पौड़ी की घटना सिर्फ जर्जर पेड़ों की कहानी नहीं, सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल है।

पौड़ी गढ़वाल में बी.आर. मॉडर्न स्कूल के छात्र-छात्राओं का हाथों में ढोल, ड्रम और बैंड लेकर वन विभाग के कार्यालय पहुंचना पहली नजर में एक अनोखा विरोध प्रदर्शन लग सकता है। लेकिन इसके पीछे छिपा सवाल बेहद गंभीर है—क्या सरकारी व्यवस्था तब तक नहीं जागती, जब तक नागरिक अपनी समस्या लेकर असामान्य तरीके से सड़क पर उतरने को मजबूर न हो जाएं?
बताया गया है कि स्कूल मार्ग पर मौजूद जर्जर चीड़ के पेड़ों को हटाने के लिए स्कूल प्रबंधन पिछले करीब एक वर्ष से प्रशासन, जिलाधिकारी, मुख्यमंत्री कार्यालय और वन विभाग तक शिकायतें करता रहा। यदि यह तथ्य सही है, तो सवाल केवल यह नहीं है कि पेड़ क्यों नहीं हटे। सवाल यह भी है कि संभावित दुर्घटना के खतरे को लेकर की गई शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई की व्यवस्था आखिर कहां थी?
सरकारी तंत्र में अक्सर एक परिचित जवाब सामने आता है—एनओसी लंबित थी, जमीन किस विभाग की है यह स्पष्ट नहीं था, फाइल प्रक्रिया में थी, अनुमति का इंतजार था।
नियम और प्रक्रियाएं जरूरी हैं। लेकिन जब मामला बच्चों की सुरक्षा का हो, तो व्यवस्था को यह भी तय करना होगा कि प्रक्रिया और सुरक्षा के बीच प्राथमिकता किसकी होगी।
वन विभाग की ओर से अब कहा गया है कि संबंधित पेड़ पॉलिटेक्निक कॉलेज की भूमि और पुरानी वन पंचायत की सीमा से जुड़े हैं तथा आवश्यक औपचारिकताएं पूरी हो चुकी हैं। विभाग ने अगले एक-दो दिनों में पेड़ों को हटाने का आश्वासन दिया है।
यह अच्छी बात है। लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होती है।
अगर कार्रवाई एक-दो दिन में संभव है, तो फिर पिछले एक साल में क्या बाधा थी? और यदि वास्तव में कानूनी या प्रशासनिक कारणों से कार्रवाई संभव नहीं थी, तो क्या स्कूल प्रबंधन और अभिभावकों को इसकी स्पष्ट जानकारी दी गई थी?
बच्चों ने सिर्फ पेड़ों के खिलाफ नहीं, चुप्पी के खिलाफ ढोल बजाया
इस घटना का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि विरोध करने वाले राजनीतिक दल नहीं, बल्कि स्कूल जाने वाले बच्चे हैं।
जिन बच्चों को किताब लेकर स्कूल जाना चाहिए, उन्हें अपने रास्ते की सुरक्षा के लिए ढोल लेकर सरकारी कार्यालय जाना पड़ा। यह दृश्य व्यवस्था के लिए असहज करने वाला जरूर है, लेकिन लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण भी।
क्योंकि लोकतंत्र केवल चुनाव के दिन जनता की भागीदारी का नाम नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ यह भी है कि एक नागरिक की शिकायत समय पर सुनी जाए और प्रशासन उसकी समस्या का समाधान करे।
पहाड़ों में ऐसी लापरवाही महंगी पड़ सकती है
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में पेड़, सड़कें, भूस्खलन, नालियां और निर्माण स्थल केवल सामान्य प्रशासनिक विषय नहीं हैं। यहां प्राकृतिक परिस्थितियां छोटी-सी लापरवाही को बड़े हादसे में बदल सकती हैं।
स्कूल मार्ग पर खड़ा कमजोर पेड़ केवल एक पेड़ नहीं है। उसके नीचे से गुजरता बच्चा संभावित दुर्घटना का शिकार हो सकता है।
इसलिए जरूरत केवल खतरनाक पेड़ हटाने की नहीं, बल्कि स्कूलों, अस्पतालों, सड़कों और सार्वजनिक स्थलों के आसपास जोखिम वाले पेड़ों तथा अन्य खतरनाक संरचनाओं का नियमित सुरक्षा ऑडिट करने की है।
अब जवाबदेही भी तय होनी चाहिए
पेड़ हट जाने के बाद मामला खत्म नहीं होना चाहिए।
प्रशासन को यह भी देखना चाहिए कि शिकायत मिलने से लेकर कार्रवाई तक कितना समय लगा, किस स्तर पर मामला लंबित रहा और भविष्य में ऐसी शिकायतों के लिए समयबद्ध व्यवस्था कैसे बनाई जाएगी।
क्योंकि किसी हादसे के बाद मुआवजा, जांच और बयान देने से बेहतर है कि खतरे को हादसे से पहले पहचानकर खत्म कर दिया जाए।
पौड़ी के बच्चों ने ढोल बजाकर व्यवस्था को शायद यह याद दिलाया है कि सरकारी फाइलों में दर्ज एक शिकायत के पीछे भी किसी की जिंदगी और सुरक्षा जुड़ी हो सकती है।
उम्मीद यही है कि अब बच्चों को अपनी सुरक्षा की आवाज सुनाने के लिए दोबारा ढोल न बजाना पड़े।
