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पहले पत्रकारों को संवैधानिक अधिकार तो दिलवा दो, फिर पत्रकार सुरक्षा कानून मांगना!

संपादकीय

देश में पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर बहस तेज है। पत्रकार संगठनों की बैठकें हो रही हैं, ज्ञापन दिए जा रहे हैं, सम्मेलन आयोजित किए जा रहे हैं और पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग जोर पकड़ रही है। पत्रकारों पर हमले, धमकियां, उत्पीड़न, मुकदमे और रिपोर्टिंग में हस्तक्षेप निश्चित रूप से गंभीर प्रश्न हैं। पत्रकार को केवल इसलिए निशाना नहीं बनाया जा सकता कि उसने सत्ता, प्रशासन या किसी प्रभावशाली व्यक्ति से सवाल पूछ दिया।लेकिन इस पूरी बहस के बीच एक बुनियादी सवाल पूछना जरूरी है—क्या पत्रकार संगठनों ने पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग करने से पहले पत्रकारों के मौजूदा संवैधानिक और कानूनी अधिकारों को पर्याप्त रूप से समझा और समझाया है?लोकतंत्र में पत्रकारिता को अक्सर “चौथा स्तंभ” कहा जाता है। यह पत्रकारिता की लोकतांत्रिक भूमिका और महत्व को रेखांकित करने वाली अवधारणा है। लेकिन इसे संविधान द्वारा दिए गए किसी पृथक संवैधानिक दर्जे के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं होगा। भारतीय संविधान में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद पत्रकारिता को “चौथा स्तंभ” घोषित करने वाला कोई अलग प्रावधान नहीं है।पत्रकारिता की स्वतंत्रता का संवैधानिक आधार मुख्यतः अनुच्छेद 19(1)(a) में निहित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी प्रेस की स्वतंत्रता को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के व्यापक दायरे में स्वीकार किया है। लेकिन यह स्वतंत्रता निरंकुश नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत निर्धारित युक्तिसंगत प्रतिबंध भी लागू होते हैं।यहीं से असली बहस शुरू होती है।अगर पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग करनी है तो पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि आखिर “पत्रकार” किसे माना जाएगा?क्या केवल प्रेस कार्ड रखने वाला व्यक्ति पत्रकार है? क्या डिजिटल मीडिया का स्वतंत्र पत्रकार पत्रकार नहीं है? क्या स्ट्रिंगर पत्रकार है? क्या कैमरा जर्नलिस्ट पत्रकार है? क्या यूट्यूब या स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सार्वजनिक हित में रिपोर्टिंग करने वाला व्यक्ति पत्रकारिता की सुरक्षा का पात्र होगा? क्या किसी संस्थान से नियुक्ति पत्र न पाने वाला व्यक्ति पत्रकार नहीं माना जाएगा?आज पत्रकारिता का स्वरूप बदल चुका है। अखबार और टीवी चैनलों के साथ डिजिटल पोर्टल, स्वतंत्र पत्रकार, मोबाइल पत्रकारिता और सोशल मीडिया आधारित रिपोर्टिंग भी सूचना व्यवस्था का हिस्सा बन चुके हैं। इसलिए यदि कभी पत्रकार सुरक्षा कानून बनाया जाता है तो उसकी परिभाषा अत्यंत स्पष्ट, व्यापक और दुरुपयोग से सुरक्षित होनी चाहिए।वरना कानून बन जाएगा, लेकिन असली पत्रकार उसी पुराने सवाल के साथ खड़ा रहेगा—क्या मैं इस कानून के दायरे में आता भी हूं?सुरक्षा सिर्फ हमले से बचाने का नाम नहींपत्रकार सुरक्षा को केवल पुलिस सुरक्षा या हमले के बाद मुकदमा दर्ज कराने तक सीमित कर देना भी बड़ी भूल होगी।एक पत्रकार की सुरक्षा का अर्थ है—वह बिना भय और अनुचित दबाव के काम कर सके। उसे खबर प्रकाशित करने के कारण प्रतिशोध का सामना न करना पड़े। उसकी रिपोर्टिंग रोकने के लिए धमकी या दबाव का इस्तेमाल न हो। उसके कैमरे, मोबाइल या अन्य पेशेवर उपकरणों को अवैध रूप से न छीना जाए। उसके खिलाफ दुर्भावनापूर्ण तरीके से कानूनी प्रक्रिया का इस्तेमाल न किया जाए।लेकिन सुरक्षा की एक दूसरी परत भी है, जिस पर पत्रकार संगठन अपेक्षाकृत कम बात करते हैं—आर्थिक और संस्थागत सुरक्षा।कितने पत्रकार बिना नियुक्ति पत्र के काम कर रहे हैं?कितनों को समय पर वेतन नहीं मिलता?कितने पत्रकारों को पत्रकारिता के साथ-साथ विज्ञापन और प्रसार का लक्ष्य भी दिया जाता है?कितने पत्रकारों को खबर के बदले विज्ञापन जुटाने का दबाव झेलना पड़ता है?कितने पत्रकारों के पास स्वास्थ्य, दुर्घटना या जीवन बीमा जैसी सामाजिक सुरक्षा है?किसी रिपोर्टिंग के दौरान पत्रकार की मृत्यु हो जाए या वह गंभीर रूप से घायल हो जाए तो उसके परिवार की जिम्मेदारी कौन लेता है?इन सवालों को पत्रकार सुरक्षा की बहस से अलग नहीं किया जा सकता।क्योंकि भूखे, असुरक्षित और नौकरी खोने के भय से दबे पत्रकार से निर्भीक पत्रकारिता की अपेक्षा करना भी एक तरह का विरोधाभास है।क्या पत्रकार संगठन भी आत्ममंथन करेंगे?पत्रकारों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले संगठनों की भूमिका महत्वपूर्ण है। लेकिन संगठनों को भी अपने भीतर झांकना होगा।क्या उनके भीतर लोकतांत्रिक चुनाव होते हैं?क्या सदस्यता के नियम पारदर्शी हैं?क्या वे पत्रकारों के रोजगार और वेतन के सवालों पर नियमित रूप से आवाज उठाते हैं?क्या वे सरकारी विज्ञापन नीति की पारदर्शिता पर सवाल करते हैं?क्या वे पत्रकारों पर राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव के खिलाफ समान रूप से खड़े होते हैं?क्या वे फर्जी पत्रकारिता और प्रेस कार्ड के दुरुपयोग के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हैं?और सबसे महत्वपूर्ण—क्या वे सत्ता चाहे किसी भी दल की हो, पत्रकार की स्वतंत्रता के प्रश्न पर समान रूप से आवाज उठाते हैं?पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग तभी प्रभावी होगी जब उसके पीछे पत्रकार संगठनों की विश्वसनीयता और स्वतंत्रता भी दिखाई दे।पत्रकार को कानून से ऊपर रखने की मांग नहीं हो सकतीपत्रकार सुरक्षा की मांग का अर्थ यह भी नहीं हो सकता कि पत्रकार को कानून से ऊपर रखा जाए।पत्रकार को भी तथ्य और अफवाह के बीच अंतर करना होगा। आरोप और प्रमाण को अलग रखना होगा। खबर और प्रचार के बीच की सीमा समझनी होगी। किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा, निजता और कानूनी अधिकारों का सम्मान करना होगा।प्रेस की स्वतंत्रता और पत्रकार की जिम्मेदारी एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।जितनी मजबूत पत्रकारिता की स्वतंत्रता होगी, उतनी ही मजबूत उसकी पेशेवर जवाबदेही भी होनी चाहिए।इसीलिए पत्रकार सुरक्षा कानून की बहस को “पत्रकार बनाम सरकार” के सरल समीकरण तक सीमित करना उचित नहीं होगा। असली सवाल है—ऐसी कानूनी व्यवस्था कैसे बने जिसमें पत्रकार को सत्ता, पुलिस, प्रशासन, अपराधी तत्वों और संस्थागत दबाव से सुरक्षा मिले, लेकिन कानून का दुरुपयोग भी न हो?पहले अधिकारों की समझ, फिर नए कानून की मांगआज पत्रकार संगठनों के सामने शायद सबसे बड़ी चुनौती पत्रकारों को उनके मौजूदा अधिकारों के बारे में शिक्षित करना है।कितने पत्रकार अनुच्छेद 19(1)(a) की संवैधानिक स्थिति को विस्तार से जानते हैं?कितने पत्रकार जानते हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अनुच्छेद 19(2) के तहत कौन-कौन से प्रतिबंध लागू होते हैं?कितने पत्रकार मानहानि, अवमानना, निजता, स्रोतों की सुरक्षा, पुलिस पूछताछ, डिजिटल कानून और अन्य प्रासंगिक कानूनी प्रावधानों की बुनियादी जानकारी रखते हैं?पत्रकारिता में केवल कैमरा, मोबाइल, माइक्रोफोन और प्रेस कार्ड पर्याप्त नहीं हैं। कानून की जानकारी भी पत्रकार के पेशेवर औजारों का हिस्सा होनी चाहिए।पत्रकार संगठनों को नियमित “पत्रकार अधिकार एवं कानून प्रशिक्षण कार्यक्रम” शुरू करने चाहिए। पत्रकारों को संविधान, मीडिया कानून, डिजिटल पत्रकारिता, मानहानि, सूचना के अधिकार, पुलिस प्रक्रिया और न्यायालयों के महत्वपूर्ण फैसलों की जानकारी दी जानी चाहिए।यह काम किसी एक सम्मेलन या सालाना अधिवेशन से पूरा नहीं होगा।पत्रकार सुरक्षा कानून कैसा हो?यदि देश में पत्रकार सुरक्षा कानून की आवश्यकता महसूस की जा रही है तो उसकी मांग केवल नारे के रूप में नहीं, बल्कि ठोस नीति प्रस्ताव के रूप में सामने आनी चाहिए।कानून में कम से कम इन पहलुओं पर विचार होना चाहिए—- पत्रकारों पर हमले की शिकायतों के लिए विशेष और समयबद्ध प्रक्रिया।- पत्रकार को रिपोर्टिंग से अवैध रूप से रोकने, धमकाने या उपकरण छीनने के मामलों में प्रभावी कार्रवाई।- गंभीर मामलों में स्वतंत्र जांच की व्यवस्था।- पत्रकारों को कानूनी सहायता की व्यवस्था।- डिजिटल और स्वतंत्र पत्रकारों को भी उचित परिस्थितियों में संरक्षण।- पत्रकारों और मीडिया संस्थानों की स्पष्ट परिभाषा।- फर्जी प्रेस पहचान-पत्र और पत्रकारिता के नाम पर अवैध गतिविधियों पर रोक।- पत्रकारों के रोजगार और सामाजिक सुरक्षा के लिए व्यापक नीति।- पत्रकार की स्वतंत्रता और नागरिकों के अन्य मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन।- कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए स्पष्ट सुरक्षा प्रावधान।तभी पत्रकार सुरक्षा कानून वास्तव में पत्रकार सुरक्षा का कानून बनेगा, केवल एक नया प्रमाणपत्र या पहचान-पत्र व्यवस्था नहीं।चौथा स्तंभ कहने से जिम्मेदारी भी बढ़ती हैपत्रकारिता को चौथा स्तंभ कहना सम्मान की बात है, लेकिन यह सम्मान अपने साथ बड़ी जिम्मेदारी भी लेकर आता है।यदि पत्रकार लोकतंत्र के प्रहरी हैं तो उन्हें सत्ता से सवाल पूछने होंगे।यदि पत्रकार जनता की आवाज हैं तो उन्हें जनता के सवालों को प्राथमिकता देनी होगी।यदि पत्रकार सत्ता की निगरानी करते हैं तो उन्हें अपने पेशे के भीतर मौजूद कमजोरियों की निगरानी भी करनी होगी।और यदि पत्रकार स्वतंत्रता की मांग करते हैं तो उन्हें अपनी संस्थागत स्वतंत्रता की रक्षा भी करनी होगी।चौथा स्तंभ केवल सरकार से सवाल पूछने से मजबूत नहीं होता। वह तब मजबूत होता है जब वह स्वयं भी जवाबदेह, स्वतंत्र, तथ्यपरक और विश्वसनीय हो।इसलिए पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग गलत नहीं है। बल्कि आज के वातावरण में इस पर गंभीर और व्यापक बहस की आवश्यकता है। लेकिन यह बहस केवल “कानून बनाओ” तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।पहले पत्रकारों को उनके मौजूदा संवैधानिक अधिकारों की जानकारी दीजिए।उन्हें कानूनी लड़ाई लड़ने योग्य बनाइए।उनकी आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा पर बात कीजिए।पत्रकार संगठनों को राजनीतिक और आर्थिक दबाव से मुक्त करने की व्यवस्था पर बहस कीजिए।फिर एक ऐसे पत्रकार सुरक्षा कानून का मसौदा तैयार कीजिए जो वास्तव में पत्रकार की स्वतंत्रता की रक्षा करे।क्योंकि पत्रकार को केवल सुरक्षा नहीं चाहिए।उसे स्वतंत्रता, सम्मान, कानूनी संरक्षण, आर्थिक सुरक्षा और संस्थागत स्वायत्तता—इन सभी की आवश्यकता है।और सबसे महत्वपूर्ण बात—पत्रकारिता केवल “चौथा स्तंभ” लिख देने से चौथा स्तंभ नहीं बनती।चौथा स्तंभ बनने के लिए संविधान को समझना होगा, कानून को जानना होगा, सत्ता से सवाल पूछने होंगे और जरूरत पड़ने पर अपने ही संगठन तथा अपने पेशे की कमजोरियों पर भी सवाल उठाने होंगे।इसलिए पत्रकार संगठनों से अपील से ज्यादा यह एक सीधा सवाल है—पहले पत्रकारों को उनके अधिकारों का पाठ पढ़ाइए, उनके मौजूदा संवैधानिक संरक्षण की लड़ाई लड़िए, पत्रकारिता की स्वतंत्रता की मजबूत कानूनी जमीन तैयार कीजिए—फिर पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग को एक ठोस लोकतांत्रिक प्रस्ताव में बदलिए।वरना खतरा यह है कि “पत्रकार सुरक्षा कानून” भी कई दूसरे नारों की तरह मंच पर गूंजता रहेगा और जमीन पर पत्रकार वही पुरानी असुरक्षा लेकर काम करता रहेगा।पत्रकार को सुरक्षा चाहिए—लेकिन सुरक्षा से पहले उसे अपनी स्वतंत्रता का अर्थ समझना होगा।और स्वतंत्रता केवल मांगने से नहीं मिलती।उसे समझना पड़ता है, बचाना पड़ता है और उसके लिए लगातार लड़ना पड़ता है।


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By udaen

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