहसील, SDM या DM स्तर तक जाता है तो आवेदन और सत्यापन की प्रक्रिया सरल और स्थानीय स्तर पर सहायता वाली होनी चाहिए।
तीसरा—डिजिटल व्यवस्था के साथ ऑफलाइन विकल्प रहेगा या नहीं?
डिजिटल सुविधा नागरिक के लिए रास्ता आसान करे, नया अवरोध नहीं।
चौथा—पुराने रिकॉर्ड का क्या होगा?
पहाड़ के अनेक परिवारों के पास दशकों पुराने जन्म-मृत्यु रिकॉर्ड व्यवस्थित रूप से उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे मामलों में स्थानीय अभिलेख, पंचायत रिकॉर्ड, विद्यालय प्रमाणपत्र और अन्य वैध दस्तावेजों के सत्यापन की स्पष्ट व्यवस्था जरूरी है।
पांचवां—जागरूकता कौन करेगा?
कानून बना देना पर्याप्त नहीं। पंचायत, आशा कार्यकर्ता, आंगनबाड़ी, ग्राम विकास अधिकारी और स्थानीय निकायों के माध्यम से लोगों को समय पर पंजीकरण की जानकारी देनी होगी।
डिजिटल भारत का मतलब अंतिम गांव तक व्यवस्था
केंद्र के Civil Registration System में जन्म और मृत्यु पंजीकरण की ऑनलाइन सुविधा उपलब्ध है और उत्तराखंड भी इसके दायरे में है।
लेकिन ऑनलाइन सुविधा तभी वास्तविक सुविधा बनेगी जब गांव के नागरिक को आवेदन करने, दस्तावेज लगाने और गलती सुधारने में सहायता भी मिले।
जन्म और मृत्यु का पंजीकरण व्यवस्था की निगरानी का विषय जरूर है, लेकिन नागरिक के लिए यह उसके अस्तित्व और परिवार की कानूनी पहचान का दस्तावेज है।
इसलिए लक्ष्य सिर्फ “रिकॉर्ड सही करना” नहीं होना चाहिए—लक्ष्य यह भी होना चाहिए कि देश का कोई नागरिक केवल दूरी, गरीबी, डिजिटल कमजोरी या जानकारी के अभाव में अपने जन्म या अपने परिजन की मृत्यु का प्रमाण हासिल करने से वंचित न रहे।
पहाड़ में नियम वही सफल होगा, जिसकी पहुंच आखिरी गांव तक होगी।
