सवाल सिर्फ ग्लेशियरों के पिघलने का नहीं है। सवाल यह है कि अगर हिमालय कमजोर हुआ तो भारत कितना सुरक्षित बचेगा?
हिमालय आज केवल पहाड़ों की एक श्रृंखला नहीं, बल्कि भारत की जल, कृषि, ऊर्जा, जैव-विविधता और अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा है। लेकिन जलवायु परिवर्तन ने इस जीवनरेखा को गंभीर खतरे में डाल दिया है।
ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने, बर्फबारी के बदलते स्वरूप, बढ़ते तापमान, ग्लेशियर झीलों के विस्तार और अचानक आने वाली बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्र को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां छोटी-सी प्राकृतिक घटना भी बड़े मानवीय और आर्थिक संकट में बदल सकती है।
नेपाल और तिब्बत में हाल की भीषण बाढ़ ने एक बार फिर चेतावनी दी है कि हिमालय का संकट अब भविष्य की कहानी नहीं रहा। यह हमारे सामने घट रही वास्तविकता है।
भारत के लिए खतरा और भी बड़ा है। हिमालय से निकलने वाली नदियां देश के करोड़ों लोगों की प्यास बुझाती हैं, खेतों को पानी देती हैं, बिजली पैदा करती हैं और करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार बनती हैं। उत्तराखंड, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, सिक्किम और पूर्वोत्तर का पहाड़ी क्षेत्र केवल पर्यटन का केंद्र नहीं, बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के पर्यावरणीय संतुलन का महत्वपूर्ण आधार है।
56 ग्लेशियर झीलें अति-उच्च जोखिम में
भारतीय हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर झीलों का खतरा लगातार बढ़ रहा है। वैज्ञानिक आकलनों में उच्च जोखिम वाली झीलों की पहचान की गई है और इनमें 56 को अति-उच्च जोखिम की श्रेणी में रखा गया है।
यह आंकड़ा केवल सरकारी रिपोर्ट का हिस्सा नहीं होना चाहिए। इसका मतलब है कि पहाड़ों के ऊपर पानी के ऐसे विशाल भंडार मौजूद हैं, जिनके अचानक टूटने या बहने से नीचे बसे गांवों, कस्बों, सड़कों, पुलों, बिजली परियोजनाओं और शहरों पर विनाशकारी असर पड़ सकता है।
हिमालय में बनी एक झील का संकट केवल पहाड़ का संकट नहीं है। उसकी लहर मैदान तक पहुंच सकती है।
यही कारण है कि ग्लेशियर झीलों की निगरानी को केवल वैज्ञानिक गतिविधि मानना पर्याप्त नहीं होगा। इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक सुरक्षा के सवाल के रूप में देखना होगा।
विकास की दिशा पर भी सवाल
हिमालय को बचाने की चर्चा केवल पेड़ लगाने तक सीमित नहीं रह सकती।
हमें यह भी पूछना होगा कि क्या पहाड़ों में विकास का वर्तमान मॉडल प्रकृति की वहन क्षमता के अनुरूप है?
बेतरतीब सड़क निर्माण, पहाड़ों की कटाई, सुरंगों और बड़ी परियोजनाओं का दबाव, नदियों के प्राकृतिक प्रवाह में हस्तक्षेप, अत्यधिक पर्यटन और कमजोर शहरी नियोजन—इन सबका संयुक्त प्रभाव हिमालयी पारिस्थितिकी को कमजोर कर सकता है।
हमें यह तय करना होगा कि पहाड़ में विकास प्रकृति के साथ होगा या प्रकृति की कीमत पर।
हिमालय को सिर्फ आपदा के बाद याद करना बंद करना होगा
हर बड़ी आपदा के बाद राहत पैकेज आता है, मुआवजे की घोषणा होती है, जांच समितियां बनती हैं और कुछ समय बाद सब सामान्य हो जाता है।
लेकिन हिमालय सामान्य नहीं हो रहा है।
इसलिए नीति भी बदलनी होगी।
हिमालय के लिए हमें आपदा आने के बाद राहत की व्यवस्था से आगे बढ़कर आपदा आने से पहले खतरे को रोकने की व्यवस्था बनानी होगी।
ग्लेशियरों और ग्लेशियर झीलों की वास्तविक समय निगरानी, मजबूत पूर्व चेतावनी प्रणाली, संवेदनशील गांवों की आपदा योजना, वैज्ञानिक भू-उपयोग नीति, नदी क्षेत्रों की सुरक्षा और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को विकास नीति का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात—हिमालय के लोगों को समस्या का हिस्सा नहीं, समाधान का हिस्सा बनाना होगा।
सवाल उत्तराखंड से भी है
उत्तराखंड के लिए यह चेतावनी और गंभीर है।
जिस राज्य की पहचान ही हिमालय, नदियों, ग्लेशियरों, जंगलों और तीर्थ पर्यटन से है, वहां विकास की हर परियोजना का पहला सवाल होना चाहिए—
क्या यह हिमालय की सहनशीलता के भीतर है?
अगर इसका जवाब नहीं है तो परियोजना कितनी भी बड़ी, महंगी या राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्यों न हो, उस पर दोबारा विचार होना चाहिए।
क्योंकि सड़क, बांध, होटल और भवन दोबारा बनाए जा सकते हैं।
लेकिन कमजोर पड़ चुका हिमालय दोबारा नहीं बनाया जा सकता।
आज सवाल यह नहीं है कि हिमालय हमें कितना देता है।
सवाल यह है—
हम हिमालय को कितना बचा पा रहे हैं?
अगर हिमालय सुरक्षित है तो नदियां सुरक्षित हैं।
नदियां सुरक्षित हैं तो खेत सुरक्षित हैं।
खेत सुरक्षित हैं तो भोजन सुरक्षित है।
जल सुरक्षित है तो अर्थव्यवस्था सुरक्षित है।
इसलिए हिमालय को बचाना पर्यावरण की लड़ाई भर नहीं है।
यह भारत की अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा, जल सुरक्षा और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बचाने की लड़ाई है।
और अगर हमने अभी भी हिमालय की चेतावनी नहीं सुनी, तो आने वाली पीढ़ियां हमसे यही पूछेंगी—
जब पहाड़ पिघल रहे थे, तब भारत क्या कर रहा था?
